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चिकित्सीय संस्थानों की कमी से COVID-19 का मामला भी कैंसर जैसा

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Faisal Anurag

दुनिया ने जिस तरह निजीकरण की होड़ में सार्वजनिक हेल्थ सिस्टम की अनदेखी की है, वह कोविड-19 के संकट में भयावह तस्वीर पेश कर रहा है. एक डॉक्टर ने फोन पर आत्मीय बातचीत के दौरान जो कुछ कहा, उससे एक उम्मीद तो पैदा होती ही है, अपनी कमियों को सुधारने की बड़ी चुनौती भी देती है. उस युवा डॉक्टर ने मार्मिक स्वर में कहा: मैं और मेरे पति  पीपीइ की कमी के बाद भी पूरे समर्पण के साथ इस जंग में शामिल हैं.

कुछे साल पहले ही उच्च मेडिकल शिक्षा में गोल्ड मेडलिस्ट इस दंपति की शिकायत सिर्फ इतनी है कि सरकार उनकी सेवाओं का बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पा रही है. कुछ इसी तरह की पीड़ा रांची के ही एम्स से उच्चशिक्षा प्राप्त एक चिकित्सक की भी है. इन डॉक्टरों को लगता है कि इस समय जब देश के लोग कोरोना वायरस के दंश में हैं तो वे चुप नहीं बैठ सकते.

यही वह उम्मीद है, जिससे भारत की ताकत व्यक्त होती है. इन्हीं डॉक्टरों को अक्सर समाज का एक तबका भला बुरा कहता रहता है. अस्पतालों की लूट प्रवृति के खिलाफ इन डॉक्टरों का दर्द अक्सर व्यक्त होता ही रहता है.

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दो साल पहले मैं कैंसर की गिरफ्त में था और भीमराव अंबेडकर कैंसर अस्पताल एम्स के वार्ड में भर्ती था. तब मैंने देखा था, सरकारी अस्पतालों के चिकित्साकर्मी किस समर्पण से मरीजों की देखरेख करते हैं और मरीजों की तकलीफों के आगे अपने परिवार के सुखदुख भी भूल जाते थे.

डॉ ललित कुमार, जो एम्स कैंसर ओकोलॉजी विभाग के हेड भी हैं और दुनिया के जानेमाने ओंकोलॉजिस्ट हैं. अकसर मुझसे कहते थे, काश सरकारों ने राज्य स्तरों पर भी बेहतर संस्थानों का निर्माण किया होता, तो देश में कैंसर के ज्यादातर मरीज मौत से बच सकते थे.

आज भी कैंसर दुनिया में सर्वाधिक लोगों को लील लेता है, जबकि कैंसर के इलाज में विज्ञान ने लंबी छलांग लगायी है और लोगों को बचाने के अवसर को विस्तरित किया है. लेकिन चिकित्सीय संस्थानों की कमी के कारण अब भी कैंसर से जंग एक कमजोर पहलू है. कोविड-19 का मामला भी कमोवेश ऐसा ही है.

अस्पतालों की कमी,उपकरणों की कमी और डॉक्टरों की कमी से तो सभी परिचित ही हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि भारत के डॉक्टर दुनियाभर में बेहतर चिकित्सा के लिए प्रसिद्ध हैं. लेकिन अपने ही देश में उन्हें बेहतर इलाज करने के संसाधन नहीं दिये जा सके हैं. जब से ग्लोबलाइजेशन का दौर आया है, भारत जैसे तमाम देशों में चिकित्सा के निजीकरण की प्रवृति ने पब्लिक हेल्थ को कमजोर ही नहीं किया है बल्कि उसके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है.

आजादी के बाद जिन संस्थानों का निर्माण किया गया था, पिछले दशकों में उनके हालतों का अनुभव बेहद तल्ख है. एम्स में सूक्ष्म तरीके से जिस तरह निजीकरण हो रहा है, उससे जाहिर होता है कि मिनिमम गवर्नेंस के नाम पर सरकार लोक कल्याण के संवैधानिक दायित्व से ही मुक्त हो जाने पर लिए आमादा है.

एम्स के ही एक बड़े चिकित्सक डॉ अनूपर सराया ने इस निजीकरण की प्रवृति के खिलाफ आवाज बुलंद करते आ रहे हैं. उनकी एक किताब भी पब्लिक हेल्थ पर चर्चित हुई है. डॉ सराया निजी बातचीत में बताते हैं कि देश में जो भी सरकारी चिकित्सा के केंद्र बचे हुए हैं, उन्हें बचाने की सख्त जरूरत है. इस साल के बजट वक्तव्य में मोदी सरकार ने जिस तरह सदर अस्पतालों को  निजी सरकारी दोनों के लिए खोलने का इरादा जताया है, उसके अंतरनिहित प्रवृति को समझे जाने की जरूरत है. मोदी सरकार की घोषणा है कि वह देश के सभी जिला अस्पतालों को पीपीपी मोड में मेडिकल कॉलेजों में बदलने की बात जोर शोर से कही है.

