Opinion

लॉकडाउन और अर्थव्यवस्था के संकट के बीच पर्यावरण की गहराती समस्या

Faisal Anurag

अर्थव्यवस्था के संकट के बीच पर्यावरण के गहराते संकट भी पेचीदा होते जा रहे हैं. किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि लॉकडाउन के दौरान जब गाड़ियों का आवागमन बंद था और कारखानों में काम नहीं हो रहा था  तब, ओजोन परत में इजाफा कैसे संभव हुआ. जी हां, महानगरों और औद्योगिक इलाकों में इस दौरान वायु प्रदूषण में कमी का अहसास आमतौर पर सभी ने किया था. खबरें भी आ रही थीं की वायु प्रदूषण का स्तर न्यूनतम हो रहा है.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने देश के 22 बड़े शहरों में प्रदूषण के आंकड़ों का विश्लेषण किया है. और बताया है कि इस अवधि में ओजोन प्रदूषण मानक से अधिक था. इस अध्ययन-शोध ने कई भ्रम पर से परदा हटा दिया है. सीएसई की साख और सम्मान पूरी दुनिया में है. खास कर पर्यावरण के क्षेत्र में उसके अध्ययनों को गंभीरता से लिया जाता है.

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सीएसई ने देश के 22 शहरों का का डाटा जारी किया है. जिसे 31 मई 2020 तक के लॉकडाउन के समय के आधार पर तैयार किया गया है. 31 मई के बाद से ही देश में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की गयी है. आंकड़ों के विश्लेषण से ये बात सामने आयी है कि जब लॉकडाउन के कारण शहरों में पार्टिकुलेट मैटर 2.5 और नाइट्रोजन डाई-आक्साइड का स्तर काफी कम हो गया था, तब ओजोन प्रदूषण चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया था. जबकि ओजोन प्रदूषण तब हुआ करता है, जब तेज धूप और गर्मी का मौसम हो. सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण का स्तर नापने के लिए वैश्विक नियम अपनाए गये.

ताकि सटीक विश्लेषण सामने आ सके. रिपोर्ट में कहा गया है, “24 घंटों में से अगर 8 घंटों का औसत देखें, तो दिल्ली-एनसीआर और अहमदाबाद में कम से कम एक ऑब्जर्वेशन स्टेशन में लॉकडाउन अवधि के दो तिहाई वक्त में ओजोन प्रदूषण मानक से अधिक रहा. गुरुग्राम में 26 दिन ओजोन की मात्रा औसत से ऊपर रही. गाजियाबाद में 15 दिनों तक ओजोन प्रदूषण की मात्रा मानक को पार कर गयी.

नोएडा में 12 दिनों तक ओजोन प्रदूषण मानक से अधिक रहा. चेन्नई और मुंबई के हालात कुछ बेहतर रहें. हालांकि लेकिन दोनों शहरों के कम से कम एक ऑब्जर्वेशन स्टेशन में ओजोन प्रदूषण कई दिनों तक मानक से अधिक दर्ज किया गया. सीएसई की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (रिसर्च एंड एडवोकेसी) अनुमिता राय चौधरी ने कहा, “आपदा के चलते वायु गुणवत्ता में आए बदलाव ने हमें गर्मी के मौसम में होने वाले प्रदूषण को समझने में मदद की. सामान्य तौर पर हर साल सर्दी के मौसम में प्रदूषण हमारा ध्यान खीचता है. लेकिन, गर्मी के मौसम में जो प्रदूषण फैलता है, उसका चरित्र अलग होता है.

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पर्यावरण के संकट को महामारी के दौर में नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अनलॉक की प्रक्रिया के साथ यह खतरा भी मौजूद है कि वायु प्रदूषण पहले के हालात में न चले जायें. लॉकडाउन के दौर में इसमें गिरावट का होना बताता है कि यदि कुशल औद्योगिक प्रबंधन किया जाए तो न केवल ओजोन के संकट को कम किया जा सकता है बल्कि वायु प्रदूषण को भी. वायु प्रदूषण के कारण होने वाली जानलेवा बीमारियां धीमीं गति से लोगों के जीवन को खत्म करती हैं. भारत में जिस गति से आर्थिक क्षेत्र में सुधार किया जा रहा है, उसे भी इस नजरिए से देखने की जरूरत है.

पहले से ही अर्थव्यवस्था संकट में है. और उसमें गति लाने के लिए सुधार की प्रक्रिया तमाम पर्यावरणीय जरूरतों को नजरअंदाज कर सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप तो मानते ही नहीं कि विकास की नीतियों से ही पर्यावरण का संकट गहराया है. जबकि दुनिया भर के जानकार बता चुके हैं कि दुनिया की विकास नीति आत्मघाती हो रही है. भारत में भी सरकार पर्यावरण की बात तो करती है लेकिन उसकी नीतियों में उसकी झलक नहीं दिखती.

इस संकट का गहरा संबंध उस आर्थिक गतिरोध से भी है जो लॉकडाउन के कारण पैदा हूआ है. सेंटर फॉर इकॉनोमिक पॉलिसी रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के समूह का अनुमान है कि विश्व के दो तिहाई देशों का उत्पादन और आमदनी कंटेनमेंट नीतियों से जुड़े हैं. आर्थिक गतिरोध के खतरे के बावजूद महामारी को कम करने या रोकने के लिए लॉकडाउन की नीति अपनायी गयी. लेकिन विकास की गति को तेज करने के लिए सरकारों की चिंता साफ दिख रही है.

यह दुनिया भर की परिघटना है. इससे संकेत मिल रहा है कि दुनिया के अनेक देशों की सरकारें हो सकता है कि जलवायु परिवर्तन के सवाल को प्राथतिमकता न दें. दुनिया के अनेक देशों के नताओं ने तो पहले भी इस तरह के संकेत दिये हैं. अमेजन के जंगलों में जब भयावह आग लगी थी और पर्यावरणविदों ने उसे गंभीर संकट बताया था तब ब्राजील के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति ने कहा था कि वे ब्राजील के जंगल में छेड़छाड़ करने से नहीं हिचकेंगे.

इस तरह का नजरिया इस समय बेहद गंभीर संकट का संकेत देता है. भारत के 21 शहरों के ओजेन अध्ययन का संदेश भी यही है कि इस खतरे के प्रति नागरिकों को सचते रहने की जरूरत है. और पर्यावरण से खेलने की छूट किसी को नहीं लेने देना है.

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