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कोरोना के टीके का ट्रायल शुरु हो रहा है, पढ़िये इसे विकसित करने वाले वैज्ञानिकों का इंटरव्यू, कितना भरोसा है उन्हें वैक्सीन पर

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Dr Skand Shukla

ऑक्सफोर्ड वैक्सीन-ग्रुप व जेनर संस्थान कोविड-19 के अपने टीके ChAdOx1 nCoV-19 का मानव-ट्रायल शुरू करने जा रहे हैं. इस संदर्भ में जिन वैज्ञानिकों ने इस टीके को विकसित करने में योगदान दिया है, उनसे की गयी बातचीत पढ़ने योग्य है. चिम्पैंजी के एडिनोविषाणु नाम के एक ख़ास विषाणु के ऊपर सार्स-सीओवी-2 विषाणु के स्पाइक प्रोटीनों को स्थापित करके इसे मानव-शरीर में प्रवेश कराया जाएगा.

यह साक्षात्कार हम क्यों पढ़ें? इसलिए पढ़ें ताकि जानें कि विज्ञान में काम करने वाले कितने ऊहापोह से गुज़र रहे होते हैं. वैक्सीन का सफल होना-न होना उनके हाथ में पूरी तरह नहीं होता, वे केवल कोशिश कर सकते हैं. उनकी बातें सुनकर हम यह भी जान सकते हैं कि विज्ञान में चुटकी बजाकर कुछ हासिल नहीं होता, महीनों-सालों एड़ी-चोटी का पसीना बहाना पड़ता है.

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प्रश्न : लॉकडाउन ने क्लीनिकल ट्रायलों को किस तरह प्रभावित किया है?

उत्तर : अगर (जब) विषाणु का प्रसार नहीं होगा और नये मरीज़ नहीं होंगे, तब यह कह पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा कि वैक्सीन संक्रमण को रोकने में काम कर भी रही है कि नहीं. अभी भी हालांकि कुछ विषाणु का कुछ प्रसार जारी है. इससे हम अपनी वैक्सीन की एफीकेसी को समझ सकते हैं कि वह कितना काम कर रही है. जितना कम समाज में विषाणु-प्रसार, उतना वैक्सीन की संक्रमण-रोकथाम को समझ पाने में देरी.

प्रश्न : लॉकडाउन के दौरान आप-लोग उन इलाक़ों को चिह्नित करके शोध करेंगे, जहां अभी संक्रमण का कर्व उठ रहा है?

उत्तर : हम-लोग अभी कुछ सप्ताह से दुविधा में हैं. हमें उन लोगों को चिह्नित करना है, जिनके विषाणु से संक्रमित होने की आशंका अधिक है. जो लोग विषाणु से अधिक एक्पोज हो रहे हैं, उनमें स्वास्थ्यकर्मी प्रमुख हैं. अभी हमने कोई रणनीति नहीं बनायी है. हम दुनियाभर के अपने अन्य साथियों के सम्पर्क में भी हैं, ताकि अन्य जगह भी शोध स्थापित किये जा सकें. अफ़्रीका इनमें प्रमुख है, क्योंकि वहां भविष्य में टीके की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है.

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प्रश्न : क्या चैलेंज-ट्रायलों के बारे में आपने सोचा है?

उत्तर: यह वहां हो सकता है, जहां लोग टीका लगवाने के बाद स्वयं को जानबूझकर संक्रमित करने का प्रयास करें. पहले अन्य कोरोना विषाणुओं के मामलों में इस तरह के चैलेंज-ट्रायल किये जा चुके हैं, किन्तु वर्तमान कोरोना विषाणु के मामले में ऐसा अब-तक नहीं किया गया है. चैलेंज-ट्रायल के अपने जोखिम हैं. मान लीजिए कि आपने टीके की गलत डोज़ लगा दी और उससे व्यक्ति को रक्षण नहीं मिला. अब अगर इस व्यक्ति को संक्रमण का चैलेंज दिया जाएगा, तब उसे गंभीर संक्रमण हो सकता है. ऐसे शोध अभी तो मुश्किल हैं, जब तक कोई ढंग के उपचार न मिल जाएं. ताकि ट्रायल में अगर समस्या हो, तो उसे देकर व्यक्ति को सुरक्षित रखा जा सके.

टीके के परीक्षण के लिए स्वयंसेवकों की सुरक्षा के रास्ते में अनेक रोड़े हैं. यद्यपि लोग चैलेंज-ट्रायलों के बारे में सोच रहे हैं , ताकि टीकों को शीघ्र विकसित किया जा सके.

प्रश्न : आप-लोग सामान्य फेज़ 3 ट्रायल के साथ चैलेंज-ट्रायल क्यों नहीं कर रहे ?