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इसका अर्थ साफ है कि वह गरीबों और कमजोरों के लिए सुलभ संस्थान को सीमाबद्ध करने को आतुर हैं. सवाल है कि आखिर सरकारी संस्थानों में जो भी उपकरण और परिसर हैं, उन्हें निजी हाथों को मुफ्त में देने का लाभ क्या गरीबों को मिल सकेगा.

कोविड-19 की जांच के लिए जब निजी अस्पताल और जांच केंद्र 4500 रू लेने की बात कर रहे हैं, तो समझा जा सकता है जो आपदा में भी कोई राहत नहीं दे सकता है, वह आम दिनों में क्या करेगा.

इसलिए इस विमर्श को आज की आपदा में ही समझने की जरूरत है कि आखिर हेल्थ सिस्टम पर सरकार का नियंत्रण क्यों जरूरी है. स्पेन जैसा पूंजीवादी देश को भी इस आपदा में निजी अस्पतालों को टेकओवर करना पडा है तो गंभीरता को नरजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.  प्रकाश के रे वैश्विक मामलों के जानकार है. उन्होंने हाल ही में एक लेख लिखा है. इसके कुछ अंश प्रस्तुत है, जिससे हालात के अंतर को समझा जा सकता है.

“क्यूबा की स्वास्थ्य सेवा की बेहतरी की वजह रोगों की रोकथाम और प्राथमिक स्वास्थ्य पर मुख्य रूप से ध्यान देना है. इस तंत्र का प्रमुख आधार देशभर में फैले सैकड़ों सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. एक केंद्र 30 से 60 हज़ार लोगों को सेवाएं प्रदान करता है. इन केंद्रों में शोध व पढ़ाई का काम भी होता है.

क्यूबा क्रांति के तुरंत बाद ही ग्रामीण चिकित्सा सेवा की शुरुआत कर दी गयी थी, जिसके तहत डॉक्टर और मेडिकल छात्र बिना किसी स्वास्थ्य सुविधा वाले दूर-दराज़ के गांवों और पहाड़ी व तटीय क्षेत्रों में एक नियत समय के लिए सेवा देते थे. बाद में इसमें कई आयाम जुड़े और  विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, नब्बे का दशक आते-आते 95 फ़ीसदी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हो चुकी थीं.

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आज शिशु मृत्यु दर के मामले में क्यूबा दुनिया के कुछ सबसे धनी देशों के साथ खड़ा है. विश्व बैंक के अनुसार, 2015 में इस मामले में वैश्विक औसत एक हज़ार जन्म में 42.5 का था, यानी इतने बच्चे पांच साल की उम्र से पहले ही दम तोड़ देते थे. क्यूबा में यह दर तब सिर्फ़ छह थी. साल 2018 में वैश्विक अनुपात 38.6 का है. भारत में यह दर वैश्विक दर के बराबर है. क्यूबा में अब यह दर चार से भी कम हो चुकी है.

उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य के मद में ख़र्च करने में भी यह द्वीपीय देश अतिविकसित देशों का मुक़ाबला करता है और इसमें भी वह वैश्विक औसत से आगे है. साल 2015 में उसका ख़र्च सकल घरेलू उत्पादन का 10.57 फ़ीसदी रहा था, जबकि, विश्व बैंक के अनुसार, 2014 में यूरोप का औसत खर्च 10 फ़ीसदी था.

किसी देश को खून और खून में मौजूद तत्वों की ज़रूरत पूरी करने के लिए जरूरी है कि आबादी का कम-से-कम दो फीसदी हिस्सा नियमित रूप से रक्तदान करे. क्यूबा में 18 से 65 साल तक की उम्र के पांच फीसदी लोग ऐसा करते हैं. वहां से दूसरे देशों में खून व जुड़े तत्वों की आपूर्ति होती है.

इसे लेकर कुछ लोग उसकी आलोचना भी करते हैं, लेकिन दुनिया को मदद का हाथ बढ़ाने में क्यूबा का यह भी एक अहम योगदान है. यह कोई कारोबार नहीं है और वहां के आधिकारिक आर्थिक रिपोर्टों में भी इसका उल्लेख निर्यात या किसी कारोबारी गतिविधि के रूप में नहीं किया जाता है.

इस संबंध में यह भी रेखांकित करना चाहिए कि पैन अमेरिकन स्वास्थ्य संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएं कह चुकी हैं कि अमेरिका और कनाडा की तरह क्यूबा में भी सौ फीसदी खून स्वैच्छिक दाताओं से जुटाया जाता है.

याद रहे, भारत में सालाना मांग से करीब 20 लाख यूनिट कम खून जुट पाता है. हमारे यहां खून बेचने, खून का कारोबार करने और खून उपलब्ध कराने में रिश्वत या रसूख के इस्तेमाल की खबरें आम हैं.”

जरूरत यह है कि भारत के हेल्थ मॉडल में प्राइवेट सेक्टर को सीमित भूमिका देते हुए पब्ल्कि सेक्टर को मजबूत किया जाये और संसाधन संपन्न भरी. सरकार अपने संवैधानिक दायित्व के तहत प्रत्येक भारतीय नागरिक के स्वस्थ्य की गारंटी करे. साथ चिकित्साकर्मियों को सम्मन भी प्रदान किया जाए.

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