Opinion

कोरोना ने देश में पहले से जारी आर्थिक संकट को और गहरा बना दिया है- जमीनी सच्चाई सिर्फ इतनी ही नहीं है

FAISAL ANURAG

इनदिनों सरकारों का द्वंद साफ-साफ साफ देखा व समझा जा सकता है. केंद्र सरकार की गाइडलाइन में तो यह साफ दिख रहा है. एक ओर कोरोना वायरस की हकीकत है. और दूसरी ओर तालाबंदी से ठप हो गया आर्थिेक तंत्र और जीवन. किसान हों या श्रमिक या मध्यवर्ग. सब की परेशानियां का शोर सुनायी पडने लगा है. खास कर प्रवासी मजदूरों की लाचारी हर तरफ देखी जा सकती है. मुंबई या सूरत तो केवल बानगी भर हैं.

कोटा में तालाबंदी के शिकार एक लाख उन छात्रों की पीड़ा भी सोशल मीडिया पर तैरने लगी है. जो बेहतर जीवन के सपनों की तैयारी कर लाखो खर्च कर वहां पढने जाते हैं. बंद पड़े उद्योगों का संकट भी गहरा है. गाइडलाइन में कुछ इलाकों में आर्थिक गतिविधियों और उद्योगों के खोले जाने की इजाजत दी गयी है. लेकिन इस सवाल के हल के लिए कोई रोडमैप नहीं है कि उद्योगों के सामने जो लिक्वडीटी का सवाल है.

वे किस तरह हल होंगे. आम दिनों ही लिक्वीडिटी के कारण केवल हावड़ा में सैकडो उद्योग बंद हो गए थे और लाखेां मजदूरो की नौकरी छीन गयी थी.

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इस समय मजदूरों का भी मनोविज्ञान अपने घरपरिवार से दूर एक खास तरह का अवसाद पैदा कर रहा है.ऐसे हालात में किसी भी इलाके में उद्योगों को केवल सरकारी इजाजत या इच्छाशक्ति से नहीं शुरू किया जा सकता है. उद्योगों के संचालक इस तथ्य को दबी जुबान से तो कह रहे हैं कि उद्योग का संकट केवल तालाबंदी के कारण ही नहीं बल्कि है वह पिछले तीन सालों से आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं. झारखंड के ही आदित्यपुर, टुपुदाना और रामगढ के उद्योगों और उसके संचालकों और मजदूरों को भारी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है. इन तीनों ही क्षेत्रों में कई उद्योग बंदी के शिकार भी हुए हैं. हालांकि कोरोना वायरस संकट ने यह बहाना तो दे दिया है कि वहीं आर्थिक संकट का कारक है.

लेकिन पिछले तीन-चार साल के घटनाक्रमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. केंद्र सरकार आर्थिक जीवन को गति देने में पहले से ही कमजोर प्रदर्शन करती रही है. जीडीपी के आंकड़े  तो यही गवाही देते हैं. अब 2020 के ग्रोथरेट का जो अनुमान है वह 1.9 ही है. लेकिन इसके पहले के तीन सालों से सरकार के आंकड़े और उसकी हकीकत को लेकर जानकारों की जीखी प्रतिक्रिया आती रही है. नरेंद्र मोदी के कभी प्रमुख आर्थिक सलाकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम तो आंकडों में हेराफेरी तक का आरोप लगा चुके हैं. कोरोना क्राइसिस के पहले ही भारत में बेरोजगारी के आकड़े भयावह तस्वीर पेश करते रहे हैं.

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एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक़ बेरोज़गारी दर पिछले 45 वर्षों के उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के दावों की पोल खोलते हुए सीएमआईई की हालिया रिपोर्ट बता रही है कि देश में बेरोज़गारी दर जनवरी में 7.16% के मुक़ाबले फ़रवरी में बढ़कर 7.78% हो गयी है. जो अक्टूबर 2019 के बाद सबसे ज़्यादा है. शहरी इलाक़ों में फ़रवरी में बेरोज़गारी दर 8.65% रही, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह 7.37% हो गयी. हालांकि गांवों में जो रोज़गार है, उसका स्तर बहुत ही ख़राब है.

