Opinion

कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन की अनेदखी कई गुना अधिक घातक हो सकती है

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Faisal Anurag

कोरोना वायरस के सामुदायिक प्रसार, संयुक्त राष्ट्रसंघ के जेनरल सेक्रेट्ररी अंतनियों गुतरेस का पब्लिक हेल्थ केयर का दुर्दशा संबंधी बयान और भारत में एक दिन में 40 हजार से ज्यादा कोविड 19 मरीजों की संख्या. ये सब बेहद गंभीर हालात के संकेत दे रहे हैं. ये सब ऐसे समय में है जब भारत में विपक्ष के राज्य सरकारों को गिराने का खेल चल रहा है. और आर्थिक क्षेत्र के संकट की गहनता बढ़ती ही जा रही है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कहा है कि भारत कम्युनिटी ट्रांसमिशन यानी सामुदायिक प्रसार के दौर में पहुंच चुका है. कई डाक्टर और जानकार पहले से ही कहते रहे हैं कि भारत को इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि सामुदायिक प्रसार वास्तविकता बन गया है. लेकिन आइसीएमआर बार-बार दावा करती रही है कि सामुदायिक प्रसार के कोई संकेत नहीं हैं. भारत सरकार का दावा भी यही है. आइसीएमआर के हाल के सर्वेक्षणों को ले कर भी दिल्ली के कई जानकारों ने सवाल उठाए थे.

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लेकिन उनकी जुबान मुखर नहीं थी. सर गंगाराम हास्पिटल के डा. अरविंद कुमार, जो कि सरकार की उन रणनीतियों को ले कर सवाल उठाते रहे हैं जो कारेाना वायरस से निपटने के लिए किये जा रहे हैं. डा. कुमार ने भी आइएमए के दावे का समर्थन किया है. उन्होंने कहा है कि कि जिस तरह मुंबई की धारावी और दिल्ली के कुछ मुहल्लों में कोविड पसरा, वह कम्युनिटी प्रसार का ही संकेत है. उन्होंने कहा कि अब जिस तरह ग्रामीण इलाके भी इसकी गिरफ्त में आ गए हैं, वह इस तथ्य को पुष्ट ही करता है.

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हालांकि सरकारी एजेंसी या स्वस्थ्य मंत्रालय अभी भी नकार की मुद्रा में है. लेकिन मात्र तीन दिनों में एक लाख से अधिक संक्रमितों की संख्या बताती है कि भारती ब्राजील और अमेरिका की तरह ही तेज प्रसार का शिकार है. पिछले चार दिनों से लगातार 30 हजार से अधिक सक्रमितों की संख्या बताती है कि सरकार के लिए चुनौतियां गंभीर हैं. लेकिन वह इस गंभीरता को अभी भी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है. खासकर  लॉकडाउन और अनलॉक की प्रक्रिया को लेकर हम अनुभव से सीख नहीं रहे हैं. वैसे तो हर दो-चार दिनों पर विश्व स्वाथ्य संगठन भी नई-नई बातें कह रहा है. इससे जाहिर होता है कि कोविड को लेकर वैज्ञानिकों की जानकारी में हर दिन नए तथ्य सामने आ रहे हैं.

ऐसे हालात में सारी दुनिया की फर्मा कंपनियों की वैक्सिन होड़ भी नए संदेह को जन्म दे रही है. लोगों को वैक्सिन का बेसब्री से इंतजार है. लेकिन फर्मा कंपनियों की निगाह भारी मुनाफे की ओर है. इसके पीछे के खेल को छुपाने की पूरी कोशिश वह कारपारेट कर रहा है जिसने इसे भविष्य में मुनाफा का बड़ा कारक मान रखा है. इस संदर्भ में बिल गेट्स की चर्चा भी जोरों पर है. जो वैक्सिन के एकाधिकार हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं.

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यह एक ऐसा दौर है जब मानवीय तबाही के बीच भी कारपोरेट पूंजी प्रतिस्पर्धा जारी है . इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख गुतरेस ने कहा है कि महामारी की गलत सूचनाओं का आनलाइन प्रसार पब्लिक हेल्थ और लोगों के जीवन के लिए घातक साबित हो रहा है. एक अन्य ट्वीट में उन्होने कहा है कोविड 19 ने यह एक्सपोज कर दिया है कि फ्री मार्केट सब के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी कदम उठा सकती है. उनके इस बयान के गहरे अर्थ हैं. जिस तरह हेल्थ केयर को लेकर मुनाफे की प्रवृति बढ़ी है, उससे गरीब और हाशिए के लोगों के साथ मध्यवर्ग भी बेबस हो गया है. खबरें बताती हैं कि मुनाफे की प्रवृति ने किस तरह सरकारी हेल्थ ढांचे को नष्ट कर दिया है. और निजी अस्पतालों में लूट बढ़ गयी है.

महामारी में सबको मुफ्त इलाज दिलाने में जो विफलता उभरी है, उसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है. खास कर सामुदायिक प्रसार की हालत में. अस्पतालों के बेड कम पडेंगे और लोगों के समुचित इलाज की संभावना भी धुमिल होगी. कई प्रभावी लोग भी अस्पतालों में या तो बेड नहीं पा रहे हैं या फिर उन्हें एक बेड के लिए घंटों इस अस्पताल से उस अस्पताल दौड़ना पड़ रहा है. मुंबई में लीलावती जैसे अस्पताल अमीरों और सेलिब्रिटिज की सेवा के लिए ही हैं. उसमें आम आदमी के लिए शायद ही जगह हो. ऐसे हालात में राजनीति से ज्यादा जरूरी है कि ठोस और समग्र रणनीति के साथ इस महामरी को थामने का प्रयास किया जाए. लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि सरकारों के कैजुअल एर्पोच अब भी खत्म नहीं हुए हैं.

चेतावनियों को गंभीरता से लेने के साथ वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने की जरूरत है. ताकि दावों और लोगों की तकलीफो के बीच साझापन दिखे. भारत सहित दुनिया के उन देशों के नेतृत्व को भी जागने का समय है कि वे वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं करें. सरकार गिराने बनाने के लिए आगे भी वक्त आएगा. यदि देश कोविड 19 पर काबू पा कर मुक्त होगा और अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी.

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