Opinion

कोरोना क्राइसिस के सबक

कोरोना क्राइसिस के सबक
Ramapati Kumar

कोरोना यानि कोविड-19 ने जिस तरह से विश्व को सभी मोर्चों पर प्रभावित किया है, वैसे में इस कालावधि को ‘कोरोना युग’ और इतिहास की एक विभाजन रेखा के तौर पर देखा जा रहा है. विश्व प्रसिद्ध पत्रिकाओं, ‘इकोनॉमिस्ट’, ‘न्यू स्टेट्समैन’, ‘गार्डियन’, ‘न्यूयॉर्क’, और प्रमुख चिंतकों ने इस बहस को मजबूती दी है कि अब दुनिया वैसे नहीं रहेगी, जैसे चंद महीनों पहले थी. कोई इसे ‘पीक ग्लोबलाइजेशन’ के अंत तो कोई इसे ‘टर्निंग प्वाइंट इन हिस्ट्री’ बता रहा है.

‘रिवर्स/रिस्ट्रिक्टेड ग्लोबलाइजेशन’ (सीमित भूमंडलीकरण) और ‘वेलफेयर स्टेट’ की वापसी की संभावनाओं और आशंकाओं के बीच विकसित और विकासशील दुनिया में इसने ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम और लोकल इकोनॉमी में संरचनात्मक परिवर्तन की जमीन तैयार कर दी है. एक ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नित-नए ‘नैरेटिव’ बनाये और तोड़े जा रहे हैं.

विश्वयुद्ध कालीन दुनिया के बाद पहली बार सभी देशों (अपवादस्वरूप भारत) में एक साथ ‘नेगेटिव ग्रोथ रेट’ का आंकलन है. ‘ग्लोबल प्रोडक्टिविटी और सप्लाई-चेन’ के ध्वस्त होने से अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे संपन्न देशों में दवा, मेडिकल टेस्ट किट से लेकर वेंटिलेटर्स की जो भयावह खामियां दिखीं, उससे अनिवार्य सेवाओं पर नयी बहस छिड़ गयी है और पब्लिक हेल्थ सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.

‘सोशल स्पेंडिंग’ यानि सामाजिक सेवाओं पर खर्च अब प्राथमिकता में है. अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों में ‘एसेंसिअल गुड्स’ और सामान्य चीजों के मामले में चीन जैसे राष्ट्र पर निर्भर होने के बजाय इन्हें अपने देश में निर्मित करने की मुहिम तेज है. कृषि और खाद्यान्न के मामले में दूसरे देशों पर निर्भरता को बदलने का दवाब भी पश्चिमी यूरोप पर पड़ रहा है. इसका अर्थ यह है कि अब ‘ग्लोबल प्रोडक्शन और सप्लाई-चेन’ का कोई एक देश इकलौता स्रोत नहीं रहेगा.

पूरी दुनिया में ‘नेगेटिव ग्रोथ रेट’ के बीच केवल भारत का थोड़ा पॉजिटिव ग्रोथ रेट अनुमानित है. यह सुखद संकेत है पर चुनौतियां कम नहीं हो जाती. विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में भी सरंचनात्मक परिवर्तन होना तय है.

भारत के पूर्व इकोनॉमिक एडवाइजर अरविन्द सुब्रमण्यन के अनुसार, देश को कोरोना के दंश से उबरने में वर्ष 2021 तक करीब 980 बिलियन डॉलर के स्टिमुलस पैकेज की जरूरत होगी. चूंकि करीब 90 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र से आते हैं, ऐसे में इंटरनेशनल लेबर ओर्गेनाईजेशन के अनुसार भारत के करीब 400 मिलियन मजदूर गरीबी के गर्त में धकेले जा सकते हैं.

‘रिवर्स माइग्रेशन’ कमजोर आर्थिक सेहत वाले राज्यों के लिए विशाल समस्या है, जहां बॉटम ऑफ़ पिरामिड’ यानि समाज के निम्नतम तबकों के हितों को केंद्र में रखना चुनौती होगी.

कोरोना के विकराल रूप के पीछे ग्लोबल पोलिटिकल इकोनॉमी से उपजे पर्यावरणीय संकट और मानवजनित कारगुजारियां भी जिम्मेवार है. कोरोना ने साबित किया है कि पर्यावरणीय स्वास्थ्य और इकोनॉमी का आपस में गहरा सम्बन्ध है.

कई महत्वपूर्ण सबक सामने आ रहे हैं, व्यक्तिगत एवं पारिवारिक स्वास्थ्य के साथ-साथ सामुदायिक स्वच्छता व स्वास्थ्य उतना ही जरूरी है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के टीएच चान स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ सहित कई शोध संस्थाओं के अनुसार, वायु प्रदूषण का कोरोना के जानलेवा होने से सीधा सम्बन्ध है, क्योंकि प्रदूषित ‘पर्टिकुलेट मैटर 2.5’ के बढ़ने से कोविड-19 घातक हो जाता है, खासकर भीड़भाड़ वाले शहरों में.

चीन का वुहान शहर भी लम्बे अरसे से प्रदूषित शहरों में शुमार होता रहा है. भारत के अधिकतर कोरोना हॉटस्पॉट प्रवासियों के केंद्र और वायु प्रदूषित इलाके हैं.