उत्तर : जैसा कि मैंने अभी-अभी बताया कि मनुष्यों को चैलेंज-मॉडल बनाना जोखिम-भरा है. जब इस विषाणु के खिलाफ़ दवा उपलब्ध हो जाएगी (और हाल के वैक्सीन-विकास में सफलता हाथ लगती है), तब चैलेंज-मॉडल पर काम करना बेहतर रहेगा.

प्रश्न : क्या आप उम्मीद करते हैं कि आपका टीका कुछ समूहों में अन्य से बेहतर काम करेगा?

उत्तर : जो लोग सत्तर की उम्र से ऊपर के हैं, उनमें टीके उतना अच्छा काम नहीं करते. हमें अपने ट्रायलों में इसका अन्वेषण करना है कि हमारा टीका बूढ़ों में कैसा काम करता है. अगर टीके के कारण मिलने वाली प्रतिरक्षा कमज़ोर है, तब हमें टीके की अनेक डोज़ें देनी पड़ सकती हैं. ताकि प्रतिरक्षा-तंत्र को बेहतर ढंग से सशक्त किया जा सके.

फ़्लू के टीकों में हमने पाया है कि बूढ़ों में इनसे जन्मने वाली प्रतिरक्षक क्षमता कुछ कम (बहुत कम नहीं) होती है. हां , टीकों से जन्मने वाली प्रतिरक्षा युवाओं में बेहतर होती है, किन्तु वृद्धों में बहुत कम होती हो, ऐसा नहीं होता.

प्रश्न : कितना निवेश जोखिम में है. अगर इस टीके की सितंबर तक प्लान की गयीं एक मिलियन डोज़ें सफलतापूर्वक काम नहीं करतीं?

उत्तर : यह सच है कि आपने कितनी मात्रा में टीकों का उत्पादन का निर्णय लिया है. खर्चे की मात्रा तय करता है. आप अत्यधिक मात्रा में टीके बना रहे हैं, या केवल थोड़ी ही अधिक मात्रा में ? अन्य वैज्ञानिक-समूह भी अच्छा काम कर रहे हैं , हमारा प्रोग्राम यद्यपि सबसे अधिक महत्त्वाकांक्षी है. यह बताता है कि हम अपने टीके को लेकर कितने आत्मविश्वास में हैं. हम सोचकर चल रहे हैं कि यह काम करेगा और ढेर सारी इन डोज़ों की ज़रूरत पड़ेगी.

अगर सफलता की उम्मीद कम होती, तब हम एक ही टीका-निर्माता के पास जाते. कम डोज़ें ही बनवाते. किन्तु हमें टीके से ख़ासी उम्मीद है. अन्य समूह भी एडिनोवायरस से टीके बनाकर काम कर रहे हैं, पर चिम्पैंज़ी-एडिनोवायरस से नहीं. यह बेहतर विषाणु है और इसे बनाना किफ़ायती भी है. एक मिलियन टीकों में निवेश किया गया धन कम है, अगर आपका उत्पादन पांच गुना बेहतर है.

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प्रश्न : कितना धन लगा है ?

उत्तर : दसियों मिलियन पाउण्ड.

प्रश्न : क्या लोगों को टॉप-अप टीकाकरण की ज़रूरत पड़ने वाली है ?

उत्तर : इसी तरह अन्य टीकों से हमें जो तजुर्बा मिला है, उसके अनुसार तो नहीं लगता कि ज़रूरत पड़ेगी. यह टीका लगवाने वाली जनसंख्या की उम्र पर भी निर्भर करेगा. बूढ़ों में टीके से मिलने वाली प्रतिरक्षा कम हो सकती है, युवाओं में यह प्रतिरक्षा बेहतर होगी. इबोला के खिलाफ़ टीका इसी तकनीकी से बनाया गया है और उससे मिलने वाली प्रतिरक्षा साल-भर के बाद भी मज़बूत रहती है.

प्रश्न : टीका यूके में बनेगा ?

उत्तर : हां

प्रश्न : अगर टीका यूके में बनेगा, यानी डोज़ें यूके में ही इस्तेमाल होंगी ?

उत्तर : यह इतना सरल नहीं है. हम चाहते हैं कि कोई एक देश सारे टीकों पर एकाधिकार न करे, क्योंकि इनकी ज़रूरत अंतरराष्ट्रीय रूप से पड़ने वाली है. अभी इस मामले को सुलझाना है. इसका संबंध इससे भी है कि टीके के उस ख़ास बैच के विकास को किसने फण्ड किया? हम चाहते हैं कि टीका वहां पहुंचे, जहां इसकी सर्वाधिक ज़रूरत हो. आज यह स्थिति यूरोप व अमेरिका में है, किन्तु आगे यह बदल सकती है. चीन की तरह यहां आगे रोगी घट सकते हैं. अफ़्रीका के गरीब देशों में आगे ज़रूरत पड़ सकती है, हम चाहते हैं कि वहां यह टीका ज़रूर पहुंचे.

