
Ranchi: बिहार की राजनीति में 20-25 वर्ष पहले तक वामपंथी दलों की धमक सदन से सड़क तक सुनाई देती थी परंतु हाल के वर्षो में वामपंथी दलों की उपस्थिति कभी-कभार सड़कों पर तो जरूर नजर आती है, परंतु सदन में वामपंथी दलों की उपस्थिति नग्ण्य हो गई है.वर्ष 1995 में बिहार विधानसभा में वामपंथी दलों के 30 से अधिक विधायक हुआ करते थे.
इसके बाद 2000 के बाद से इनकी संख्या में कमी आती चली गयी थी. अब एक बार फिर वामपंथी दलों के दिन फिरते नजर आ रहे हैं. रुझानों में 19 सीटों पर इन दलों प्रत्याशी आगे चल रहे हैं. ताजा रुझानों के अनुसार पिछले चुनाव की तुलना में इन्हें 16 सीटों का फायदा होता दिख रहा है.
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माले ने 2015 में जीतीं थीं तीन सीटें
वर्ष 2015 के चुनाव में वामपंथी दलों को सिर्फ तीन ही सीटों पर जीत हासिल हुई थी.ये तीनों ही सीटें भाकपा माले ने जीती थीं. तरारी विधानसभा सीट से भाकपा माले के सुदामा प्रसाद विजयी हुए थे. दरौली सीट से माले के सत्यदेव राम को जीत हासिल हुई थी. बलरामपुर सीट से महबूब आलम जीते थे.
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1972 में भाकपा 35 सदस्यों के साथ बनी थी मुख्य विपक्षी पार्टी
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 1972 के विधानसभा चुनाव में भाकपा 35 सदस्यों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी थी, लेकिन वर्ष 1977 में हुए चुनाव में वामपंथी दल के विधायकों की संख्या घटकर 25 हो गई.1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में भी वामपंथ ने अपनी मजबूत दावेदारी बरकरार रखी.भाकपा को 23, माकपा को छह और एसयूसीआई को एक सीट मिली.
आइपीएफ को 1990 के विधानसभा चुनाव में भी सफलता मिली, जब उसके सात प्रत्याशी चुनाव जीते.इस चुनाव में भाकपा के 23 और माकपा के छह प्रत्याशी चुनाव जीते थे.
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2000 के चुनाव के बाद से ताकत घटी
वर्ष 2000 के चुनाव के बाद से विधानसभा में वामपंथी विधायकों की संख्या में गिरावट शुरू हुई.1995 तक जहां वामपंथी विधायकों की संख्या 38 होती थी, वह वर्ष 2000 में सिमट कर नौ हो गई.अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों की सीटें नौ रहीं, जबकि 2010 के चुनाव में वाम दलों ने अपनी बची-खुची सीटें भी गंवा दी.
वैसे वामदलों को एकबार फिर आशा है कि वर्तमान हालात में वामपंथी दल एक बार फिर अपनी खोई राजनीतिक जमीन हासिल कर पाएंगे.
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