Opinion

कांग्रेस को अपनी लोक प्रवृतियों के बीच ही राह तलाश करनी होगी

Faisal Anurag

कांग्रेस कार्य समिति के सात घंटे की मैराथन बैठक के बावजूद उन सवालों का हल नहीं निकल पाया जो कांग्रेसजनों को परेशान किए हुए है. विपक्ष के अन्य दलों के लिए भी एक ऐसे कांग्रेस की जरूरत शिद्दत से महसूस की जाने लगी है जो निर्णय लेने में गतिशील हो. और जिसकी दिशा वैचारिक रूप से स्प्ष्ट हो. कार्य समिति की बैठक किसी ठोस निर्णय के बजाय ड्रामा जैसी प्रतीत होती है. बैठक में कहा गया कि पूर्णकालिक अध्यक्ष होने तक सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष बनी रहेंगी.

इसमें नया क्या है. राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद सोनिया गांधी को कार्यकारी प्रभार दिये जाने के समय भी यही कहा गया था. निर्णय हुआ था कि जल्द ही अध्यक्ष का चुनाव होगा. स्पष्ट है कि न तो राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी नेतृत्व लेने को तैयार हैं. और न ही सोनिया गांधी एक बार फिर 2004 का करिश्मा दोहराने का जज्बा दिखा पाने में सक्षम. बीस सीनियर नेताओं के पत्र में जो सवाल उठाए गए थे, उन पर बैठक ने चर्चा तक नहीं की.

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आखिर कांग्रेस के नेता कब तक उन सवालों पर चर्चा से बचेंगे. इन सवालों के जवाब के बगैर पार्टी में पुनर्जीवन संभव नहीं है. कांग्रेस को अपनी लोकप्रवृति के बीच ही एक सशक्त विपक्ष की भूमिका भी निभानी है. और संघर्ष ही वो रास्ता है जिसमें वह अपने विचारों की जीत का सपना देख सकती है. बगैर स्वदेशी राजनीतिक विचारों के इस दौर की चुनौतियों का सामना करना संभव नहीं दिखता है.

कांग्रेस ने 2014 में जिस परसेप्शन की लड़ाई में शिकस्त खायी थी, उससे आगे वह अब तक नहीं निकल सकी है. जबकि कई राज्यों के चुनावों में दिखा है कि लोकप्रवृति को अनुकूल बनाया जा सकता है. राजस्थान, मध्यप्रदेश, झारखंड की जीत से जो सबक हासिल किये जाने की जरूरत वो नहीं हो सका है. कांग्रेस एक ऐसी पार्टी के रूप क्रियाशील रही है जिसमें अनेक परस्पर विचारों के विरोधी भी समागम करते रहे हैं. आजादी के पहले भी कांग्रेस में जिस तरह की आंतरिक बहसों का माहौल था, वह कमोबेश 1964 तक बना रहा.

कांग्रेस के इतिहास ने 2014 के बाद से ही कई बार कामराज योजना जैसे कदम उठाने का जार दिया है. नेहरू के जमाने में ही 1963 में कामराज जब कांग्रेस के अध्यक्ष थे, कांग्रेस को नई ऊर्जा देने के लिए एक योजना पेश की थी. जिसमें कई मुख्यमंत्रियों और केंद्र के मंत्रियों को पार्टी के काम के लिए सरकारों से हटना पड़ा था.

 

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इस प्लान ने 1962 के बाद बने माहौल में ताजगी पैदा की थी. नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस में इसका असर को देखा गया. नेतृत्व की तलाश में पार्टी के नेताओं ने सर्वसम्मति की राह को बनाए रखा. तब मोरारजी देसाई को न तो नेहरू के बाद और न ही शास्त्री के निधन के बाद प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला.

इंदिरा गांधी के जमाने की सिंडिकेट बनाम इंडिकेट की लड़ाई भी कांग्रेस खंगाल सकती है. जहां वैसे नेताओं को पार्टी से बाहर जा कर अलग दल बनना पड़ा जो प्रगतिशील आर्थिक नीतियों के अवरोधक के रूप में उभर कर सामने आए थे. इन दो बड़ी राजनीतिक घटनाओं को उस दौर में अंजाम दिया गया था जब कांग्रेस सत्ता के शीर्ष पर थी.

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद भी यह महसूस किया जाने लगा था कि कुछ नेता ही कांग्रेस के नए नेतृत्व और दिशा के विरोधी हैं. ऐसे नेताओं में ज्यादातर विरोधी भाजपा खास कर प्रधानमंत्री के खिलाफ मुखर होने के विरोधी थे. लेकिन राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद ही कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में सरकार खोया. कई नेता पार्टी छोड़ कर चले गये.

20 नेताओं ने अपने पत्र में अन्य बातों के अलावा इस पर भी जोर दिया है कि पार्टी छोड़ कर गए नेताओं की वापसी की कोशिश होनी चाहिये. कांग्रेस नए नेतृत्व की राह प्रशस्त कर ही सशक्त विपक्ष की भूमिका निभा सकती है. इसके लिए उसे वैचारिक रूप से भी अपनी दिशा तय करनी होगी.

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