Opinion

#Corona ||Opinion|| नया नहीं है कोरोना, 2002 में चीन में हुई थी 8000 मौतें, दुनिया को पता था, 2007 की रिपोर्ट में थी चेतावनी, दुबारा लौटा तो टाइम बम जैसा खतरा 

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  • (अक्टूबर 2007 में एक Review Article, American society for microbiology journal में प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक है- Severe Acute Respiratory Syndrome Corona virus as an Agent of Emerging and reemerging infection. इसके लेखक VINCENT C.C CHENG, SUSANNA K.P LAUS, PATRICK C.Y WOO AND KWOKYU हैं. ये लेख इसी रिव्यू पर आधारित है)

Dr. Laldip Gope 

कोरॉना ग्रुप ऑफ वायरस है. जिसमें कुल 28 वायरस हैं. कोविड-19 नया वायरस है. इससे पहले 16 नवंबर 2002 को SARS-Cov वायरस चीन केगुआंगडोग प्रांत के फोसान में पहली बार मिला था. 17 नवंबर 2002 को हुवान में एक रेस्टोरेंट में काम करने वाले शेफ को निमोनिया हुआ. फिर यह सिलसिला गुआंगडोग छोटे हॉस्पिटल से बड़े हॉस्पिटल में फैलने लगा. इस वायरस ने लगभग 8000 हजार लोगों को अपनी चपेट में ले लिया था. इस Review paper के निष्कर्ष में यह अंदेशा जताया गया था कि अगर यह वायरस पुनः लौटता है तो यह न सिर्फ हमारे इम्युन सिस्टम को डैमेज करेगा बल्कि पूरे दक्षिण चीन को टाइम बम में बदल देगा.

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(Corona virus are will known to undergo genetic recombination which may lead to now genotypes and out break. The presence of a large reservoir of SARS-COV like viruses in horse shoe bats, together with the culture of eating exotic mammals in southern China is a time bomb)

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साईंस के सबसे प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर’ में कहा गया है कि SARS COV, COVID-19 जानवरों से मनुष्य में आया है. और यह मनुष्य से मनुष्य में फैलता है. यह मैनमेड है. अभी तक के आधिकारिक रिसर्च में इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती है. हालांकि अब एक देश दूसरे देश पर इसका ठीकरा फोड़ रहे हैं. जबकि जरूरत इस बात की है कि पहले की गलतियों से सीख लेते हुए इस पर नियंत्रण के उपाय खोजे जायें. गौरतलब है कि इस खतरनाक वायरस के संकेत 2002 में मिल गये थे. तो अब तक इस रिसर्च क्यों नही हुआ, ये बड़ा सवाल है. असल में पूरी दुनिया में आधुनिक हथियारों की खरीद-बिक्री की होड़ मची हुई है. यह दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. वैश्वीकरण ने दुनिया को एक गांव में बदल दिया है.

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Stockholm International peace Research Institute (SIPRI) के अनुसार पूरे विश्व में सैन्य उत्पादों पर 2018 में 1822 बिलियन डॉलर खर्च किये गए. सिर्फ 2018 में 100 हथियार उत्पादक कंपनियों (चीन को छोड़कर) सैन्य उपकरणों पर 420 बिलियन डॉलर की बिक्री हुई. लेकिन अगर चीन के हथियारों की बिक्री भी इसमें जोड़ दी जाय तो यह कई गुना बढ़ जाएगा. लेकिन इसके मुकाबले रिसर्च औऱ अन्य शोध पर कम खर्च किया गया.

होड़ की वजह से गरीब देश अपने नागरिकों की शिक्षा और स्वास्थ्य में कटौती कर हथियार खरीदते हैं. डर और दहशत का माहौल पूरी दुनिया में विकसित राष्ट्र रचते हैं. और इसका एकमात्र समाधान दिखता है आत्मरक्षा के लिए हथियार की खऱीदारी. ‘सिप्री’ (SIPRI) के मुताबक 2014-18 में हथियारों के सबसे बड़े पांच निर्यातक देश में, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी और चीन हैं. जबकि पांच प्रमुख आयातक देश में सऊदी अरब,  भारत,  इजिप्ट, ऑस्ट्रेलिया और अल्जीरिया हैं.

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आजय के परिदृश्य में शोध का उद्देश्य मुनाफा हो गया है. और इंसान सामान में बदले जा रहे हैं. क्यूरी दंपति जैसे वैज्ञानिक विरले ही मिलेंगे. जिनकी खोज और शोध मानवता को आसान बनाने के लिए थी. और जिन्होंने अपने शोध का पेटेंट तक नहीं करवाया था. आज कैंसर के मरीजों जो कीमियो थेरेपी की जाती है, इसमें रेडियम किरणों का इस्तेमाल होता है. इसके अविष्कारक भी क्यूरी दंपती ही थे. जिन्होंने इस खोज के बदले में किसी कंपनी या संस्था से कोई राशि नहीं ली थी. लेकिन अब न ऐसे वैज्ञानिक हैं न शोध को प्रोत्साहन देने वाली सरकारें.

सरकार का दायित्व है कि वो शोध औऱ विज्ञान को प्रोत्साहन दे. लेकिन दुर्भाग्य है कि अपने देश में और दुनिया में शोध पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है. ICMR(NIOH) अहमदाबाद में 2017 में दर्जनों वैज्ञानिक के पद के लिए आवेदन आमंत्रित किये गए. लेकिन अचानक से 2019 में नियुक्ति प्रक्रिया को रद कर दिया गया. कमोबेश अधिकांश शोध संस्थानों का यही हाल है. वैज्ञानिक चेतना के विकास में हम लगातार पिछड़ रहे हैं.

बहरहाल, इसी Review Paper में VIRAL ENTRY को रोकने के लिए Lysosomatropicagend का जिक्र है. साथ ही chlroquine के बारे में भी जानकारी दी गई है. SARS-COV में औसत मृत्यु दर 10% है. जबकि COVID-19 में मात्र 2% है. ऐसे में इस वायरस से ठीक होने की दर 98% है. खतरा बस इस बात से है कि यह फैलता बहुत तेजी से है. इससे WHO और भारत सरकार की गाइडलाइन से बचा जा सकता है. चीन और दक्षिण कोरिया ने आंशिक रूप से इस पर नियंत्रण भी कर लिया है. यहां आंशिक नियंत्रण भी तभी संभव हो पाया है जब इन देशों ने शोध औऱ विज्ञान पर काम किया है.

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लेखक के बारे में – आइआइटी धनबाद आइएसएम में वैज्ञानिक स्कॉलर, डिपार्टमेंट ऑफ पेट्रोलियम इंजिनियरिंग में कार्यरत. 


शिक्षा            –  एमएससी एवं पोस्ट ग्रेजुएट डिपलोमा इन हूमन राइटस
प्रकाशित रचनाएँ  –  ‘‘तीसरी दुनिया के देश और मानवाधिकार‘‘
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता कहानी एवं आलेख    प्रकाशित
संप्रति एवं पता    –   डिपार्टमेंट ऑफ पेट्रोलियम इंजिनियरिंग
आई0 एस0 एम0 धनबाद झारखण्ड
पिन न0 – 826004
मोबाईल न0 – 07677419434

(डिस्क्लेमर :  ये लेखक के निजी विचार हैं. इसके तथ्यों से newswing.com का कोई लेनादेना नहीं है. लेख में दी गयीं सूचनाएं और जानकारी लेखक के अपने शोध और अध्ययन पर आधारित हैं)

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