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कोर्ट ने पूर्व IAS डॉ प्रदीप कुमार की जमानत याचिका की खारिज

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Ranchi : पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रदीप कुमार को रांची सिविल कोर्ट से राहत नहीं मिली. ईडी के विशेष न्यायाधीश प्रदीप कुमार की अदालत ने डॉक्टर प्रदीप कुमार की जमानत याचिका खारिज कर दी.

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वर्ष 2012 में मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में ईडी ने दर्ज किया था मामला. पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रदीप कुमार पर एक करोड़ 76 लाख रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है.

3 जून को किया था सरेंडर

झारखंड कैडर के सेवानिवृत आईएएस अधिकारी डॉ प्रदीप कुमार और उनके सगे भाई राजेंद्र कुमार ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की विशेष अदालत में तीन जून 2019 को सरेंडर कर दिया था. दोनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया था.

वर्ष 2005 से 2009 के बीच लगभग एक करोड़ 76 लाख रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है. सुप्रीम कोर्ट ने 1.76 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में सभी आरोपियों को सक्षम अदालत में सरेंडर करने का आदेश दिया था. प्रदीप कुमार के सहयोगी श्यामल चक्रवती ने भी इस मामले में पूर्व में सरेंडर किया था.

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1991 बैच के आईएएस अधिकारी है डॉ प्रदीप

1991 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ प्रदीप रांची के डीसी रह चुके हैं. स्वास्थ्य सचिव के पद पर रहने के दौरान दवा खरीद घोटाले में डॉ प्रदीप और उनके करीबियों की भूमिका रही. सीबीआई ने इस मामले में डॉ प्रदीप को गिरफ्तार किया था.

लंबे वक्त तक वह इस मामले में जेल में बंद रहे. जेल से छूटने के बाद रघुवर सरकार ने डॉ प्रदीप को कमिश्नर का प्रभार दिया था. गौरतलब है कि डॉ प्रदीप दुमका के कमिश्नर पद से पिछले साल रिटायर हुए थे.

ईडी ने कि थी संपत्ति जब्त

ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत डॉ प्रदीप कुमार और उनके करीबियों की रांची, उदयपुर, कोलकाता और बेंगलुरु की संपत्ति जब्त की थी. जब्त की गयी संपत्ति का रजिस्ट्री मूल्य करीब दो करोड़ रुपये के करीब था.

जबकि बाजार मूल्य 10 करोड़ रुपये बतायी जाती है. ईडी ने झारखंड में पहली बार किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जब्त की थी.

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क्या है मामला

ईडी ने जांच में पाया गया था कि डॉ प्रदीप कुमार ने अपने भाई राजेंद्र कुमार, सीए नीरज केजरीवाल, दो व्यापारी श्यामल चक्रवर्ती और धर्मेंद्र कुमार धीरज की मिलीभगत से मनी लॉन्ड्रिंग की थी. डॉ प्रदीप से काम कराने के एवज में श्यामल चक्रवर्ती ही रिश्वत की वसूली करता था. और वसूली गयी राशि को चल-अचल संपत्ति में निवेश करता था.

डॉ प्रदीप ने रिटर्न फाइल करने के लिए एचयूएफ (हिन्दू अविभाजित परिवार) बनाया था. इसका प्रमुख अपने छोटे भाई राजेंद्र कुमार को बना दिया था. इसके बाद एचयूएफ के माध्यम से फिक्स्ड डिपोजिट, इंदिरा विकास पत्र और किसान विकास पत्र में निवेश किया था.

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सीबीआई ने इन धाराओं में दर्ज किया था मामला

सीबीआई ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में हुए घोटाले में डॉ प्रदीप कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 15 और आईपीसी की धारा 120बी, 420, 467 और 471 के तहत रांची में मामला दर्ज किया था.

कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी. इसमें कहा था कि आईएएस डॉक्टर प्रदीप कुमार ने अपने पद का दुरुपयोग कर सरकारी राशि का गबन किया. साथ ही आय से अधिक संपत्ति भी अर्जित की. इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी डॉ प्रदीप कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की थी.

उल्लेखनीय है कि डॉ प्रदीप कुमार 1991 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. वह एकीकृत बिहार में पटना के डीसी रह चुके हैं. इसके अलावा वह रांची के डीसी भी रहे हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में हुए घोटाले में डॉ कुमार को रांची के बिरसा मुंडा जेल होटवार भी लंबे समय तक रहना पड़ा था.

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