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देश का राजस्व घाटा पूरे साल के बजटीय लक्ष्य का 114.8 फीसदी 

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Girish Malviya

मीडिया एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर को मुद्दा बनाने की ठान बैठी है. लेकिन देश में वर्तमान प्राइमिनिस्टर जो राज कर रहा है उसके कारनामो को लेकर खामोश हैं. मोदीजी ने बजट में चालू वित्त वर्ष में कुल 6.24 लाख करोड़ रुपए के वित्तीय घाटे का लक्ष्य रखा था. लेकिन कुल 8 महीनों में ही यह घाटा कुल 7.17 लाख करोड़ रुपए हो गया था. यानी प्रतिशत के हिसाब से देश का राजकोषीय घाटा पूरे साल के बजटीय लक्ष्य का 114.8 फीसदी हो गया है.

वैसे सरकार के लिए वित्तीय घाटा कोई नई बात नहीं है और लगभग हर सरकार वित्तीय घाटे का सामना कर चुकी है. लेकिन मोदी सरकार के लिए वर्तमान घाटा इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि सरकार ने जितने घाटे का अनुमान लगाया था, सरकार को उससे अधिक घाटा हो रहा है. पिछले साल भी सरकार का वित्तीय घाटा काफी था और नवंबर 2017 तक सरकार को पूरे साल के अनुमान के मुकाबले 112 फीसदी घाटा हुआ था, लेकिन इस साल तो यह उससे भी 2.8 फीसदी अधिक हो गया है.

अब सबसे महत्वपूर्ण बात समझ लीजिए- लोग कहते हैं कि इससे भी अधिक राजकोषीय घाटा यूपीए की सरकार को होता था, तब इतना हल्ला नहीं मचाया जाता था. लेकिन ऐसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि तब जीएसटी जैसी व्यवस्था लागू नहीं थी.

CGA की रिपोर्ट में वित्तीय घाटे का एकमात्र कारण रेवेन्यू कलेक्शन बताया है. यानी कि सरकार ने जितना राजस्व का लक्ष्य रखा था, उससे काफी कम राजस्व सरकार को मिल रहा है. चालू वित्त वर्ष में सरकार की कर से होनेवाली आमदनी बजटीय अनुमान का 49.4 फीसदी रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 57 फीसदी रही थी. यानी पिछली बार से भी कम आमदनी इस साल हुई है. यानी ग्रोथ की बात आप छोड़िए आप डाउन फॉल की ओर जा रहे हैं. और इसकी जिम्मेदार है मूर्खतापूर्ण ढंग से लागू की गयी जीएसटी.

हर महीने सरकार जीएसटी कलेक्शन में पिछड़ती ही जा रही है. जीएसटी कार्यान्वयन की खामियों की वजह से ही एक साल में डेढ़ लाख करोड रुपये का राजस्व का घाटा हुआ है. दरअसल बड़ी तादाद में जीएसटी रिटर्न नहीं भरे जा रहे, जिसकी वजह से सरकार को राजस्व नहीं मिल पा रहा है.

इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच सर्वाधिक राजस्व घाटा दर्ज करने वाले 10 राज्यों में पुदुच्चेरी (42 फीसदी), पंजाब और हिमाचल प्रदेश (36 फीसदी प्रत्येक), उत्तराखंड (35 फीसदी), जम्मू एवं कश्मीर (28 फीसदी), छत्तीसगढ़ (26 फीसदी), गोवा (25 फीसदी), ओडिशा (24 फीसदी), कनार्टक और बिहार (20 फीसदी) शामिल हैं.

जब जीएसटी लागू की गई तो राज्यों के 2015-16 के राजस्व संग्रह को आधार मान कर राज्यों को मुआवजा देने की बात की थी. तथा सरकार ने हर वर्ष उनका मानक राजस्व तय करने के लिए 14 प्रतिशत सालाना राजस्व वृद्धि का सूत्र अपनाया था. यानी सालाना 14 प्रतिशत जोड़ने के बाद इस आंकड़े से जितना कम संग्रह होगा उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी, लेकिन जब आमदनी होगी नहीं तो यह घाटा पूरा कैसे होगा. कर्नाटक के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि ‘वैट व्यवस्था के तहत कर्नाटक औसतन 10 से 12 प्रतिशत राजस्व वृद्धि हासिल कर रहा था, लेकिन जीएसटी के बाद राजस्व घाटा अनुमानित वृद्धि के समक्ष 20 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया.’

अब राज्यों को जो घाटा हो रहा उसमें और पैसा अपनी तरफ से मिलाकर सरकार को देना है. फिलहाल राज्य जीएसटी लागू होने के बाद पहले पांच साल के लिए क्षतिपूर्ति पाने के हकदार हैं. जीएसटी जुलाई 2017 में लागू हुआ, इस लिहाज से राजस्व क्षतिपूर्ति व्यवस्था 2022 तक लागू रहेगी. लेकिन हालात इतने खराब नजर आ रहे हैं कि केन्द्र द्वारा राजस्व नुकसान की भरपाई के बावजूद राज्य का राजस्व घाटा 2022 के बाद भी बना रह सकता है. अब इसे भी पांच साल से आगे बढ़ाने की बात की जाने लगी है. जीएसटी से होने वाला राजस्व घाटा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा होना चाहिए, लेकिन मीडिया को अनुपम खेर की एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर में ज्यादा इंटरेस्ट है.

वैसे पुदुच्चेरी को तो इस साल देशभर में सभी राज्यों में सबसे अधिक घाटा हुआ है शायद इसलिए मोदीजी को ‘वणक्कम पुदुच्चेरी’ कहते हुए नजर आए हैं.

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं )

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