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चुनाव आयोग के खिलाफ 66 पूर्व अफसरों की शिकायत से साख का संकट

Faisal Anurag

चुनाव और राजनीति में सेना का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी सेना और सांप्रदायिकता के सवाल को केंद्र में रखकर चुनाव प्रचार में आगे बढ़ रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने पहले तो कहा कि सेना का राजनीति में इस्तेमाल ना किया जाए.

लेकिन अब वे सेना का इस्तेमाल करते हुए वोट मांग रहे हैं. इसी तरह भारतीय जनता पार्टी पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान के सवाल पर तेजी से केंद्रित हो गयी है. दूसरी ओर इन सवालों पर चुनाव आयोग की खामोशी भी एक बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है.

चुनाव आयोग सत्ता पक्ष की निष्पक्षता लगातार संदेहास्पद हो रही है. देश के जाने माने पूर्व 66 शीर्ष अधिकारियों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए हैं.

यह पहला अवसर है, जब पूर्व अधिकारियों ने इस तरह का पत्र राष्ट्रपति को लिख है. कई पूर्व सेना अधिकारी भी सेना के चुनावों में सेना के नाम पर वोट मांगने के खिलाफ अपनी नाराजगी प्रकट कर चुके हैं.

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इसी समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने चुनावों में भाजपा की जीत के बारे में कहकर सनसनी फैला दिया है. भाजपा जहां इस चुनाव में पाकिस्तान पर लगातार हमले कर रही है, वहीं इमरान खान भाजपा और मोदी से न केवल हमदर्दी दिखा रहे हैं, बल्कि भारत-पाकिस्तान शांतिवार्ता के लिए उनकी जीत की उम्मीद में हैं.

भाजपा मानकर चल रही है कि पाकिस्तान का सवाल उसके लिए वोट खींचने वाला है. मोदी मुख्यमंत्री के तौर पर गुजरात में यह आजमा चुके हैं कि किस तरह उनकी जीत में पाकिस्तान पर किए गए उनके हमले से लाभ मिलता रहा है. मियां मुशरर्फ के खिलाफ बोलकर वे विधानसभा चुनाव में अपनी कमजोर स्थिति को बड़ी जीत में बदलने में कारगर हुए थे.

इसी तरह गुजरात के पिछले चुनाव में भी जब भाजपा की संभावना बेहद कमजोर दिख रही थी, उसे उबारने में पाकिस्तान के खिलाफ प्रधानमंत्री के रूप में बोले गए उनकी बातों की बड़ी भूमिका रही है.

इस क्रम में उन्होंने डा. मनमोहन सिंह पर तथ्यरहित प्रहार किया, जिसके लिए भाजपा के मंत्री जेटली को राज्यसभा में खेद प्रकट करना पड़ा था. इमरान खान के बयान को सोशल मीडिया पर वह गुगली माना जा रहा है, जिसका इस्तेमाल चुनाव में दोनों ही खेमें आने वाले दिनों में करेंगे.

मोदी के लिए भी यह एक अप्रत्याशित कथन ऐसे समय में आया है, जब पहले दौर के मतदान के केवल 24 घंटे शेष बचे हैं.

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घरेलू मोर्चे पर पूर्व में शीर्ष पर रहे सेना और सिविल अधिकारियों की ओर से राष्ट्रपति को लिखा गया पत्र खारिज नहीं किया जा सकता है. इस पत्र में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं.

आयोग ने सत्तापक्ष से जुड़े आचार संहिता के मामलों में जिस तरह की लचर भूमिका दिखायी है, ऐसे चुनावों की निष्पक्षता को लेकर प्रश्न का गंभीर होना लाजिमी ही है.

भारत के आमतौर पर चुनाव आयोग चुनावों की घोषणा के बाद बड़ी भूमिका निभाता आया है. चुनाव आयोग ने कल्याण सिंह के मामले में जिस तरह की भूमिका निभायी है, उससे अब राष्ट्रपति के पास पूर्व अधिकारी लेकर गए हैं. इसी तरह एक और विवाद गहरा गया है.

चुनाव आयोग ने आचार संहिता के बावजूद किसान सम्मान राशि में दो करोड़ नए नाम जोड़ने के साथ राशि आवंटन की इजाजत दिया है, जबकि दूसरी ओर ओडिशा के किसानों के लिए जारी कालिया योजना की राशि पर रोक लगा दिया है.

यह दोनों ही बातें एक ही दिन हुई है. आखिर एक तरह की योजनाओं पर आयोग का यह दोहरा मानदंड सामान्य नहीं दिख रहा है. चुनाव आयोग को स्पष्ट बताना चाहिए कि उसने पहले से जारी कालिया योजना के तहत राशि भुगतान को क्यों रोका और किस आधार पर इसी तरह की योजना के लिए केंद्र ने छूट दी है.

इस तरह की घटनाओं के बाद तो यह कहा जाने लगा है कि चुनाव आयोग स्वयं एक पक्ष बनकर उभर रहा है. उसकी भूमिका चुनाव लड़ने वाले सभी दलों और समूहों के लिए एक समान अवसर मुहैया कराना है. लेकिन देखा जा रहा है कि वह एक पार्टी विशेष के लिए सुविधाएं और छूट प्रदान करता है. तमिलनाडु के मुख्य सचिव का मामला भी इसीमें एक हैं.

मुख्य सचिव सत्ता पक्ष के प्रचार अभियान में हिस्सेदार की तरह भूमिका निभा रहे हैं. इसके सबूत भी आयोग को दिए गए हैं. लेकिन आयोग ने इसपर खामोशी अपना रखी है.

लातूर में मोदी ने अपने भाषण में जिस तरह बालाकोट एयर स्ट्राइक और पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट देने की अपील की है, वह आयोग के ही पूर्व में दिए गए निर्णय के खिलाफ है.

कारगिल के बाद हुए चुनाव में आयोग ने साफ निर्देश दिया था कि किसी भी हालत में सेना का चुनाव में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.

चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि वह आचार संहिता का सख्ती से पालन हो, इसके लिए इस तरह की गतिविधियों पर कड़ा अंकुश लगाएगी या नहीं. लोकतंत्र के लिए इस तरह का प्रचार अभियान सामान्य तो नहीं ही कहा जा सकता है.

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