Opinion

कोरोना संकटः विफल शासकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा – तानाशाही के रूप में बदलने की आशंका

Faisal Anurag

संकट से निपटने के बजाय अनेक शासकों ने अपनी राजनीतिक सत्ता को और केंद्रीकृत करने का अभियान तेज कर दिया है. हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओबरान ने बिना कैबिनेट और संसद की मंजूरी लिए सारे संवैधानिक अधिकार को अपने हाथ में ले लिया है.

और संसद से भी इसके बाद मंजूरी ले ली है. यही नहीं उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर आजीवन बने रहने का एलान भी कर दिया है और इसके लिए चुनावों की अनिवार्यता को स्थगित कर दिया है.

सारे अधिकार हासिल करने से पहले उन्होंने हंगरी के सुप्रीम कोर्ट में अपने पसंद के लोगों को नियुक्त किया और हर तरह की चुनौती का रक्षाकवच हासिल कर लिया.

यूरोप में यह कोई मामूली घटना नहीं है. लेकिन यूरोप जैसे जीवंत लोकतंत्र वाले क्षेत्र में भी इसकी चर्चा कोई खास नहीं हो रही है. इक्के-दुक्के अखबार ही इस विषय पर खबर छाप रहे हैं.

इसे भी पढ़ें – #Lockdown_Effect: लोगों में बढ़ रही चिड़चिड़ाहट, रिनपास और सीआइपी की हेल्पलाइन नंबर पर रोजाना आ रहे 60 से 70 कॉल्स

हंगरी वह देश है, जो किसी जमाने में समाजवादी था और सोवियत संघ के खेमे का अग्रणी दस्ता था. हंगरी में जब वर्ष 1988 में समाजवादी सत्ता के खिलाफ विद्रोह हुआ, तो स्थायी जन कल्याणकारी लोकतंत्र का वायदा किया गया था. लेकिन नोवल करोना वायरस से भयभीत लोगों को सुरक्षा देने के नाम पर पूरी सत्ता को ही एकाधिकारवादी तानाशाही के रूप में बदल दिया गया है.

ओबरन लंबे समय से हंगरी के प्रमुख बने हुए हैं. वर्ष 2010 में जब वे सत्ता में आये थे और चुनावों में भी उन्होंने अनेक लुभावने नारे दिये थे, जिसे वह जमीन पर नहीं उतार सके. उनके शासनकाल में हंगरी की रैंकिंग हर क्षेत्र में फिसलती गयी. करोना वायरस ने उनके राजनीतिक महत्वकांक्षा को एक  तानाशाही के रूप में बदल दिया है.

इस परिघटना और यूरोप सहित दुनियाभर के अनेक देशों के शासकों की महत्वाकांक्षा को देखते हुए इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि दुनियाभर में उदार लोकतंत्र एक बार फिर से दम न तोड़ दे. इसका एक बड़ा कारण वह आर्थिक संकट भी है, जिसे संभालने में अमेरिका, चीन, रूस, भारत सहित लगभग सभी देश विफल होते दिख रहे हैं.

नोवल कोरोना वायरस ने आर्थिक हालात को तहस-नहस कर दिया है. बाजार की अस्थिरता और बेचैनी को देखते हुए शासकों के हाथ-पांव फुले हुए हैं. अमेरिका में पिछले हफ्ते 33 लाख लोगों की नौकरी चली गयी. इस हफ्ते इससे अधिक लोगों की नौकरी दावं पर है.

अनेक देशों में कंपनियां अपने कर्मचारियों के वेतन में या तो आधी कटौती कर दी है या उन्हें बिना वेतन के घर से काम करने को कहा है.

गल्फ देशों में तो हालात चिंताजनक हैं. रूस और साऊदी अरब के तेल युद्ध के कारण कच्चे तेल के दामों में गिरावट दर्ज की गयी है. इस गिरावट के कारण गल्फ देशों की सारी चमक प्रभावित हो रही है. भारत समेत अधिकांश देशों में भी निजी क्षेत्रों में रोजगार का भारी संकट है.

इसे भी पढ़ें – 33 साल बाद भी ‘रामायण’ का जादू बरकरारः री-टेलीकास्ट को मिली हाईएस्ट रेटिंग, बनाया रिकॉर्ड

अगर हम भारत की आर्थित हालात की चर्चा करें, तो भारत करोना वायरस के अटैक के पहले से ही आर्थिक मंदी की चपेट में था. कोरोना वायरस ने तो उसकी हालत और खराब कर रखी है. चुप्पी साधे बैठे कॉरपोरेट की ओर से हालात की गंभीरता पर पहली चिंता बजाज ग्रूप के जूनियर बजाज ने प्रकट किया है. उन्होंने लॉकडाउन पर टिप्पणी किया है. भारतीय मीडिया ने उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया है.

लेकिन कई अर्थशास्त्री अपनी चिंता विभिन्न उपलब्ध माध्यमों से लगातार कर रहे हैं. इस संदर्भ में इन दिनों जानेमाने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज खूब चर्चा में हैं. उन्होंने इस संदर्भ में कई मीडिया को तल्ख इंटरव्यू दिया है.

