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उपभोक्ता तभी तक सुरक्षित है, जब तक नियोक्ता का व्यापार सुरक्षित है

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Rajesh Kumar Das

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केमिस्ट और ड्रगिस्ट एसोसिएशन और CAIT के आह्वाहन पर आहूत देशव्यापी हड़ताल को एक सामान्य हड़ताल मानना देश के नीति निर्माताओं की एक बड़ी भूल होगी. भारत मूल रूप से एक मिश्रित और असंगठित अर्थव्यवस्था का देश है, जहां सरकारी तंत्र, आज़ादी के बाद से आज तक लोगों के लिए रोजगार के उचित अवसर पैदा करने में नाकामयाब ही रहा है. देश के लगभग हरेक भाग में कई प्रकार के रोजगार के अवसरों को वहां के उद्यमियों ने ही अपने सूझबूझ के बल पर विकसित किया है और इस क्रमिक आर्थिक विकास की यात्रा में सरकारी भागीदारी मूलतः नगण्य ही रही है. इस यात्रा में सरकार की भूमिका टैक्स वसूलने पर ही ज्यादातर केंद्रित रही है, और देश में व्यापार के जरिये रोजगारों के अवसर बढ़ाने से जुड़ी नीतियों पर उनका ध्यान कम ही रहा है. अतः विभिन्न प्रकार के व्यवसाय देश के विभिन्न भागों में लोगों की जरूरत के मुताबिक विकसित तो हुए, परंतु सही तरीके से राष्ट्र निर्माण में पेशेवर ढंग से जुड़ नहीं पाए.

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भारत सरकार ने जमीनी स्तर पर उपभोक्ता को लाभ पहुंचे, इसका इंतजाम अपनी राजनीतिक विवशता के लिए तो जरूर किया है, लेकिन एक व्यापारी अपने व्यापार के बूते किस प्रकार एक उपभोक्ता को लाभ पहुंचाते हुए राष्ट्र निर्माण का भी कार्य कर सकें, सरकार ने ऐसी स्थिति अब तक पैदा ही नहीं की है. वास्तव में एक उपभोक्ता ही किसी सेवा और वस्तु के केंद्र में है, लेकिन एक देश के सही आर्थिक विकास के लिए कोई भी सेवा या वस्तु तभी तक एक व्यापार की वस्तु है जब तक वह लाभकारी है और रोजगार पैदा करने वाली है. जिस दिन व्यापार से लाभ समाप्त हो जाता है उसी समय एक बड़ी उलझन उस व्यापारी और उससे जुड़े कर्मचारियों के समक्ष भी उत्पन्न हो जाती है. अगर जनता के समक्ष रोजगार की समस्या खड़ी हो जाए तो उनके उपभोग करने के तरीके में भी एक बड़ा बदलाव आ जाता है जो देश के आंकड़ों के साथ गुणात्मक नजरिए को भी बुरी तरह प्रभावित करता है.

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ई-फार्मेसी और वॉल-मार्ट के साथ फ्लिपकार्ट का आर्थिक गठबंधन वास्तव में देश के वर्तमान आर्थिक फैब्रिक को बुरी तरह नुकसान पहुंचाने वाली है. इसका नुकसान सिर्फ छोटे व्यापारियों को ही नहीं होगा, बल्कि मध्यम काल में यह देश के हर प्रकार के उद्योग धंधों को भी प्रभावित करेगा. इसके साथ दीर्घकाल में यह उपभोक्ताओं को भी उनके लिए जारी रोजगार के अवसरों से दूर कर देगा क्योंकि देश में प्रोडक्टिव माहौल कमतर होता जाएगा, निवेश कम होते जाएंगे और वैश्विक स्तर पर गठबंधन ज्यादा हावी होते जाएंगे जो छोटी व्यापारिक गतिविधियों की कमर को बुरी तरह तोड़ देंगे.

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सरकार की नीतियों के दम पर देश में आने वाली किसी भी प्रकार की ऑनलाइन सेवाओं या वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर सरकार को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और पारदर्शी तरीके से जनता समेत व्यापारियों को यह बताना चाहिए कि किस प्रकार तेजी से बदलते डिजिटल दौर में उनके अस्तित्व की रक्षा की जा रही है. उन्हें यह भी बताना चाहिए कि किस प्रकार वे पूर्व से जारी रोजगार के अवसरों की हिफाजत कर रहे हैं, और नए अवसर भी पैदा कर रहे हैं जो देश की 135 करोड़ जनता को समान दृष्टि से विकसित करने के नजरिए से ही किया जा रहा है ना कि कुछ चुनिंदा बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाने के दृष्टिकोण से. तेज गति से दूसरे विकसित देशों और उनकी आर्थिक परिस्थिति को समझे बिना उनका अनुसरण करने से देश के आर्थिक विकास की वर्तमान गति को तगड़ा झटका लग सकता है जो दीर्घ काल में भारत की विशाल आबादी की सामाजिक-आर्थिक राह में सबसे बड़ा खतरा साबित होगा.

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