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कारपोरेट के दवाब के आगे फिर झुकी मोदी सरकार, अब फार्मा कंपनियां जान भी ले लेंगी तो मुआवजा नहीं

क्लिनिकल ट्रायल ड्राफ्ट से हटेगा मुआवजे का प्रावधान

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News Delhi: कारपोरेट लॉबी के दबाव में एक बार फिर मोदी सरकार अपने फैसले को बदले जा रही है. इस बार फार्मा कंपनियों के दबाव के आगे झुकते हुए केंद्र सरकार क्लिनिकल परीक्षण नियमों में बड़ी ढील देने जा रही है. क्लिनिकल ट्रायल के नियमों के फाइनल ड्राफ्ट से उस नियम को हटाया जा रहा है जिसके तहत फार्मा कंपनियों को परीक्षण के दौरान व्यक्ति की मौत या क्षति का मुआवजा देना पड़ता था. न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल रूल्स का ड्राफ्ट फरवरी 2018 को जारी हुआ था.

क्या था ड्राफ्ट में

इसमें यह प्रावधान किया गया था कि यदि कोई व्यक्ति किसी क्लिनिकल ट्रायल या जैविक क्षमता अध्ययन में शामिल होता है और उसमें उसकी मौत हो जाती है या फिर वह स्थायी तौर पर दिव्यांग हो जाता है तो उसे उस क्लिनिकल ट्रायल के स्पांसर के द्वारा मुआवजा प्रदान किया जायेगा. उसे मुआवजे का 60 प्रतिशत राशि अग्रिम के तौर पर तुरंत दिया जाना चाहिए. 15 दिनों से अंदर भुगतान करने का प्रावधान था. यह मुआवजा एथिक्स कमेटी के द्वारा तय किये जाने का प्रावधान था.

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एथिक्स कमेटी को तय करना था मुआवजा

एथिक्स कमेटी के विचारों के बाद सेंट्रल लाइसेंसिंग अथॉरिटी(सीएलए) इसका आदेश जारी करता. बाकी के 40 फीसदी मुआवजे का भुगतान 30 दिनों के भीतर करने का प्रावधान था. मुआवजे की राशि तय करने के लिए एक फार्मूला तैयार किया गया था, जो ड्राफ्ट के सातवें शिड्यूल में उल्लेखित था. ड्राफ्ट के नियमों के अनुसार कोई भी संस्था किसी प्रकार का बायो मेडिकल या स्वास्थ्य संबंधी परीक्षण या रिसर्च करना चाहती है तो उसे एक एथिक्स कमेटी का गठन करना होगा जो कि इस बात पर भी ध्यान रखेगा कि रिसर्च किस प्रकार संचालित होगा.

सात सदस्य होते एथिक्स कमेटी में

इस कमेटी में सात सदस्यों को रखा जाना था, जिसमें मेडिकल साइंटिस्ट, नॉन मेडिकल साइंटिस्ट, नॉन साइंटिफिक एक्सपर्ट, लीगल एक्सपर्ट और एख सामान्य व्यक्ति को शामिल करना था. कमेटी का काम यह देखना था कि इंसानों पर किया जानेवाला किसी भी प्रकार का परीक्षण पूरी सावधानी, प्रक्रिया, जरूरतों और प्रावधानों के अनुसार ही किया जाये.

क्या कहा था डब्ल्यूएचओ ने

इस नियम के विरोध में कई लॉबियां काम कर रही थीं. खास कर मुआवजे के प्रावधान पर सभी का कड़ा विरोध था। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने भी फार्मा कंपनियों की तरफ से लॉबी की थी। डब्ल्यूएचओ की उप महानिदेशक सोम्या स्वामीनाथन ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिख कर कहा था कि भारत सरकार को अपने मुआवजे से संबंधित फैसले पर पुर्नविचार करना चाहिए. ऐसा न होने पर फार्मा कंपनियों का निवेश भारत से दूसरी जगह चला जायेगा. फार्मा कंपनिय़ों को यह नियम मान्य नहीं था, इस कारण डब्ल्यूएचओ का कहना था कि इससे डब्ल्यूएचओ के भारत में हो रहे कार्य भी प्रभावित होंगे. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि डब्ल्यूएचओ की तरफ से क्लिनिकल ट्रायल के नियमों पर गंभीर आपत्ति दर्ज करायी गयी है. इस कारण से ड्राफ्ट से मुआवजे के प्रावधान को हटाया जा सकता है. इसके रहने से फार्मा कंपनियां भारत में क्लिनिकल ट्रायल करने से बचेंगी और ये फिर दूसरे विकासशील देशों की तरफ रुख करने लगेंगी.

फार्मा कंपनियां कर रहीं थीं विरोध

इन नियमों के लागू होने की स्थित में फार्मा कंपनियों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता था. क्योंकि इसमें इंसान को नुकसान होने की स्थिति में तगड़े मुआवजे का प्रावधान किया गया था. इस कारण फार्मा कंपनियां इसका काफी विरोध कर रही थीं. फार्मा कंपनियों ने एथिक्स कमिटी की योग्यता और जांच से पहले ही मुआवजे के प्रावधान पर सवाल खड़े किए थे. दरअसल कंपनियां इसलिए भी डर रही थीं क्योंकि नए नियमों के मुताबिक जो फॉर्मूला तय किया गया है, उसमें मुआवजा करोड़ों में हो सकता था.

क्या होता है क्लिनिकल ट्रायल

क्लिनिकल ट्रायल यानी मानव शरीर पर किसी नई दवा के अच्छे-बुरे असर का अध्ययन. भारत में ये काम बिना मंजूरी के गैर कानूनी तरीके से होता आया है और पिछले एक साल में इसकी वजह से 370 मौत रिपोर्ट हुई है.

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