Opinion

#Congress : सोशल मीडिया के दायरे से निकलने के अलावा कोर एजेंडे से जुड़ने की चुनौतियां भी कम नहीं हैं

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Faisal  Anurag

सोनिया गांधी ने कांग्रेस को पुरानी पटरी पर लाने के लिए वरिष्ठ नेताओं की बैठक में एक फार्मूला दिया है. उनका नया सूत्र है, कांग्रेस सोशल मीडिया की घेरेबंदी के बजाय लोगों से सीधा संपर्क बनाने का कारगर मंच बने. इसके साथ ही उन्होंने अनेक ज्वलंत सवालो से बचने की भी सलाह दी है. इसमें 370, राम मंदिर ओर असम का सवाल प्रमुख है.

जाहिर होता है कि कांग्रेस नेतृत्व इस बात से तो सजग है कि पार्टी को सीधे जनता के बीच गांव ओर गलियों में जाना चाहिए. और गांव-गलियों को संघर्ष का केंद्र बनाना चाहिए. कांग्रेस नेतृत्व इस बात से भी सचेत जान पड़ता है कि पार्टी सोशल मीडिया तक ही सीमित हो गयी है. इस कारण उसका आमलागों से जीवंत सपर्क टूट गया है.

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पिछले छह सालों में एक साल छोड़ कर सोनिया गांधी ही कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रही हैं. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद वे फिर एक बार नेतृत्व कर रही हैं. 2014 की चुनावी हार के बाद कांग्रेस जिस हालत में पहुंच गयी है उसकी जिम्मेदारी अब तक नहीं ली जा सकी है. राहुल गांधी ने कांग्रेस के भीतर ओर बाहर संघर्ष  किया है. इसका नतीजा गुजरात में दिखा था जब पार्टी ने भाजपा को जबरदसत चुनौती दी थी.

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने न केवल अपने पुराने आधारों को जीवंत किया बल्कि नये सामाजिक समूहों ओर युवाओं को आकर्षित कर गुजरात में पार्टी का कायापलट भी किया. बाद में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीगढ में भी  इसका असर देखा गया. कांग्रेस से बिखरे कमजोर तबकों के वोटर कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए.

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर बुरी तरह हारना पड़ा. और राहुल गांधी ने जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया. हालांकि उनके इस्तीफ के पीछे जो पीड़ा थी, कांग्रेस नेताओं ने उस पर चर्चा करने से परहेज किया. कांग्रेस जिस तरह जड़विहीन नेताओं की गिरफ्त में फंसा हुआ है, उससे मुक्ति दिला कर ही सोनिया गांधी अपने नये सूत्र को जीवंत बना सकती हैं.

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सोनिया गांधी के समाने यह एक बड़ी  चुनौती है. हालांकिन उन्होंने इस बीमारी की सही पहचान की है कि कांग्रेस एक काडर आधारित पार्टी नहीं रही है. और उसकी ताकत सामाजिक समूहों का समन्वय और उनको स्वर को व्यक्त करने देने में रही है.

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कंग्रेस के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वह किस तरह उन तबकों के बीच फिर विश्वास पैदा कर सकेगी.  कालक्रम में पार्टी के आधार समूह से निकल कर दूसरी तरफ चले गये हैं. भारत की राजनीति वास्तव में जातिगठबंधन का समन्वय ही है. भाजपा ने इसमें सोशल इंजीनियंरिंग के माध्यम से कामयाबी हासिल की  है. कांग्रेस के खेमें से वे समूह जिन कारणों से बाहर निकले हैं, उसे भी पार्टी को समझने की जरूरत है.

सोनिया गांधी के नये सूत्र से यह तो साफ दिख रहा है वह इस संकट को समझ रही हैं. लेकिन इसके लिए किस तरह का कारगर तरीका वह अपनाती है. इसी से उसके भविष्य की दिशा स्पष्ट होगी.

सेनिया गांधी के नये ब्लूपिंट से यह समझ साफ दिख रही है कि उन्होंने कांग्रेस को मौजूदा संकट से उबारने के लिए काफी सोच विचार किया है. हालांकि उनके नये ब्लूप्रिंट पर आरएसएस लंबे समय से चल रहा है. बावजूद इसके, दोनों के काम के तरीके अलग हैं और विचारों में भारी फर्क है.

अब सवाल उठता है, तो क्या कांग्रेस अपने कोर विचारों की ताकत की ओर वापस जाना चाहती है जिससे भटकने का उस पर आरोप है. कांग्रेस के ही अनेक नेताओं ने कहा है कि कांग्रेस को अपने कोर एजेंडा से भटकना नहीं चाहिए. शशि थरूर ने जोर दे कर कहा है कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता की राह पर बुलंदी से चलना चाहिए. कोई अन्य राह उसके पतन का कारक बन सकता है.

कांग्रेस में अनेक नेता कांग्रेस के कोर एजेंडा से अलग राह अपनाने की बात करते रहे हैं. इसी का नजीता शाफ्ट हिंदुत्व की राह है. सोनिया गांधी ने यदि 370, असम और राममंदिर के सवाल से बचने की बात की है तो इसके क्या निहितार्थ हो सकते हैं? और इससे कांग्रेस क्या अपना मकसद हासिल का सकेगी… ये सवाल भी  उठ रहा है. इन सवालों पर स्पष्ट विचार के बिना कांग्रेस की दिशा और दशा किस तरह बदलेगी इसे भी सपष्ट करने की जिम्मेदारी सोनिया गांधी की ही है.

कंग्रेस नेतृत्व के समक्ष यह भी चुनौती है कि वह पार्टी में नये और पुराने नेतृत्व के विचारों के बीच समन्वय विकसित करे ओर पार्टी में व्याप्त गुटबंदी को खतम करें.

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