कारवां ने उनके इंटरव्यू का सार इस तरह प्रकाशित किया है: “हमें नहीं पता कि कोविड-19 का जारी संकट कब खत्म होगा. यह कई महीनों या पूरे साल ही जारी रह सकता है. हमारे अर्थतंत्र पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इस वायरस का असर कितने लंबे वक्त तक रहता है. यदि हम स्वास्थ्य संकट से चंद हफ्तों में उबर जाते हैं, तो भी इसकी बहुत बड़ी मानवीय कीमत चुकानी पड़ेगी.

लेकिन अर्थतंत्र शायद एक हद तक तेजी से सुधार भी कर जाये. लेकिन यदि संकट लंबा खिंचता है और कम-ज्यादा प्रबलता वाले लॉकडाउन होते रहते हैं, तो अर्थतंत्र के नीचे लुढ़कने की संभावना है. क्योंकि यह एक तरंगनुमा असर छोड़ेंगे. बैंक दीवालिया हो जायेंगे.

बैंक अपना कर्ज नहीं वसूल पायेंगे और आर्थिक संकट पैदा होगा. इस बीच स्वास्थ्य सेवाओं और संभवतः आवश्यक सामग्री पर भारी बोझ बना रहे. यह आर्थिक और मानवीय रूप से डरावनी स्थिति होगी.”

सामाजिक रूप से देखें तो अन्य तरह की विकृतियां पैदा हो जायेंगी. मिसाल के लिए जैसे-जैसे लोग और डरेंगे, आवासीय कॉलोनियों अपने आपको बंद कर लेंगी और जिन लोगों पर संक्रमण का शक होगा, उन्हें बाहर निकाल देंगी या खाने के लिए दंगे जैसी हालत बन जायेगी. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि ऐसा न हो.

अल्पावधि में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली कैसे काम करती है. पीडीएस व्यवस्था भूख से बचा सकती है. लेकिन अभी इसपर बहुत दबाव है. यह अपने-आप में काम नहीं करती, बल्कि एक चेन का हिस्सा होती है. जिसमें लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने के लिए अर्थतंत्र के बाकी हिस्सों को काम करते रहना होता है.

इसे भी पढ़ें – #Corona पॉजिटिव के संपर्क में आये शख्स के घर पहुंची बोकारो पुलिस, 29 मार्च को पीड़ित के साथ आसनसोल से लौटा था बगोदर

खाद्यान्न को यहां से वहां पहुंचाने के लिए यातायात, दूरसंचार, उपकरण, चालू प्रशासन और अन्य चीजों की आवश्यकता होती है. यह सुनिश्चित करना बहुत कठिन होगा कि ऐसी परिस्थिति में यह व्यवस्था प्रभावी रूप से काम करती रहे.

जिन स्थानों में पीडीएस काम नहीं करेगी, वहां भोजन के लिए दंगे होंगे. हां, यह बात जरूर है कि भारत में लोग बहुत आसानी से ऐसा नहीं करते.

अब आप ही देखिये कि जो प्रवासी मजदूर आपको टीवी में पिछले कुछ दिनों से लगातार दिख रहे हैं, उनको देखकर क्या आपको इस बात की हैरानी नहीं हो रही कि ये लोग स्थानीय दुकानों और गोदामों को क्यों नहीं लूट रहे.

जब लोग भूखे और कमजोर होते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि वे बगावत ही करेंगे. लेकिन भोजन के लिए दंगे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

जारी लॉकडाउन एक मानवीय संकट बनने लगा है. प्रधानमंत्री किसान योजना, पेंशन योजना और अन्य योजनाओं से धन का हस्तांतरण करने में वक्त लगेगा. यदि हस्तांतरण जल्दी होता भी है, तो भी लोग तुरंत ही बैंकों में जाने की स्थिति में नहीं होंगे. और जब भी उनको बैंक जाने दिया जायेगा, तो नोटबंदी जैसी भगदड़ मचेगी.

सरकार को खाद्यान्न के भंडार को तुरंत खोल देना चाहिए. उसके पास खाद्यान्न का बहुत बड़ा स्टॉक मौजूद है. उसे इसे खोलने से कौन रोक रहा है. भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 6 करोड़ टन गेहूं और चावल है. यह स्थिति गेहूं की कटाई के पहले की है, जब आमतौर पर यह भंडार बढ़ जाता है.

कई बार तो 8 करोड़ टन तक बढ़ जाता है. यह उस बफर स्टॉक से तीन गुना अधिक है, जो संकट के वक्त की जरूरत के लिए होता है. इस अनाज को जारी करना सुनिश्चित करेगा कि सभी स्थानों में खाद्य वितरण केंद्र काम कर रहे हैं.

ऐसे लोग हमेशा होते हैं, प्रवासी मजदूर एवं अन्य, जो स्थापित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बाहर होते हैं. हमें सभी राज्यों में आपातकालीन सेवाएं बनाने की जरूरत है, जहां जाकर लोग बिना राशन कार्ड या अन्य दस्तावेज दिखाये तुरंत ही भोजन प्राप्त कर सकें.

यह दुखद है कि हमें उन्नीसवीं शताब्दी के अकाल राहत के तरीके अपनाने पड़ेंगे, जिन्हें बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन की दुकान) जैसे गरीमापूर्ण तरीकों से बदला गया था. लेकिन फिलहाल भूख से बचाव का मुझे कोई दूसरा रास्ता समझ नहीं आ रहा.

इसे भी पढ़ें – #CoronaVirus: भारत के लिए एक अरब डॉलर के इमरजेंसी फंड को #WorldBank ने दी मंजूरी

Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: