Opinion

सीएए और एनआरसी को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों में बढ़ रही है टकराव की स्थिति

Faisal Anurag

केंद्र और राज्यों के बीच सबकुछ सहज नहीं होना एकबार फिर उस पुरानी राजनीतिक बहस की याद दिला रहा है, जब केंद्र और राज्यों के संबंधों को ले कर भारत की राजनीति गरमागरम बहसों से भरी हुई थी. संशोधित नागरिकता कानून के बाद देश में एक ओर जहां सड़कों पर हंगामा मचा हुआ है वहीं देश के अनेक राज्य इस कानून को ले कर अपनी असहमति जता रहे हैं.

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केरल विधानसभा ने इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं होने देने का प्रस्ताव पारित कर इस विवाद को गहरा बना दिया है. केरल विधानसभा का यह प्रस्ताव लगभग सर्वनुमति से परित हुआ है. केवल एक भाजपा विधायक ने विरोध में मत दिया. बंगाल का तेवर भी सरकार के रुख के विपरीत है. इसके अलावे अनेक गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों ने इस कानून के प्रति अपनी असहमति का इजहार किया है.

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सीएए का विवाद नागरिकता रजिस्टर के कारण ज्यादा गहराया है. प्रधानमंत्री मोदी ने एनआरसी की संभावना को खारिज तो नहीं किया है, लेकिन कहा है कि इसका कोई प्रस्ताव सरकार के पास 2014 के बाद से ही चर्चा में नहीं आया है.

लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में क्रोनोलाजी समझाया और स्पष्ट कहा था कि पहले कैब आया है और फिर एनआरसी आयेगा और यह जरूर आयेगा. 2019 के चुनाव के बाद पहली बार संसद को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी एनआरसी का जिक्र किया गया.

प्रधानमंत्री और गुहमंत्री के अलग अलग रुख के कारण यह विवाद गंभीर हो गया है. न तो विपक्ष और न ही लोगों को समझ में आ रहा है कि आखिर मोदी और शाह में सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन.

भारत के लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास में सरकार के दो अहम व्यक्तियों का किसी नीतिगत सवाल पर अलग-अलग बयान शायद ही कभी पहले आया है. असम की एनआरसी के अनुभवों के बाद तो देश में लोगों के बीच आशंका का माहौल बनना लाजिमी ही है.

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जब सरकार की कोई योजना जैसा कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं एनआरसी लाने का नहीं है, जब डिटेंशन सेंटर क्यों बनाये जा रहे हैं. केरल विधानसभा के प्रस्ताव में इसका भी उल्लेख है कि केरल सरकार किसी भी डिटेंसन सेंटर बनाने की इजाजत राज्य में नहीं देगी.

संभावना जतायी जा रही है कि देश के कुछ अन्य राज्य भी केरल की राह चल सकते हैं. संविधान के नजरिये  से क्या उचित है, यह तो बाद में तय होगा अभी तो राजनीतिक तौर पर राजनीतिक टकराव साफ दिख रहा है. केंद्र और राज्यों के संबंध को ले कर भारत की राजनीति में इसकी व्याख्या करने को ले कर कई बार राजनीतिक विवाद हुए है.

केंद्र और राज्यों के अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए तो 1980 के बाद के तीन दशकों तक कई बड़े राजनीतिक आंदोलन हुए हैं. और उस आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी भूमिका रही है. क्षेत्रीय दलों की यह शिकायत पुरानी है कि केंद्र राज्यों की स्वयत्तता का बार-बार अतिक्रमण करता रहता है. इसके बाद यह विवाद थम गया था.

लेकिन अब एक बार फिर यह विवाद उठ खड़ा हुआ है. युवा पीढ़ी को तो शायद सरकारिया आयोग की याद भी नहीं हो. सरकारिया आयोग का गठन बड़े राजनीतिक दबावों के बाद केंद्र राज्य संबंधों के संतुलन की नीति को स्पष्ट करने के लिए किया गया था. सरकारिया आयोग ने भारीभरकम रिपोर्ट की. उसकी बड़ी चर्चा भी हुई. लेकिन इस आयोग की रिपोर्ट को फइलों की भीड़ में अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया गया है.

2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद केंद्र को और ज्यादा सशक्त बनाने के राजनीतिक प्रयास को क्षेत्रीय दलों की आकांक्षा के खिलाफ माना गया. बावजूद इसके मोदी सरकार ने केंद्र को बेहद ताकतवर बना दिया. राज्यों के भीतर से इसका तीखा विरोध तो नहीं हुआ लेकिन उसकी चर्चा होती रही है. सीएए के बाद पहली बार राज्यों ने केंद्र की नीति के खिलाफ खुल कर बात कही है.

गैर भाजपाई दलों और सरकारों का आरोप है कि संविधान की मूलभूत संरचना को प्रभावित करने वाले ऐसे कानून के लाने में हड़बड़ी दिखायी गयी और संविधान की भावनाओं और प्रावधानों का ध्यान नहीं रखा गया है. सीएए के खिलाफ कई राज्य सरकारों ने सुप्रीम कार्ट के समक्ष याचिका दायर कर रखा है.

असम में भाजपा को भी सीएए को आत्मसात करने में कठनाई हो रही है. राज्यों और केंद्र के इस विवाद का सुप्रीम कोर्ट मे जाना तय है. इस बीच तो राजनीतिक तौर पर यह विवाद बहसों का केंद्र बना ही रहेगा.

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