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बांस की खेती पर बीएयू में पांच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का समापन

जनजातीय किसानों के बीच बांस के टूल्स एवं स्लाइसर उपकरण बांटे

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Ranchi : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के वानिकी संकाय स्थित वनवर्धन एवं कृषिवानिकी विभाग द्वारा आईसीएआर की जनजातीय उपयोजना के अधीन ‘बांस की खेती, प्रबंधन एवं मूल्यवर्द्धन’ विषय पर आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण का शनिवार को समापन हुआ. प्रशिक्षण में कांके प्रखंड के नगड़ी और एकम्बा गांव के विभिन्न महिला एवं पुरुष समूह समिति के कुल 25 जनजातीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

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बांस की खेती की वैज्ञानिक तकनीक की दी जानकारी

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बांस परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ एमएस मलिक ने बताया कि इस प्रशिक्षण में संकाय के वैज्ञानिकों ने बांस का वैज्ञानिक तकनीक से रोपण, उत्पादन, उपचार एवं उपयोग, प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्द्धन कार्यक्रम तथा हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योग से संबंधित विषयों की जानकारी दी. साथ ही, पूर्वी सिंहभूम के पोटका ग्राम के बांस उत्पाद विशेषज्ञ मंगल सोरेन ने बांस का उत्पादन एवं इससे विभिन्न उत्पादों को तैयार करने की विधि के बारे में बताया. समापन के दौरान सभी प्रतिभागियों को सर्टिफिकेट और पांच समूहों में बांटकर बांस प्रसंस्करण से सबंधित टूल्स एवं स्लाइसर उपकरणों का मुफ्त वितरण किया गया. इस अवसर पर निदेशक अनुसंधान डॉ डीएन सिंह ने कहा कि झारखंड राज्य में बांस की वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक खेती से जनजातीय समुदाय के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में मदद मिलेगी. गुणवत्तायुक्त बांस का प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्द्धन से 200 रुपये वाले बांस से एक हजार से दो हजार रुपये तक का लाभ लिया जाना संभव है.

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जानकारी के अभाव में सिर्फ जलावन के रूप में इस्तेमाल होता है बांस का : डॉ महादेव महतो

मौके पर वानिकी संकाय के अधिष्ठाता डॉ महादेव महतो ने कहा कि पूरे देश में 136 तथा झारखंड में सात तरह की बांस की प्रजाति पायी जाती है.  इसके लाभ की जानकारी के आभाव में राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में बांस का जलावन के रूप में उपयोग किया जाता है. मौके पर डॉ एमएच सिद्दीकी, डॉ सुशील प्रसाद और डॉ एमएस मलिक ने भी अपने विचारों को रखा. प्रतिभागियों में बैद्यनाथ उरांव, सुमित्रा टोप्पो, नंदी कच्छप, शीतल लिंडा और संगीता टोप्पो ने बताया कि प्रशिक्षण में प्राप्त बांस की वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक तकनीक से समूह के अन्य लोगों को प्रशिक्षित कर ग्रामीण स्तर पर रोजगार के नये अवसर के सृजन में मदद मिलेगी. कार्यक्रम का संचालन डॉ अनिल कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ बीसी उरांव ने किया. मौके पर डॉ आरबी साह और डॉ पीआर उरांव और संकाय के छात्र भी मौजूद थे.

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