और मज़दूरी भी शहरों की अपेक्षा काफ़ी कम हैं. बढ़ती बेरोज़गारी की सबसे भयंकर मार शिक्षित नौजवानों पर पड़ रही है.  20 से 29 साल के ग्रेजुएट युवाओं में बेरोज़गारी की दर 42.8 पहुंच गयी है. वहीं, सभी उम्र के ग्रेजुएट के लिए औसत बेरोज़गारी दर इतिहास में सबसे ज़्यादा 18.5 फ़ीसदी पर पहुंच गयी है. इसी तरह का हाल पोस्ट-ग्रेजुएट के लिए भी है. कॉलेज से निकलर जॉब मार्केट में आने वाले युवओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है. 20 से 24 साल की उम्र के युवाओं के बीच सितम्बर से दिसम्बर के दौरान बेरोज़गारी की दर दोगुनी होकर 37 फ़ीसदी पर पहुंच गयी.

बीते पांच सालों में देश के सात प्रमुख सेक्टर्स टेक्सटाइल, जेम एण्ड ज्वेलरी, बैंकिंग, आटोमोबाइल्स, रीयल एस्टेट, टेलीकॉम और एविएशन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 3.64 करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं. जिसमें सर्वाधिक 3.5 करोड़ नौकरियां टेक्सटाइल सेक्टर की हैं.

झारखंड और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों की आर्थिक हालत तो और भी खराब है. हालांकि बिहार अपना ग्रोथ रेट तो 11 प्रतिशत तक बताता रहा है. लेकिन जमीनी हालत इसकी गवाही नहीं देते हैं. चूंकि आंकड़ों को ले कर भ्रम है और इन भ्रमों को दूर करने में केंद्र सरकार नाकायाम ही होती है. पिछले छह सालों से देखा जा रहा है कि मीडिया जब केवल सांप्रदायिक एंगल की ही तलाश में और नफरत बढ़ाने की भूमिका में हो, आर्थिक सवालों पर तीखे सवाल की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

लेकिन हकीकत हर बार तमाम तरह के दीवार को लांघ कर अपना चेहरा दिखा ही देती है. यही कारण है कि किसान या छोटे  उद्यमी या श्रमिकों का भरोसा नहीं बन रहा है. आर्थिक संकट से निकालने के लिए जिस रोडमैप की अपेक्षा की जा रही है, उसे प्रधानमंत्री अपने अब तक के संबोधनों में नहीं दे पाये हैं और न ही वित्तमंत्री.

भारत का संकट आर्थिक तंत्र का तो जो हाल है सो है, साथ ही समाज में जिस तरह के नफरत का माहौल है वह संकट को गहन बनाता है. हिंदी के प्रसिद्ध कवि ने इस पूरे संकट को अपने शब्दों में इस तरह व्यक्त किया है : कहते हैं, दुख सारे भेद-भाव भुला कर लोगों को एक कर देता है. लेकिन कुछ समाज ऐसे होते हैं जहां विपत्तियां  और पीडाएं भी कोई करुणा कोई हमदर्दी नहीं जगा पातीं. लिहाजा कोरोना भी जारी रहता है, घृणा भी जारी रहती है, साम्प्रदायिकता भी जारी रहती है, निर्दोषों की गिरफ्तारी भी जारी रहती  है, कालाबाजारी भी जारी रहती है, मनुष्यों का दरिंदों में बदलना भी जारी रहता है.

सरकार को इन हालातों में हस्तक्षेप कर स्थितियों को बदलने की जरूरत है. ताकि सामूहिक श्रम शक्ति का बेहतर इस्तेमाल कर संकट से बाहर निकला जा सके.

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