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खड़गे के सिर सजा कांग्रेस अध्यक्ष का ताज, चुनौतियां अपार

Gyan Ranjan

Ranchi : कांग्रेस पार्टी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल गया है. कर्नाटक से दलित समुदाय से आनेवाले मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के नये बॉस निर्वाचित हुए हैं. 24 वर्षों के बाद ऐसा हुआ है जब नेहरू-गांधी परिवार से इतर कोई कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं. लगातार परिवारवाद के आरोपों का आरोप झेल रही कांग्रेस पार्टी ने 24 वर्षों के बाद पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान गैर गांधी के हाथों में सौपी है. करीब 24 साल पहले सीताराम केसरी ऐसे अध्यक्ष थे, जो गांधी परिवार से नहीं थे. उनके बाद अब कांग्रेस में ऐसा दूसरा अध्यक्ष चुना गया है. कांग्रेस के 137 साल के इतिहास में अध्यक्ष पद के लिए छठी बार चुनाव हुआ है. आजादी के बाद से अब तक 75 वर्षों में 41 साल कांग्रेस के अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार के लोग रहे हैं. वहीं, आजादी के बाद से अब तक 13 अध्यक्ष गैर नेहरू-गांधी परिवार से रहे हैं. इन 13 अध्यक्षों ने 35 साल कांग्रेस का नेतृत्व किया. हालांकि राजनीतिक पंडितों का यही कहना है कि खड़गे अध्यक्ष तो बन गये हैं, लेकिन वह गांधी परिवार का एक तरह से मुखौटा ही होंगे. पिछले 8 वर्षों से देश में कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. आलम यह है कि कई प्रदेशों में तो पार्टी क्षेत्रीय पार्टियों की पिछलग्गू बनी हुई है. ऐसे में पार्टी के नये अध्यक्ष को जो ताज मिला है वह कांटों से भरा हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता. साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नये अध्यक्ष के समक्ष चुनौतियां भी अपार हैं.

किस-किस ने किया कांग्रेस का नेतृत्व

आजादी के बाद से अब तक 18 लोग कांग्रेस के अध्यक्ष बन चुके हैं. जिनमें 5 गांधी नेहरू परिवार के हैं और 13 लोग गांधी नेहरू परिवार के बाहर के हैं. देश को 1947 में आजादी मिलने के बाद से जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ज्यादातर समय कांग्रेस अध्यक्ष रहे, जिनका संबंध गांधी नेहरू परिवार से हैं. वहीं, जेबी कृपलानी, बी पट्टाभि सीतारमैया, पुरुषोत्तम दास टंडन, यूएन ढेबर, एन संजीव रेड्डी, के कामराज, एस निजलिंगप्पा, जगजीवन राम, शंकरदयाल शर्मा, डीके बरुआ, केबी रेड्डी, पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी ने कांग्रेस का नेतृत्व किया, जो गांधी नेहरू परिवार के बाहर के हैं. सीताराम केसरी ऐसे व्यक्ति हैं, जो सबसे आखिरी बार गैर नेहरू-गांधी परिवार से अध्यक्ष बने थे. वह 1996 से 1998 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. इसके बाद अब तक यानी कि करीब 24 साल से कांग्रेस की कमान गांधी परिवार के हाथों में ही है.

खड़गे के समक्ष तत्काल ये हैं बड़ी चुनौतियां

नये कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव हैं. देश के दो अहम राज्यों गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. नये अध्यक्ष के लिए यही उनकी पहली परीक्षा होगी. दोनों राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकने और टिकट बंटवारे तक की जिम्मेदारी अध्यक्ष की होगी. ऐसे में अध्यक्ष के लिए खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती होगी. गुजरात में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को जबरदस्त टक्कर दी थी लेकिन इस बार यहां कांग्रेस पार्टी को भाजपा के साथ साथ आम आदमी पार्टी से भी दो-दो हाथ करना है. जाहिर है कि गुजरात में आम आदमी पार्टी से कांग्रेस को ही ज्यादा नुक्सान होना है. इसी तरह हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को अपनी पुरानी विरासत की वापसी करना भी चुनौती है. इन दो प्रदेशों के बाद मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने हैं. छतीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में है. मध्यप्रदेश में भी चुनाव बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी लेकिन बाद में यहां सत्ता हाथों से चली गयी. नए अध्यक्ष के समक्ष इन प्रदेशों में फिर से सरकार बनाना बड़ी चुनौती है.

पार्टी में व्याप्त अंदरूनी कलह

नये अध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती ये होगी कि कैसे वो कांग्रेस में जारी अंदरूनी कलह को खत्म कर सकते हैं. पार्टी को लगातार चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में तमाम बड़े और छोटे नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं. ऐसे नेताओं को रोक पाना भी नये अध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती की तरह है. इसके अलावा पार्टी में नाराज नेताओं का एक अलग गुट है, जिसे जी-23 का नाम भी दिया गया, उन नेताओं की उम्मीदों पर भी नये अध्यक्ष को खरा उतरना होगा. ये नाराज धड़ा लगातार पार्टी में चुनाव की मांग करता आया है, ऐसे में गैर गांधी परिवार के अध्यक्ष चुने जाने के बाद इन नेताओं का रुख भी काफी अहम हो जाता है. पार्टी के तमाम बड़े नेता एक ही लाइन पर चलें, ये नये अध्यक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

राज्यों में साख को करना होगा मजबूत

नये कांग्रेस अध्यक्ष के लिए राज्यों में कांग्रेस को मजबूती देने की भी बड़ी चुनौती होगी. लगातार मिल रही हार से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश की कमी है, ऐसे में उन कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल पर एक्टिव करना काफी जरूरी है. इसके लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए पार्टी में लचीलापन लाने की कोशिश होगी. पार्टी में कार्यकर्ता और नेता लगातार हाईकमान कल्चर का आरोप लगाते आए हैं. इसे तोड़ना भी नये अध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा.

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