Opinion

आलोचनाओं का सम्मान दुनिया भर के अर्थव्यवस्थाओं की खासियत रही है

Faisal Anurag

Jharkhand Rai

अर्थव्यवस्था का केजुअल संचालन हमेशा ही घातक होता है. यही कारण है कि  कि अर्थ प्रणाली के लिए चेक एंड बैलेंस की प्रणाली को अहम माना जाता है.  मामूली केजुअल नजरिया का परिणाम घातक ही होता है.

भारत की अर्थ व्यवस्था के संकट को उसके बुनियादी सवालों से परे हो कर नहीं समझा जा सकता है. क्योंकि संकट का यह दौर संरचनात्मकता से ज्यादा भरा है. दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की खासियत यह है कि वह आलोचनाओं का सम्मान करते हैं और अपने अपने देशों के केंद्रीय बैंक के नेतृत्व से खिलवाड़ नहीं करते हैं.

इसे भी पढ़ेंः #GST फर्जीवाड़ाः दूसरे के पैन और आधार कार्ड से तीन करोड़ रुपये के GST की चोरी, गिरफ्तार, कई बड़े नामों का भी हो सकता है खुलासा

भारतीय रिजर्व बैंक के नेतृत्व के की स्वायत्तता पर यदि सवाल उठे हैं तो इस की गंभीरता को समझना चाहिये. भारत के रिजर्व बैंक के संदर्भ में यह धारणा बनी है कि वहां विशेषज्ञों को महत्व नहीं दिया जाता है और राजनीतिक ब्यूरोक्रेसी के नियंत्रण में उसे पहुंचा दिया गया है.

दुनिया के किसी भी विकसित या अतिविकासशील देशों के केंद्रीय बैंक के नेतृत्व को देखा जाये तो स्पष्ट होता है कि अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में ही उसका संचालन होता है. और सरकारों का उन पर नियंत्रण नहीं होता है.

किसी भी मामले में केंद्रीय बैंक की राय को ही स्वीकार किया जाता है. सरकारें जरूर अपनी आर्थिक नीति के अनुकूल विमर्श पर चलती हैं. लेकिन अपना फैसला वह थोपती नहीं हैं. भारत उन देशों की श्रेणी में पहुंचा दिया जा रहा है, जहां राजनीतिक नेतृत्व एक प्रतिबद्ध ब्यूरोक्रेसी के हवाले रिजर्व बैंक की स्वयत्तता गिरवी रखता जा रहा है.

इसे भी पढ़ेंः बिजली उत्पादक कंपनियां बेहाल, वितरण कंपनियों पर बकाया पहुंचा 78,000 करोड़, #AdaniPower पर 3,794  करोड़ बकाया  

इस की प्रक्रिया तो रघुराम राजजन के जाने के बाद ही शुरू हो गयी थी. लेकिन उर्जित पटेल और उनके सहयोगी विमल आचार्य ने स्वयत्तता के लिए संघर्ष किया और थक कर एक-एक कर दोनों ही इस्तीफा दे कर विदा हो गये.

भरात ने एक ऐसे व्यक्ति के हवाले नेतृत्व सौंप दिया है जो न तो अर्थशास्त्री है और न ही उसकी कोई ऐसी विशेषज्ञता है. वे केंद्र सरकार में वित मंत्रालय में प्रभावी अफसर रहे हैं और वित आयोग में भी उनकी भूमिका की चर्चा होती है.

बावजूद वे अर्थशास्त्री तो नहीं ही. हैं और उनका दावा भी ऐसा नहीं है. नोटबंदी के समय उनकी काफी चर्चा हुई थी. बात शशिकांत दास की हो रही है. वे पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो इतिहास में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर बनाये गये हैं.

वे पहले आइएएस नहीं हैं जिन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया है. उनके पहले भी  13 अन्य आइएएस को इस पद पर नियुक्त किया गया है, लेकिन वे अर्थशास्त्र के अध्येयता की पृष्ठभसूमि वाले रहे हैं.

इस तथ्य की चर्चा इसलिए की जा रही है कि देश बेहद गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है. अर्थ व्यवस्था में जान डालने और पटरी पर लाने के जो भी उपाय किये जा रहे हैं वे कारगर नहीं दिख रहे हैं. इसका कारण यह माना जा रहा है कि विशेषज्ञता के अभाव में अर्थव्यवस्था को उबारने वाले कदमों की साख प्रश्नचिन्ह के दायरे में है.

अमरीका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन या ब्राजील किसी भी देश में इस तरह के प्रयोग की छूट नहीं दी जाती रही है. सख्त आर्थिक अनुशासन के लिए विशेषज्ञता को अहम माना जाता है. चीन और रूस जैसे देशों में भी आर्थिक नीतियों के निर्माण और संचालन में अर्थशास्त्रियों के ही नेतृत्व को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है.

यह दीगर बात है कि उनका आर्थिक नजरिया पहली दुनिया से भिन्न है. यह वैचारिक सवाल है. इकोनॉमी प्रबंधन से तदर्थ नजरिया का निषेध और बैंकों की स्वयत्तता का सम्मान किये बगैर किसी भी देश की इकोनॉमी के डगमगाने की संभावना बनी ही रहती है.

इसे भी पढ़ेंः #BritishHighCourt का फैसला : पाक को नहीं, भारत को मिलेंगे बैंक में जमा #HyderabadNizam के अरबों रुपये  

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: