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कोर्ट, पीएमओ, राष्ट्रपति, सीएम, मंत्रालय, नीति आयोग और कमिश्नर किसी की परवाह नहीं है कल्याण विभाग को

चाहे किसी का भी निर्देश आ जाए. झारखंड सरकार का कल्याण विभाग वो ही करता है. जो उसकी मर्जी होती है.

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं…मेरी मर्जी… 2011 से ही कल्याण विभाग के आला अधिकारी की रवैये को देखकर यही बोला जा सकता है. चाहे किसी की सिफारिश आ जाए. चाहे किसी का भी निर्देश आ जाए. झारखंड सरकार का कल्याण विभाग वो ही करता है. जो उसकी मर्जी होती है. कम-से-कम ITDP (Integrated Tribal Development Projects) के लिए किए गए काम को देखकर तो यही कहा जा सकता है. इस योजना के तहत सरकार ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यक को रोजगार के लिए मदद करती है. 2007 से पहले झारखंड में इस योजना के तहत लाभुकों को गाय, बकरी, भेड़, मुर्गी आदि पालन के लिए दी जाती थी. लेकिन झारखंड प्रदेश किसान महासभा मामले को लेकर कोर्ट गया. 09.01.2007 को झारखंड के हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि इस योजना के तहत अब लाभुकों को गाय-बकरी के बजाय सवारी गाड़ी, टेंपो, ट्रैक्टर दिए जाएंगे. इससे लाभुकों के आय में ज्यादा वृद्धि होगी और काफी फायदा मिलेगा. एसटी के केस में पूरी राशि केंद्र सरकार की तरफ से दी जानी थी और बाकी समुदाय के लिए 90 फीसदी राशि दी केंद्र सरकार को दी जानी थी, बाकी की 10 फीसदी राशि लाभुक को देना था. इसमें राज्य सरकार को एक रुपया भी नहीं लगाना. बावजूद इसके विभाग की लेट-लतीफी की वजह से सभी लाभुकों को उनका हक नहीं मिल सका.

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कहां गए केंद्र सरकार के 67,76,000

कोर्ट के आदेश के बाद विभाग ने झारखंड प्रदेश किसान महासभा से लाभुकों की लिस्ट मांगी. सात जिलों से कुल 251 लोगों की लिस्ट महासभा ने विभाग को सौंपी. विभाग ने अपनी रफ्तार में काम को आगे बढ़ाया. अपनी सुस्त चाल की वजह से 251 में से 68 लाभुकों के बीच विभाग परिसंपत्तियों का वितरण नहीं कर सका. क्योंकि जब-तक विभाग ने परिसंपत्तियां बांटी तब-तक सभी परिसंपत्तियों के रेट में इजाफा हो गया. विभाग ने केंद्र की तरफ से आयी 9,37,76000 रुपए में से सिर्फ 8,70,000,00 ही बांट सकी. बाकी के 67,76,000 रुपए विभाग के पास ही रह गए.

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किसी भी बात से विभाग को कोई फर्क नहीं पड़ा

हर जगह से विभाग को बाकी बचे परिसंपत्तियों को बांटने का निर्देश आया. लेकिन विभाग को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा. यहां तक की कोर्ट की बात को भी विभाग ने नहीं माना.

1)    15.02.2011 को सीएम सचिवालय से विभाग को बाकी बचे पैसों परिसंपत्ति बांटने का निर्देश आया. लेकिन नहीं बंटी.

2)    फिर से सीएम सचिवालय से 25.09.2013 को बाकी बचे पैसों परिसंपत्ति बांटने का निर्देश आया. लेकिन नहीं बंटी.

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3)    17 अगस्त 2016 और 22 सितंबर 2016 को राष्ट्रपति भवन से झारखंड के मुख्य सचिव को बाकी बचे पैसों परिसंपत्ति बांटने का निर्देश आया. लेकिन नहीं बंटी.

4)    22 सितंबर 2016 को राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से कल्याण विभाग को कार्रवाई करने के लिए लिखा गया. लेकिन किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की गयी.

5)    19.08.2016 को फिर से राष्ट्रपति सचिवालय ने विभाग के मंत्री को उचित कार्रवाई करने के लिए. लेकिन किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई.

6)    05.08.02016 को सीएम के निजी सचिव को मामले में कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रपति भवन से लिखा गया. लेकिन कुछ नहीं हुआ.

7)    कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री एवं आदिवासी कल्याण राज्यमंत्री भारत सरकार ने 19.01.2017 को इस मामले में समाज कल्याण, कल्याण और महिला एवं बाल विकास विभाग झारखंड सरकार को उचित कार्रवाई के लिए अनुशंसा की गयी. लेकिन किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई.

8)    17.02.2017 को नीति आयोग की तरफ से वित्त विभाग झारखंड को निर्देश दिया गया. निर्देश का पालन करते हुए विभाग ने कल्याण विभाग को उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया. लेकिन हुआ कुछ नहीं.

9)    27.12.2016 को पीएमओ से मामले में उचित कार्रवाई के लिए विभाग को लिखा. लेकिन हुआ कुछ नहीं.

10)   आखिर में झारखंड प्रदेश किसान महासभा ने फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. विनोद भगत बनाम झारखंड सरकार के इस पीआईएल में एक बार फिर से हार झारखंड सरकार की होती है. हाईकोर्ट ने 30.04.2018 को सभी लाभुकों के बीच परिसंपत्तियों को बांटने का निर्देश दिया. लेकिन वही ढ़ाक के तीन पात. हुआ कुछ नहीं. कोर्ट के आदेश को भी विभाग ने नहीं माना.

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