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#corporatetaxcut: कॉर्पोरेट टैक्स क्या है? और देश की वित्त मंत्री ने दवाई किसे देनी थी, पर पिला किसे गईं?

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Ravindra Patwal

भारत जैसे देश में अब भी 90% लोगों को शायद ही पता हो कि कॉर्पोरेट टैक्स क्या होता है और यह किस पर लागू होता है? आइये इसे समझते हैं.

A corporate tax is a levy placed on a firm’s profit by the government. The money collected from corporate taxes is used for a nation’s source of income. A firm’s operating earnings are calculated by deducting expenses including the cost of goods sold (COGS) and depreciation from revenues.Jul 15, 2019

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इसका अर्थ है कि किसी कारपोरेशन या उद्योग की आय और व्यय के बाद जो बचता है उसे कॉर्पोरेट प्रॉफिट कहते हैं और उस पर सरकार एक निश्चित दर पर टैक्स वसूलती है. अगर उस उद्योग को लाभ नहीं होगा तो उस पर कॉर्पोरेट टैक्स नहीं लिया जा सकता. सिर्फ लाभ की स्थिति में यह टैक्स दिया जाता है.

अब आते हैं एक कारपोरेशन और एक कॉर्पोरेट कैसे काम करता है, उसके बारे में थोड़ा सा समझते हैं.

अगर आपके पास 100 करोड़ की सालाना उत्पाद बनाने और बेचने की कम्पनी है तो आप क्या-क्या कर सकते हैं? अगर आप उसके मालिक हैं तो आप साल भर के काम के लिए देश या विदेश में कहीं भी घूमते हैं, उसे आप कम्पनी के खर्चों में शामिल कर सकते हैं. अगर आपको मर्सिडीज से ऊब हो चुकी है और lexus या नयी गाड़ी पसंद है तो कम्पनी के खर्च से खरीद सकते हैं.

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बच्चों के साथ यूरोप, अमेरिका का साल में तीन टूर करना है तो सभी खर्चे कम्पनी के खाते में डाल कर घूम सकते हैं. बेटी की शादी तक कर सकते हैं जनाब.

इसके बाद आप अपने लिए महीने की तनख्वाह भी बांध सकते हैं, जो दस लाख महीना से लेकर कुछ भी हो सकती है.

और ये सब खर्चे जब दिखा दें और उसके बाद भी अगर 10 करोड़ का फायदा हो जाये तो उस पर सरकार 30% का कॉर्पोरेट टैक्स वसूलती है, देश के विकास के कामों पर लगाने के लिए. गलती से इस बार निर्मला सीतारमण जी ने इसे 5% क्या बढ़ाया, कॉर्पोरेट जगत में भूचाल आ गया.

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उसी भूचाल में sensex को गिराया जा रहा था, जिसे अपनी भूल मान न सिर्फ वापस लिया गया है, बल्कि इतना कम कर दिया है कि वह पहले के टैक्स से भी 3% कम हो गया है. 2017 से पहले कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30% थी, जिसे अरुण जेटली जी ने घटा कर 25% कर दी थी, उसे ही 5% बढ़ाने पर कॉर्पोरेट ने सरकार को लिंच करना शुरू कर दिया और डरकर उसे 8% कम कर दिया गया है, नये उद्योगों के लिए इसे 25% से घटा कर 15% के स्तर पर ले आया गया है.

इन सबमें सरकार को 1.45 लाख करोड़ का सालाना चूना लगेगा. अर्थात कम्पनी में जो लाभ मिलता है उस पर यह सब खेल चल रहा है.

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आज देश के 95% लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं. लाभ की छोड़िये साहब, कॉर्पोरेट और केन्द्रीय और राज्य सरकार में कार्यरत सरकारी कर्मचारी के अलावा कोई ऐसा इंसान नहीं जो अपनी 5 साल पुरानी आर्थिक हैसियत पर खड़ा है. इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब है कि हम गरीब हुए हैं. हमें लाभ नहीं घाटे में अपना जीवन जीना पड़ रहा है.

अमूल की चड्ढी, पारले का बिस्कुट, पेट्रोल और डीजल की खपत में कमी, सोने और चांदी की खरीद की तो बात ही छोड़ दें, जरूरी आलू, प्याज टमाटर की खरीद में खिच-खिच इतनी बढ़ गयी है कि रोजमर्रा का जीवन नर्क बन चुका है.

ऐसे में सिर्फ एक ही दुआ हर भारतीय कर रहा है कि घर में कोई बीमार न पड़ जाये. अब सालाना टूर और पहाड़ों और समुद्र की सैर पहले से एक चौथाई रह गयी है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत किसी से छुपी नहीं है. 2000 की जो दो किश्त मोदी सरकार ने चुनाव से पूर्व भेजी थी, गांवों के गरीब किसानों को उसकी तीसरी क़िस्त जुलाई से मिलनी थी लेकिन सबसे अधिक पंजीकृत यूपी और बिहार में वह नहीं पहुंची और अब उसके पहुंचने की सम्भावना खत्म समझिये.

