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MD का पद खाली रहने से डेढ़ लाख आदिवासी परिवारों के रोजगार पर संकट, वनोपज की खरीद बिक्री का काम ठप

Amit jha

Ranchi : झामकोफेड में पिछले 11 महीने से एमडी का पद खाली रहने से कार्य योजना को अंतिम रूप देना संभव नहीं हो पा रहा है. राज्य के डेढ़ लाख से अधिक परिवार लघु वनोपज की बिक्री और प्रसंस्करण कार्यों से जुड़कर आजीविका के कामों में लगे हैं. एमडी के नहीं होने से झामकोफेड के हाथ पैर बंधे हैं और इसका खामियाजा इन परिवारों को भी उठाना पड़ रहा है.

जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने 12 मई को लघु वनोपज और इसके जरिये आदिवासी कल्याण योजनाओं के स्थिति की समीक्षा की थी. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और कल्याण मंत्री चम्पई सोरेन ने झारखंड का पक्ष रखा था. इस दौरान झामकोफेड द्वारा 29.30 करोड़ रुपये की कार्य योजना तैयार किये जाने की जानकारी केंद्र को दी गयी थी. फ़िलहाल राज्य में एमडी की आस में झामकोफेड दिन गिन रहा है.

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रघुवर सरकार में नहीं मिल सका था एक एमडी

झारखंड में लघु वनोपज के वैल्यू एडिशन, खरीद बिक्री के मामले में झामकोफेड (झारखंड स्टेट माइनर फारेस्ट प्रोड्यूस को ओपरेटिव सोसाइटी डेवलपमेंट एंड मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड) का अहम रोल है. झामकोफेड के प्रबंध निदेशक (एमडी) जयदेव प्रसाद सिंह को पिछले साल राज्य सरकार ने वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप कार्य नहीं करने के कारण सस्पेंड कर दिया था. उनके जाने के बाद से (जुलाई 2019 से) एमडी का पद खाली ही पड़ा हुआ है. एमडी के नहीं होने से कर्मियों के वेतन भुगतान की भी समस्या खड़ी हो गयी थी जो अब भी बनी हुई है. जे पी सिंह को हटाये जाने के बाद से रघुवर सरकार एक एमडी नहीं तलाश पायी.

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सरकार के पास लंबित है मामला

जानकारी के अनुसार एमडी के रिक्त पड़े पद का मामला राज्य सरकार के संज्ञान में है. 22 अप्रैल को सीएस की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी. इस दौरान झामकोफेड, झासकोलैंप, वन विकास निगम और जेएसएलपीएस (ग्रामीण विकास विभाग) की टीम भी बैठी थी. लघु वनोपज के संग्रहण, बिक्री और वितरण कार्यों और कार्य योजना के संबंध में चर्चा हुई थी.

इस दौरान झामकोफेड ने 29.30 करोड़ रुपये की कार्ययोजना रखी थी जबकि झासकोलैम्प्स की तरफ से 55 करोड़ की योजना रखी गयी. इस दौरान झामकोफेड द्वारा एमडी के नहीं होने इससे योजनाओं के कार्यान्वयन पर असर पड़ने की भी बात सामने आयी थी. बैठक के बाद नए एमडी की नियुक्ति प्रक्रिया संबंधी चर्चा आगे भी बढ़ी पर अब तक कल्याण विभाग के पास औपचारिक सूचना नहीं आ सकी है.

झामकोफेड से डेढ़ लाख परिवारों का नाता

वन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के रोजी रोजगार का एक बड़ा जरिया वनोत्पाद का संग्रहण और उसकी बिक्री है. इमली. चिरौंजी, महुआ और महुआ डोरी (फूल), किरैता, मधु, करंज, मेडिकल प्लांट्स सहित 50 माईनर फारेस्ट प्रोड्यूस के जरिये जनजातीय परिवार दो पैसे कमा लेते हैं. जंगलों से चुने गए वनोत्पाद को स्थानीय लैम्प्स, पैक्स, समिति या एसएचजी के माध्यम से वे अपने सामानों की बिक्री करते हैं.

10 जिलों में प्रसंस्करण यूनिट के जरिये जुड़कर भी कई परिवारों को आर्थिक राहत मिलती है. जिस दिन कोई परिवार/व्यक्ति बिक्री करता है, उसी दिन उनके खाते में झामकोफेड डीबीटी के जरिये उन्हें भुगतान कर देता है. झामकोफेड के साथ सहयोग करने को 220 से अधिक लैम्प्स, पैक्स और एसएचजी समूह जुड़ा हुआ है. प्रत्यक्ष रूप से झामकोफेड के साथ लगभग 45 हजार परिवार जुड़े हुए हैं जबकि अप्रत्यक्ष तौर पर 1 लाख परिवार.

जिलों में प्रसंस्करण यूनिट के जरिये जुड़कर भी कई परिवारों को आर्थिक राहत मिलती है. वनोत्पाद की बिक्री के अलावा इसके प्रसंस्करण कार्यों से जुड़कर आदिवासी परिवार अर्थोपार्जन करते हैं.

ट्रांसपोर्टिंग की भी समस्या

गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने लॉकडाउन में कृषि कार्यों और वनोपज खरीद बिक्री कार्यों के संबंध में ढील भी दी है. पर वास्तविक रूप से इसका लाभ ग्रामीण परिवारों, लैम्प्स, सहकारी समितियों से जुड़े लोगों को नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में जंगलों से चुने गए वनोत्पाद को नजदीकी बिक्री केन्द्रों तक ला पाना या परिवारों तक पहुँच पाना भी संकट का विषय हो गया है.

फ़रवरी से जून तक के मौसम को वनोपज की खरीद बिक्री के लिहाज से पीक सीजन कहा जाता है. इन सबके बीच एमडी की नियुक्ति, लॉकडाउन और इसके कारण परिवहन सुविधाओं के अभाव ने ट्राइबल परिवारों के लिए सैकड़ों सवाल खड़े कर दिए हैं.

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