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 प्रमोशन में आरक्षण का मामला सात जजों की संवैधानिक बेंच देखेगी : सुप्रीम कोर्ट

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NewDelhi : सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने प्रमोशन में आरक्षण मामले में 2006 में दिये गये फैसले के आलोक में किसी भी तरह का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया. बेंच ने कहा कि अब यह मामला सात जजों की संवैधानिक बेंच देखेगी. संवैधानिक बेंच द्वारा अगस्त के पहले सप्ताह में सुनवाई किये जाने की सभावना है. बता दें कि संवैधानिक बेंच में पहले से कई मामले लिस्टेड हैं. केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल ने कहा है कि सात जजों की संवैधानिक बेंच मामले की जल्द सुनवाई करे. जानकारी के अनुसार संवैधानिक पीठ यह देखेगी कि 2006 के सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है या नहीं.

बेंच ने कानून को सही ठहराते हुए शर्त लगाई थी

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 2006 में नागराज से संबंधित प्रमोशन में आरक्षण मामले की सुनवाई की थी. बेंच ने कानून को सही ठहराते हुए शर्त लगाई थी कि आरक्षण से पहले यह देखना होगा कि अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और पिछड़ापन है या नहीं, और इसके लिए आंकड़े देने होंगे. नागराज के फैसले में कहा गया था कि क्रिमी लेयर का कान्सेप्ट यहां लागू नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल पेश हुए और कहा कि इस मामले की सात जजों की बेंच जल्द सुनवाई करे क्योंकि रेलवे और अन्य सरकारी सेवाओं में लाखों लोग जो नौकरी में हैं वह प्रभावित हैं.

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गर्मी की छुट्टियों में वेकेशन बेंच के सामने भी यह मुद्दा उठा था

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के कारण कंफ्यूजन की बात कहे जाने पर चीफ जस्टिस की बेंच ने कहा कि इस मामले को संवैधानिक बेंच देखेगी. पिछले साल 15 नवंबर को कोर्ट ने कहा था कि संवैधानिक बेंच देखेगी कि 2006 के फैसले पर दोबारा विचार की जरूरत है या नहीं. बता दें कि गर्मी की छुट्टियों में वेकेशन बेंच के सामने भी यह मुद्दा उठा था. तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एससी व एसटी कैटगरी के लोगों को प्रमोशन में आरक्षण देने की अनुमति दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह कानून के हिसाब से आगे बढ़े. इससे पूर्व केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि देश भर के अलग-अलग हाई कोर्ट ने इस मामले में आदेश पारित किये हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में यथास्थिति बनाये रखने को कहा था जिस कारण सारी प्रक्रिया रुक गयी. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दलीलों पर गौर करते हुए कहा था कि कानून के हिसाब से वह प्रमोशन में आरक्षण दे सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यों की बेंच का फैसला

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इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यों की बेंच ने 16 नवंबर 1992 से पांच साल के लिए एससी-एसटी कर्मचारियों के लिए प्रमोशन में आरक्षण देने की इजाजत दी थी. बाद में संविधान में संशोधन कर यह व्यवस्था की गयी कि अगर राज्य को यह लगता है कि किसी सर्विस में एससी-एसटी कैटिगरी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह इस कैटैगरी के लोगों को प्रमोशन में आरक्षण दे सकती है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीओपीटी के मेमोरेंडम को रद्द कर दिया था

दिल्ली हाई कोर्ट ने डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग(डीओपीटी) के उस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया था, जिसके तहत अनुसूचित जाति/जनजाति को 1997 के बाद भी प्रमोशन में रिजर्वेशन का फायदा देने के नियम को जारी रखने का निर्देश दिया गया था. हाई कोर्ट ने डीओपीटी के 13 अगस्त, 1997 के मेमोरेंडम को कानून के विरुद्ध बताते हुए फैसला सुनाया था. बेंच के आदेश में कहा गया था कि इंदिरा साहनी या नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट के जो भी जजमेंट रहे, उन सभी से साफ है कि एससी और एसटी को पहली नजर में, प्रतिनिधित्व का आंकड़ा तैयार किये बिना या अनुचित प्रतिनिधित्व के आधार पर पिछड़े के तौर पर देखना गलत है.

इससे निश्चित रूप से संविधान के अनुच्छेद 16(1) और 335 का उल्लंघन हो रहा है और इसी वजह से उक्त मेमारेंडम रद्द होने लायक है. इसके अलावा अदालत ने केंद्र व अन्य को इस मेमोरेंडम के आधार पर एससी/एसटी कैटैगरी के लोगों को प्रमोशन में कोई रिजर्वेशन देने पर भी रोक लगा दी थी. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने चुनौती दे रखी है.

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