अगर देश का बजट ही 25 लाख करोड़ हो, जिसमें GST और इनकम टैक्स का टारगेट पूरा न हो पाने की पनौती पहले से लग रही हो, तो मोदी सरकार यह गरीबों के लिए परोपकारी रही सही योजना भी क्यों और कैसे लागू कर पायेगी.

यहां तो कॉर्पोरेट से गला छूटे तब न. गरीब 120 करोड़ लोगों का क्या है? वे तो पहले भी मर रहे थे, अब थोड़ा और बर्दाश्त कर लेंगे, उन्हें देने के बजाय डीजल पेट्रोल में बढ़े हुए एक्साइज ड्यूटी, बैंकों में बढ़े हुए चार्जेज और गैस में दो चार प्रतिशत की बढ़ी हुई कीमत से क्या अधिक फर्क पड़ जायेगा?

क्योंकि जब इस देश में पहले ही कहा जा चुका है कि कॉर्पोरेट ही इस देश का ब्रेड अर्नर है, वह होगा तो देश चलेगा चाहे वह देश से पिछली मनमोहन सरकार के 5 बिलियन डॉलर देश से विदेश ले जाने की तुलना में पिछले 5 वर्षों में 45.75 बिलियन डॉलर ही क्यूं न ले गया हो, उसे अपनी कम्पनी के सारे खर्चे काटने के बाद जो शुद्ध लाभ मिलता है उसमें भी इतनी छूट चाहिए कि वह शेयर बाजार में बुल और बियर का खेल खेल सके तो यही सही.

अब आते हैं सवाल के दूसरे पहलू पर

यह जानकारी मुझे किसी अर्थशास्त्री से नहीं मिली, न ही किसी बड़े लेफ्ट चिंतक के पास से. यह आपको किसी भी सेल्फ हेल्प और कैसे करोड़पती आसानी से बनें किताबों से मिल सकती है. Rich Dad Poor Dad एक बेस्टसेलर किताब है जापानी मूल के अमेरिकी लेखक और उद्योगपति रोबर्ट टी कियोसोकी की. पूरी किताब में वह बताते हैं कि किस तरह उसके गरीब पिता जो काफी कड़ी मेहनत से उच्च शिक्षित हैं, कड़ी मेहनत करते हैं, और अपनी नौकरी में काफी गंभीर रहे जीवन भर, वे एक गरीब की जिन्दगी जीते हैं.

दूसरी तरफ अर्ध शिक्षित दूसरे पिता हैं जो काफी तुलनात्मक रूप से गरीब थे शुरू में लेकिन वे हमेशा निवेश के बारे में ध्यान देते थे. धीरे धीरे वे अमीर होते गये. क्योंकि जो वास्तव में अमीर होते हैं, उनके करीब करीब सभी खर्चे वे चाहे व्यक्तिगत हों, या घर के लिए या दुनिया जहां के लिए वे सभी धंधे से ही निपटा दिये जाते हैं, और इसके लिए अमेरिका सहित दुनिया में कोई कानून नहीं कि उसे निपटा जा सके.

जबकि नौकरी करनेवाले डैड की हालत एक नंगे आदमी की शुरू से होती है. उसकी आय का ब्यौरा नौकरी शुरू करने से CTC की शक्ल में जन्मकुंडली के रूप में होता है. अप्रैल महीने के शुरुआत से ही टीडीएस की शक्ल में कम्पनी खुद ही इनकम टैक्स तनख्वाह से काटती रहती है. और जो टैक्स नहीं भर सकते, उनके लिए भी नमक से लेकर मौत की चादर खरीदने तक GST के रूप में टैक्स वसूला जाता है.

अब आप खुद ही अनुमान लगा लीजिये कि जीने के लिए सरकार को सहायता करनी चाहिए या प्रॉफिट में कोई टैक्स न काटा जाये, उसके लिए? देशभक्त कॉर्पोरेट और देशभक्त सरकार मिल कर किस देशद्रोही जनता से यह सब कीमत वसूलेगी और किस किस तरह से?

दुःख तो इस बात का होता है कि राष्ट्रीय विपक्ष तो छोड़िये, इस मुद्दे पर वामपंथ भी अपने कैडर को कुछ नहीं सिखाते. बस वही घिसी-पिटी साम्राज्यवाद, बड़ी पूंजी के खिलाफ मजदूर वर्ग खड़ा हो, अलाना फलाना कह कर नारों से ही काम चला लेता है.

यही कारण है कि उसे सबसे अधिक पूंजीवादी व्यवस्था का सुसंगत विरोधी और बेहतर व्यवस्था का वाहक होकर भी एक पुरातनपंथी विचार मान कर भारत का युवा रिजेक्ट करता आ रहा है.

आज देश को एक साथ ही सब कुछ सीखना भी है और पूछना भी है. यह दोहरा कार्यभार जिसमें सही सही सीखना और अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति सचेत रहते हुए, चोरी कर रहे व्यवस्था में छेद कर रहे लोगों की धर पकड़ की समझदारी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नागरिक मंच की लम्बे समय से जरूरत है, पर कोई तैयार हो तब न.

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(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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