प्रश्न : यह कैसे तय हो कि संसार में सभी को एक ही समय में टीका मिलने की उम्मीद बराबर हो?

उत्तर : “इस पर वार्ताएं चल रही हैं. कोअलिशन ऑफ़ एपिडेमिक प्रिपेरेडनेस इनोवेशंस इस विषय में काम कर रहा है. यह सुनिश्चित कराया जा रहा है कि टीका सबसे ज़रूरतमन्द को सबसे पहले मिले. सात बिलियन टीके तुरन्त तो बन नहीं सकते, कुछ तो प्राथमिकता रखनी ही पड़ेगी.

प्रश्न : टीका लगाने के बाद आप-लोग कुछ महीनों तक ख़ून में किन एंटीबॉडी की जांच करेंगे?

उत्तर : अभी वह टेस्ट हमारे पास नहीं है, किन्तु उस पर हम काम कर रहे हैं. शीघ्र ही यह जांच हमारे हाथ में होगी. इबोला के लिए हम यह कर चुके हैं, हमें इस बार भी कर सकने का विश्वास है. हमारे बढ़िया सहयोगी हमारी इस काम में मदद कर रहे हैं.

टीका लगाने के उपरान्त हम एंटीबॉडियों का ही परीक्षण नहीं करेंगे, कोशिकीय प्रतिरक्षा का भी अध्ययन करेंगे. कोशिकीय प्रतिरक्षा भी कोरोना वायरसों के लड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, ऐसा हमें लगता है. इसीलिए हमने ऐसी टीके की ऐसी तकनीकी चुनी है, जो कोशिकीय प्रतिरक्षा विकसित करे और एंटीबॉडी निर्माण भी.

प्रश्न : क्रिसमस तक कितने तैयार हो जाएंगे?

उत्तर : सब अच्छा रहा, तो सैकड़ों मिलियन. पर अभी कुछ भी निश्चित तौर पर कहना जल्दबाज़ी होगी. कोई वादा नहीं.

प्रश्न : विषाणु में अगर आगे म्यूटेशन हुए, तब भी टीका काम कर लेगा ?

उत्तर : टीके के कारण जो एंटीबॉडी बन रही हैं, वे म्यूटेशन के बाद भी काम करेंगी, ऐसा लगता है. कोरोना विषाणुओं की विविधता फ़्लू-विषाणुओं की विविधता के आगे कुछ भी नहीं हैं, पर उनके खिलाफ़ भी टीके काम करते ही हैं.

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प्रश्न : आप 80 % निश्चिन्त हैं, बाक़ी के 20 % के बारे में?

उत्तर : हमेशा एक अनिश्चितता तो रहती ही है. हम कभी पूरी तरह निश्चित रूप से नहीं कह सकते. इस तकनीकी पर हमें पहले भी काम किया है , इसलिए विश्वास है. सफलता की उम्मीद बहुत अधिक है.

प्रश्न : लेकिन उत्पादन में जोखिम तो है ही.

उत्तर : हां, अगर टीके ने काम नहीं किया और मिलियन डोज़ें बनी रखी हैं, तब धन बर्बाद हुआ जानिए.

प्रश्न : क्या टीके के बाद इम्यून-एनहैंसमेंट के कारण अगले संक्रमण की स्थिति और बुरी हो सकती है ?

उत्तर : इसी के लिए पहले जानवरों पर शोध किये जाते हैं. अनेक टीकों पर किये गये हैं. लगता तो नहीं है कि ऐसा होगा. पर फिर भी निगरानी तो रखनी ही होगी टीका लगवाने वालों पर. उन्हें पहले से बताना भी होगा. उसके बाद ही ट्रायल संभव हैं.

प्रश्न : जनता के लिए टीका कब तक आ जाएगा ?

उत्तर : ट्रायल में सफलता के बाद नियंत्रकों से चर्चा होगी संस्तुति के लिए. लगभग छह सप्ताह में उम्मीद है.

प्रश्न : जनसंख्या के कितने प्रतिशत को टीका लगवाना पड़ेगा, ताकि हर्ड-इम्यूनिटी मिल जाए और विषाणु का प्रसार रुक जाए ?

उत्तर : हम इस विषाणु के सम्बन्ध में इसका उत्तर नहीं जानते. ऐसा लगता है काफ़ी बड़े प्रतिशत में लोगों को वैक्सीन लगानी पड़ेगी.

(पैनल में प्रोफ़ेसर सारा गिल्बर्ट , प्रोफेसर एंड्र्यू पॉलर्ड , प्रोफ़ेसर एड्रियन हिल , प्रोफ़ेसर कैथरीन ग्रीन एवं प्रोफ़ेसर टेरेसा लैम्ब। साक्षात्कार मेडिकल-शिक्षा-वेबसाइट मेडस्केप से हिन्दी अनुवाद किया गया है )

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