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दर-दर की ठोकर खा रहा दिव्यांग, 2003 में नौकरी से किया गया था बाहर

राष्ट्रपति को लिखा पत्र.

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Ranchi : मोदी सरकार ने भले ही देशभर के दिव्यांगों को नौकरी में छूट देकर एक ठोस निर्णय लिया हो. लेकिन हकीकत यह है कि आज भी ऐसे कई दिव्यांग है, जिन्हें जबरन वोलंटरी सेपरेशन स्कीम (वीएसएस) देकर नौकरी से हटाया गया है. ऐसे ही एक व्यक्ति है राजधानी के कोकर स्थित एमएल मिश्रा. उनका कहना है कि 100 प्रतिशत दिव्यांग होने के बाद भी वे सिंदरी (धनबाद) स्थित प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (पीडीआईएल) में कार्यालय सहायक के पद पर कार्यरत थे. मार्च 2003 को बिना किसी पूर्व सूचना के मेरे साथ कई लोगों को वोलंटरी सेपरेशन स्कीम का लाभ देने के लिए नौकरी से बाहर कर दिया. उसके बाद उन्होंने दिसम्बर 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को एक पत्र लिख मामले की निष्पक्ष जांच करने की मांग की थी. राष्ट्रपति ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को पत्र लिख जांच करने का निर्देश दिया गया. स्थिति यह है कि आज तक इस विषय पर क्या कार्रवाई हुई, उसकी जानकारी उन्हें अबतक नहीं दी गयी है. नौकरी चले जाने के कारण दिव्यांग एमएल मित्रा दर-दर की ठोकर खाने को विवश है.

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डरा-धमकाकर दिया गया वीएसएस स्कीम का लाभ

उन्होंने बताया कि दिसम्बर 2002 को सिंदरी स्थित उर्वरक कारखाना (FCIL, बंद भारत का उर्वरक निगम) को बंद किया गया था. उसी समय प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (पीडीआईएल) ने उन्हें डरा-धमकाकर वोलंटरी सेपरेशन स्कीम (वीएसएस) देते हुए अप्रैल 2003 में नौकरी से बाहर कर दिया. हालांकि उस समय उन्होंने स्कीम का लाभ न लेकर वापस उन्हें नौकरी रखने की बात कही. उस समय करीब 15 साल का नौकरी बचा था. जब मैनेजमेंट के अधिकारियों ने उनकी अपील को नहीं मानी, तो उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की. इसके बाद संबंधित अधिकारियों ने मजदूर यूनियन के साथ मिल मामले को दबा दिया. स्थिति यह है कि कंपनी (पीडीआईएल कंपनी) चल रही है, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं दी जा रही है.

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दिव्यांग को जबरन नहीं देना होगा वीएसएस

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के गाइडलाइन में निर्देश है कि उनके अधीन किसी भी उपक्रम में कोई दिव्यांग कार्यरत है, तो उसे नौकरी से बिना किसी कारण के सेवानिवृत्ति हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता. अगर संबंधित कंपनी यह उपक्रम बंद हो रही है, या उसका क्लोजर हो रहा हो, तो दिव्यांग कर्मचारी को केंद्र सरकार के पास भेजना होगा. लेकिन ऐसा न कर कंपनी ने उन्हें जबरन सेवानिवृत्ति का लाभ देकर नौकरी से बाहर कर दिया.

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राष्ट्रपति को पत्र लिखा था, कार्रवाई क्या हुई मालूम नहीं

उन्होंने कहा कि नौकरी से निकाले जाने के बाद दिसम्बर 2005 को उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दूल कलाम को एक पत्र लिख पूरे मामले की जानकारी दी. पत्र में उन्होंने किसी विभाग से मामले की जांच की अपील की थी. इसके बाद सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की एक जांच टीम सिंदरी आयी थी. अपनी जांच के बाद जुलाई 2006 में कंपनी के तत्कालीन सीएमडी के.के.सिन्हा को हटा दिया. साथ ही सुझाव दिया कि जबतक पूरे मामले की जांच कर कोई कार्रवाई नहीं होगी, तब तक कंपनी में किसी तरह की कोई बहाली नहीं की जाएगी. वर्ष 2008 से उन्हें जबरन स्कीम का लाभ देते हुए चेक भेजा जाया जाने लगा, जिसे उन्होंने अबतक स्वीकार नहीं किया है. वर्तमान स्थिति यह है कि उन्हें अबतक न नौकरी दी गयी है. न ही टीम द्वारा सौंपी जांच रिपोर्ट में क्या कार्रवाई हुई, न उससे अवगत कराया गया है.

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ब्याज के साथ मिले बकाया वेतन

पीड़ित एमएल मिश्रा का कहना है कि दिव्यांगों के समक्ष वैसे भी रोजगार के अवसर काफी सीमित है. ऐसे में उन्हें नौकरी से बाहर करना एक तरह संविधान का अपमान है. उन्होंने मांग की है कि गलत तरीके से नौकरी से हटाने के एवज में उन्हें मार्च 2003 से पूरी ब्याज के साथ वेतन का भुगतान किया जाए.

क्या कहना है कंपनी के वर्तमान जीएम का

मामले पर पीडीआईएल के वर्तमान जीएम ए.के.सिंह का कहना है कि उन्हें संझान में यह मामला नहीं है. उन्हें घटना के बाद कंपनी के जीएम का पद संभाला था. अगर किसी तरह से कंपनी में कार्यरत दिव्यांग को नौकरी से बाहर किया गया है तो उसकी जानकारी नोएडा स्थित कंपनी के मुख्यालय से ही मिल पाएगी.

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