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चिंताः दो वर्षों में मात्र 24 लोगों ने ही कराया देहदान, ऑर्गन के अभाव में सैकड़ों ने गंवायी जान

देहदान को लेकर समाज में अब भी ढंग से रुझान नहीं दिखता

 Ranchi : रिम्स सुपरिटेंडेंट विवेक कश्यप ने पिछले दिनों मिसाल पेश की थी. अपनी मां के गुजरने के बाद देहदान कराया था. पर ऐसे उदाहरण बेहद सीमित हैं. देहदान के लिये समाज में अब भी ढंग से रुझान नहीं दिखता. जबकि यह अनमोल दायित्व है. इस काम के मोल को पैसों से नहीं आंका जा सकता. राज्य में हर साल हजारों मरीजों की मौत ऑर्गन के अभाव में हो जाती है. सरकार अपने सीमित दायरे में अंगदान और देहदान की मुहिम को बढ़ावा देने में लगी है. पर ऐसी संस्थाओं की कमी खटकती है जो इन कामों के लिये लोगों को प्रेरित कर सके. यही वजह है कि राज्य के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान रिम्स, रांची में 2018-19 से अब तक मात्र 24 लोगों का ही देहदान कराया जा सका है.

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आखिरी सांस लेने के बाद भी धड़कता है दिल:

एनाटॉमी विभाग (रिम्स) के हेड डॉ धर्मेंद्र कुमार के अनुसार देहदान कर आप किसी को दूसरा जीवन दे सकते हैं. दूसरों के दिलों में जिंदा रह सकते हैं. किसी के गुजर जाने के बाद भी उसका शरीर किसी को जीने का रास्ता दे सकता है. सरकार व संस्थाओं को लोगों के मन में अंग दान-देहदान को लेकर पारंपरिक भ्रांतियां और कुछ हद तक डर दिखता है. इसे लेकर गांव से लेकर शहर तक जागरूकता लाये जाने पर काम करना होगा.

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रिम्स में उपलब्ध है देह दान की सुविधा:

ऐसे लोग जो देह दान के इच्छुक हैं, वे रिम्स में उपलब्ध करायी गयी सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं. रिम्स में रोजाना कई लोग इलाज के लिए आते हैं. ईलाज के बाद मौत की स्थिति में मरीज के परिजन उसका अंगदान कराना चाहें तो एनाटॉमी डिपार्टमेंट मदद करने को तैयार है.

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धीरेंद्र कुमार के अनुसार दो-तीन सालों पहले तक अंग दान की सुविधा रिम्स में नहीं थी, पर अब दिक्कत नहीं है. रिम्स की वेबसाईट https://rimsranchi.org/current/images/2017/pdf/body_donation_form.pdf पर बॉडी डोनेशन संबंधी फॉर्म उपलब्ध है. जो भी लोग इच्छुक हों, वे इसे दो सेटों में भरकर रिम्स को दे दें. रजिस्टर्ड लोगों में से किसी के गुजरने के बाद और उसके परिजनों द्वारा रिम्स को सूचना देने पर यहां से एंबुलेंस भेजी जाती है. इस काम के लिये एक रुपया भी परिजनों से नहीं लिया जाता. विभाग को शव मिलने के बाद परिजनों को देह प्राप्ति का एक सर्टिफिकेट भी दिया जाता है. जागरुकता के अभाव के कारण अब तक 24 लोगों का ही रिम्स में देहदान हो सका है. सालभर में मुश्किल से आठ-दस लोग ही पहुंचते हैं. रिम्स के जरिये झारखंड का अपना एनाटॉमी एक्ट बनाये जाने की तैयारी है. अभी बिहार एनाटॉमी एक्ट 1961 ही यहां लागू है. अपना एक्ट आ जाने से बॉडी डोनेशन और इससे संबंधित गतिविधियां तेज हो सकेंगी.

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एनाटॉमी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर राजीव कुमार के मुताबिक ब्रेन डेड पेशेंट से ऑर्गन डोनेशन कराया जा सकता है. हार्ट, स्किन, किडनी जैसे अंगों को किसी दूसरे के लिये काम में लाया जा सकता है. फिलहाल रिम्स में ऑर्गन डोनेशन की सुविधा शुरू की जा चुकी है. इसके अलावा स्टेट लेवल पर एक कॉर्डिनेशन सेंटर रिम्स में तैयार किया जा रहा है.

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मुक्ति संस्था बनायेगी देहदान समिति:

2012 में पूर्व महाधिवक्ता विनोद पोद्दार की अध्यक्षता में दधीचि देहदान समिति बनायी गयी थी. प्रवीण लोहिया उपाध्यक्ष थे. लोहिया के मुताबिक 8 साल पहले इस समिति के पास लगभग 45 लोगों ने देहदान के लिये रुचि दिखायी थी. पर रिम्स के पास इससे संबंधित व्यवस्था नहीं होने के कारण बात आगे नहीं बढ़ी. पर अब मुक्ति संस्था के माध्यम से इसी महीने एक देहदान समिति गठित किये जाने का प्रयास है. लोगों को बताया जायेगा कि उनके पास जो शरीर है, वह उपर वाले की देन है. लोगों के गुजरने के बाद भी उनका शरीर किसी के काम आ सके, इसके लिये लोगों को जागरुक किया जायेगा. रजिस्टर्ड लोगों के मामले में रिम्स के सहयोग से अंग दान की मुहिम को रफ्तार दिया जायेगा.

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