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कोरोना संकट : शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को देना होगा जवाब

Faisal Anurag

आंकडों को गुलाबी बना कर पेश करने के बावजूद तथ्य यह है कि भारत में कोविड संक्रमण के शिकार लोगों की संख्या 50 लाख से ज्यादा हो चुकी है और 82 हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. इन आंकड़ों को चाहे जितने अच्छे तरीके से पेश किया जाए. क्या यह जांच कभी होगी कि इसमें कितने लोगों की मृत्यु लापरवाही के कारण हुई है ? कोरोना की वजह से सबसे अधिक तबाही अमरीका, भारत और ब्राजील में हुई है. अब तीनों ही देशों के राजनीतिक नेतृत्व के प्रबंधन को ले कर सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि इन देशों के नेतृत्व की विफलता की वजह से कोरोना का संकट और बढ़ा. अमरीका के नवंबर में होने वाले चुनाव में तो डोनाल्ड ट्रंप के लिए कोविड एक बडा संकट बना हुआ है. चुनावी सर्वेक्षणों में वे डेमोक्रेट उम्मीदवार जो वाइडन से दस फीसदी मतो से पिछडे हुए है. इसमें आने वाले दिनों में और अंतर की संभावना व्यक्त की जा रही है. चूंकि अमरीका का मीडिया और लोकतांत्रिक नागरिक समाज सजग है और वह ट्रंप की नीतियों के खिलाफ मुखर होता है.

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मीडिया को होना होगा जबावदेह 

इसके विपरीत भारत में मीडिया का चेहरा बिल्कुल अलग है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों मीडिया के चेहरे को ले कर गंभीर टिप्प्णियां की हैं. सुप्रीम कोर्ट मामनता है कि मीडिया को भी जबावदेह होना चालिए. प्रमुख चैनलों ने अर्थव्यवस्था और कोविड से उभरे संकट को दरकिनार कर सुशांत सिंह राजपूत के बहाने केंद्र को राहत दिया है और ऐसे और सांप्रदायिक  सवालों को प्रमुखता देता है. जिन कुछ छोटे चैनलों ने अर्थव्यवस्था या कोविड के सवालों को गंभीरता से उठाया है वे बंद हो चुके हैं. इनमें स्वराज एक्सप्रेस भी है जिसके लाइसेंस को संचालक ने उपयोग करने देने से मना कर दिया. कई छोटे अखबार और बेबसाइट भी आर्थिक संकट के शिकार इस दौरान हुए है. सुप्रीम कोर्ट ने एड देने में सरकार की भूमिका पर भी सवाल खडा किया है जिसमें कुछ खास को ही महत्व दिया जाता है.

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सरकार के पास मजदूरों की मौत का आंकड़ा नहीं 

यह सब कुछ ऐसे समय में चल रहा है जहां केंद्र सरकार संसद को बताती है कि लॉकडाउन पीरियड में मारे गए श्रमिकों का कोई आंकडा उसके पास नहीं है. प्राइम टाइम बहसों में इस सवाल को गायब यूं ही नहीं किया गया है. जब कि पिछले कुछ महीनों में करोडों मजदूरों की त्रासदी हुई और इनमें अनेक रास्ते में ही मर गए. महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास रेल से कटे 16 मजदूरों को भी केंद्र ने गिनना जरूरी नहीं समझा. इससे विपक्ष को भी मौका मिला. राहुल गांधी ने ट्वीट कर टिप्पणी किया है :  मोदी सरकार नहीं जानती है, लॉकडाउन में कितने प्रवासी मजदूर मरे, और कितनी नौकरियां गयीं. ना गिना तो क्या मौत ना हुई? हां मगर दुख है सरकार पे असर ना हुई, उनका मरना देखा ज़माने ने, एक मोदी सरकार है जिसे ख़बर ना हुई.सरकार ने मीडियाकमिर्यों और चिकित्सकों को कोरोना वारियर की संज्ञा दिया लेकिन उसे यह भी नहीं पता इनमें कितने कोरोना से मरे हैं. एक ऐसी सरकार जिसके पास न आंकडें हैं और न ही कोरोना को रोकने का उपाय. मोदी ने तो हाल में ही कहा कि जब तक वैक्सिन नहीं आता हालात में सुधार नहीं. लेकिन विश्व स्वास्थय संगठन ने उन 10 देशों का नाम गर्व से लिया है जिन्होने बिना वैक्सिन के ही कोरोना को नियंत्रित करने का बेहतर कार्य किया है. इसमें दक्षिण कोरिया, वियतनाम और न्यूजीलैंड के साथ पड़ोसी देश पाकिस्तान का नाम भी दर्ज है. जिस पाकिस्तान को कहा गया था कि वहां सबसे ज्यादा मौतें होंगी उसे बेहतर प्रबंधन का सर्टिफिकेट डब्लूएचओ दे रहा है. भारत का नाम अमरीका या ब्राजील के साथ प्रथम तीन में आना ही बताता है कि सिर्फ आंकडों का सवाल ही नहीं बल्कि कोविड संबंधी दूसरे सवाल भी है जिस पर सोचना होगा.

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