कोविड-19 के म्युटेशन में बदलाव और पुनर्वापसी की आशंकाओं के बीच इसके वैक्सीन के ‘ब्रेकथ्रू’ को लेकर जितनी बड़ी चुनौती है, उससे ज्यादा बड़ी कठिनाई है करीब 7 अरब की आबादी वाले विश्व में इसे पूरा करना और खर्च की व्यवस्था करना, खासकर जब यह प्रोटेक्टेड पेटेंट’ से लैस और महंगा हो.

टीकाकरण अभियान अमीर और गरीब मुल्कों के बीच असमानता के अंतर को ज्यादा गहरा करेगा. सीमित संसाधनों और पहले से कोरोना से पस्त भारत जैसे विकासशील देश के लिए आर्थिक रफ़्तार को गति देते हुए यूनिवर्सल इम्म्यूनाइजेशन (सार्वत्रिक टीकाकरण) समय पर पूरा करना बड़ी चुनौती है.

चीन के विकल्प के रूप में भारत को अगला मैनुफैक्चरिंग और सप्लाई चेन हब’ के तौर पर देखा जा रहा है. चीन ‘एक्टिव फर्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट’ का केंद्र है, वहीँ भारत जेनेरिक ड्रग के उत्पादन में सबसे ऊपर है और यहां दुनिया का दो-तिहाई से अधिक वैक्सीन बनता है.

भारत फर्मास्यूटिकल इंडस्ट्री का ‘हब’ और वैक्सीन के ‘मास प्रोडक्शन और सप्लाई का केंद्र’ बन सकता है. खासकर जब मेडिकेशन आने वाले दिनों में कंज्यूमर डिमांड में सर्वापरि होने जा रहा है. भारत को कितना फायदा होगा, इसका जवाब भारत की बायोमेडिकल और बायोटेक्नोलॉजी में शोध-विकास क्षमता और साहसपूर्ण नीतियों पर निर्भर करेगा.

जिस प्रकार विकास के अंधाधुंध औद्योगिकीकरण आधारित आर्थिक मॉडल ने पर्यावरण और आबोहवा का क्षरण किया है और कोरोना ने असुरक्षित दुनिया की झलक दिखाई है, उसने सततशील विकास और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों को बारम्बार बहस के केंद्र में ला दिया है.

कोरोना के बहाने दुनिया में प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन (जिसने वायु प्रदूषण जैसे गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दिया है) पर चलने वाले कारखानों और आवागमन के साधनों पर थोड़ा विराम लगा है. इसके संकेत ओजोन परत में सुधार, बेहतर एयर क्वालिटी, स्थानीय परिवेश और पशु-पक्षियों के व्यवहार में जो सकारात्मक परिवर्तन आया है, उसे मानवीय पक्ष से देखने और इसे आगे संभालने की आवश्यकता है.

दरअसल यह समय ‘ग्रीन बजटिंग’ और ‘ग्रीन इकोनॉमी’ के मॉडल को सही अर्थों में अपनाने का है. यह दौर क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म जैसे अक्षय ऊर्जा प्रणालियों को प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि  रखने का है. बदहाल होती अर्थव्यवस्था और कमजोर हो रहे शहरी केंद्रों को गांवों-देहात में विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा से चालित कुटीर उद्योग और लघु धंधे गति दे सकते हैं.

कोरोना ने जिस प्रकार दुनिया की सरकारों और लोगों को सचेत किया है, वह जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने का विश्वव्यापी मॉडल बन सकता है. देश में ‘वेस्ट मैनेजमेंट’ यानि अपशिष्ट प्रबंधन की कमी गंभीर समस्या है, कोरोना के दौर में लाखों की संख्या में इस्तेमाल के बाद छोड़े गये पीपीई किट, हैंड ग्लव्स, फेस मास्क आदि का समुचित निपटान नहीं होना नयी चुनौती होगी.

यह सुखद है कि संकट में भारत ने अपने करोड़ों लोगों की मांगों को पूरा करते हुए हायड्रोक्सी क्लोरोक्विनोन सहित कई जीवन रक्षक दवाओं को जरूतमंद देशों को निर्यात कर कूटनीतिक विजय ही नहीं, अभूतपूर्व सद्भावना भी अर्जित की है.

चीन और अन्य देशों के मुकाबले भारत ने पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जवाबदेही से पूर्ण नेतृत्व प्रदर्शित की है, उसी तरह दवा, वैक्सीन और अनिवार्य चीजों के उत्पादन और न्यायपूर्ण वितरण की राह पर चलते हुए ग्लोबल इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ और ‘बिज़नेस हब’ बने तो भारत की विश्व पटल पर बेहद बुलंद तस्वीर बनेगी.

संकट में अवसर के चिन्ह भी पहचाने जाते हैं, इसलिए सरकार और समाज दोनों के पास ढेरों मौके हैं कि तेज गति से बदल रही दुनिया के मद्देनज़र देश में पोस्ट-कोविड मैनेजमेंट’ के लिए साहसपूर्ण फैसले लें और उन दूरगामी नीतियों का अनुसरण करें, जो पर्यावरण, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, आजीविका और सुरक्षा की कसौटी पर खरा उतरें.

​(लेखक सेंटर फॉर एन्वॉयरन्मेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट, दिल्ली में सीईओ हैं.)

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