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भारतीय राजनीति में अनुदारवादी सोच ने निर्णायक जगह बना ली है

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Faisal Anurag

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आमजन के वास्तविक सवालों से आंख मुंदती चुनावी राजनीति फिर से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर तेजी से बढ़ रही है. भारत की विडबंना है कि 1990 के बाद से भारत की राजनीति इन्हीं सवालों पर केंद्रित होती रही है. 2014 में साइनिंग इंडिया का नारा हो या 2014 में विकास का- दोनों महज नारा ही बने रहे. 21वीं सदी का यह भारत एक ओर तकनीकी रूप से समृद्ध हो रहा है लेकिन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सामंती मूल्यों का बोलबाला बढ गया है. एक वैज्ञानिक सोच वाले भारत की परिकल्पना ऐसे हालात में किस तरह परवान चढेगी, यह विमर्श पीछे छूटता जा रहा है. भारत के हाल के राजनीतिक माहौल में 1992 और 2002 के सांप्रदायिक उभार की बड़ी भूमिका बन गयी है. हालांकि पिछली सदी के अंतिम दशक में ऐसा लगा था कि भारत एक अनुदार और उदार विचारों के तीखो संघर्ष के दौर में है और तेजी से उदार विचारों पर अनुदार विचारों का बोलबाला बढ़ गया है.

2014 के बाद तो साफ दिख रहा है कि भारत की राजनीति में अनुदारवादी सोच ने अपनी एक निर्णायक जगह बना ली है. लेकिन उदारवादी धाराओं के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ रहा है. भारत ने सदियों से अपनी सहिष्णुता के कारण बड़ी कामयाबी हासिल की है. इतिहास के जानकार बताते हैं कि जब कभी पुरातनपंथी अनुदारवादी भारत में राजनीतिक तौर पर मजबूत हुए हैं, भारत को उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. इतिहास से अनेक उदाहरण इसकी पुष्टि में प्रसतुत किए जा सकते हैं. लोकतंत्र एक विचारधारात्म संघर्ष में हर किस्म के अपुनदारपंथ को परास्त करने में कारगर हुआ है. लेकिन इसके अपवाद भी हैं कि कुछ समय के लिए अनुदारपंथी इस धारा को पराजित करने में कामयाब रहे हैं. यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों के उदाहरण इस तरह के हैं. हाल के दशकों में यह देखा जा रहा है कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में ऐतिहासिक पराजय झेल चुकी अनुदारवादी धारों का पुनरुत्थान हो रहा है.

इसके पीछे वे आर्थिक कारण हैं, जो आमजन की अपेक्षाओं ओर आकांक्षाओं को दरकिनार कर अपने देशों में केवल कारपारेट घरानों की लूट में मददगार हुए हैं. सारी दुनिया में वर्तमान आर्थिक प्रणाली के खिलाफ आक्रोश दिख रहा है. उन देशों में भी जो विकसित कहे जा रहे हैं. जर्मनी और फ्रांस में कट्टर विचारों से लैस दक्षिणपंथियों की बढ़ती ताकत चिंता का विषय बन गयी है. इसी तरह अमेरिका में गोरे वर्चस्व का उभार सामाजिक तनाव बढ़ा रहा है. अमेरिका उन ताकतों के पक्ष में होता जा रहा है, जो अपने देशों में जनविरोधी दक्षिणपंथ की नीतियों के पैरोकार हैं. ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका में नस्लवादी तनाव का व्यापक होने का असर विश्व भर के अनेक देशों मे देखा जा रहा है. अपनी श्रेष्ठताबोध से ग्रसित यह अंधनेश्रनलिज्म आधुनिक चेतना के खिलाफ न केवल अपने ही नागरिकों के ख्लिाफ साजिश कर रहा है बल्कि इस तरह की राजनीति करने वालों को वह प्रकारांतर से ताकत भी पहुंचा रहा है. यह तबका एक ओर जहां न्यू मीडिया की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी ताकत बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर इतिहास के बारे में अनेक गलत अवधारणाओं को गढ़ रहा है.

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन उच्चत्तम मूल्यों को गढ़ा गया और देश ने जिस पर सर्वसम्मति बनायी, पिछले कुछ समय से होने वाली राजनीति उसे पलट कर इतिहास के उतार फेंके गए नकारात्मक विचारों को स्थापित करने का प्रयास कर रही है. मध्यकाल के उन मिथों को इतिहास बनाकर पेश किया जा रहा है. जिसके कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं. लोकतंत्र में विचारों की जिस स्वतंत्रता और सौर्हाद की अनिवार्यता है उसे वर्चस्ववदी सोच से बदलने का प्रयास किया जा रहा है. इस प्रक्रिया में न्यू मीडिया के टूल्स तथ्यहीन जानकारी के माध्यम से युवआओं की एक पूरी पीढ़ी को ही बरगला रहे हैं. पाठ्यक्रमों में बदलाव कर ऐसे इतिहास को पेश करने का प्रयास किया जा रहा है जो जाति विशेष और धर्मविशेष से नफरत करना सीखा रहे हैं. वैज्ञानिक इतिहास को ही नहीं गणित को भी चुनौती दी जा रही है. प्रतीक के तौर पर जिन विषयों का चयन किया जा रहा है, उसका मकसद भी साफ है कि वह वोट धु्रवीकरण की प्रक्रिया को तेज करे और युवाओं को वैज्ञानिक सोच से वंचित कर, न सोचनेवाला और न चुनौती देनेवाला बनाने का प्रयास चल रहा है. भारत में छात्र आंदोलन का उभार इस प्रक्रिया को चुनौती तो दे रहा है. लेकिन उसकी अपील अत्यंत सीमित है. वैसे इतिहास में देखा गया है कि सीमित अपील वाले छात्र आंदोलनों ने व्यपाक राजनीतिक असर पैदा किया है.

भारत में वर्तमान संघर्ष उदारवादी सोच और अनुदारवादी प्रवृति से है. इतिहास में ऐसे अनेक दौर आए हैं जब भारत को इसमें किसी एक को चुनना हुआ है. कुछ समय के लिए अनुदारवादी प्रवृति की जीत तो संभाव होती दिखती है लेकिन कालक्रम में उसे हमेशा निर्णायक पराजय का सामना करना पड़ा है. यूरोप और अफ्रीका के साथ अरब और दक्षिण एशिया के अनेक देशों में भी यह संघर्ष तेजी से उभर कर सामने आया है. लतिनी अमेरिकी देशों में भी अनुरवादी प्रवृतियों की बढत ब्राजील समेत कुछ देशों में दिख रही है. इस प्रवृति के उभार के पीछे आर्थिक विफलता के वे तत्व हैं, जो अपने देशों में आमजनों के हितों के खिलाफ साबित हुआ है. ग्लोबलाइजेशन की आर्थिक संरचना के विफल होते ही यह उभार तेजी से विस्तारित होता नजर आ रहा है. दुनिया में इसके विकल्प की आर्थिक प्रणाली पर भी बहस तेज है. इस बहस का फलाफल क्या होगा, अभी कहा नहीं जा सकता लेकिन यह साफ है कि दुनिया आर्थिक विषमता की राह से बाहर आने के लिए छटपटा रही है.

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