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डस्टबिन लगाने के बहाने खाया कमीशन ! जनता के 21 लाख निगम ने किये बर्बाद

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Roshan Sinha

Dhanbad: धनबाद नगर निगम की पहचान इन दिनों विकास कार्य को लेकर नहीं बल्कि गड़बड़-घोटालों को लेकर हो रही है. जनता की सुविधाओं के बहाने निगम प्रशासन लाखों रुपये अनाप-शनाप काम में बर्बाद कर रहा है. इसका लाभ आम लोगों को नहीं मिल रहा है. हां, यह लोगों की जेब भरने की योजना जरूर साबित हो रही है.

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सफाई के नाम पर लाखों पर हाथ साफ

सफाई के नाम पर शहर में जगह-जगह ब्लू और हरा डस्टबिन लगाया गया. आज इनमें से एक दो को छोड़ सभी बेकार हो गये हैं. शहर में लोहे के कमजोर स्टैंड पर लगाए गये दो डब्बे, कचरा का भारी बोझ सहने में कभी सक्षम हुए ही नहीं. कुछ कचरे के वजन से भसक गये. कुछ का कमजोर स्टैंड लगाने के कुछ दिन बाद ही टूट गया. स्टैंड को कंक्रीट से जाम करने की सिर्फ खानापूर्ति की गयी. यह दो खाली डब्बे का भी बोझ सहने लायक नहीं था.

दिलचस्प है कि रणधीर प्रसाद वर्मा चौक पर ऐसे ही ब्लू-ग्रीन डब्बे लगाए गये हैं. इन डब्बों को निगम के कर्मी खड़ा कर जाते है. फिर जैसे ही इसमें कोई कचरा डालता है यह स्लीपिंग मोड में आ जाता है. यह शहर के मुख्य चौराहे पर नगर निगम की लचर सफाई व्यवस्था या कहिए कि सफाई के नाम पर खानापूर्ति का नमूना है.

क्यों लगा था ब्लू-ग्रीन डस्टबिन

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के तहत कचरा से खाद बनाने और बिजली उत्पादन के लिए उपयोग करना था. असली मकसद तो पूरा होने से रहा. असली मकसद जो सोचा था पूरा हो गया. यानी कचरा डब्बा की सप्लाई से लेकर इसे लगाने तक में कमीशन का भारी खेल हुआ. इसीलिए किसी ने देखा नहीं कि यह कचरा के डब्बा पैसे की बर्बादी के सिवा कुछ भी नहीं है.

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सियालगुदड़ी के पास गारबेज डिस्पोजल प्लांट लगाने की बनी थी योजना

पुटकी के पास सियालगुदड़ी में गारबेज डिस्पोजल प्लांट बनाने की योजना बनाई गयी थी. गारबेज डिस्पोजल प्लांट में कचरा कम्पेक्टर में प्रोसेस कर भेजना था. भले डिस्पोजल प्लांट नहीं बना पर कंपेक्टर स्टेशन कई जगह बना दिए गये. यहां से कचरा उठा कर कहीं फेंक दिया जाता है. सवाल है जब कचरा ऐसे ही फेंकना था, तो करोड़ों रुपये खर्च का मतलब क्या? या फिर यह सिर्फ कमीशनखोरी का बड़ा जरिया बना?

तीन सौ डस्टबिन खरीदे गये

कचरा से भी कमीशन का खेल खेलने के लिए 300 डस्टबिन खरीदे गये. हर एक वार्ड में मुख्य जगह पर दोनों डस्टबिन लगाए गये. इसके नाम पर बैनर, होर्डिंग आदि लगाए गये. लाखों रुपये फूंके गये. जनता को नसीहत दी गयी, कहां डालें सूखा कचरा और कहां डालें गीला कचरा. अब जनता यह सवाल निगम के कर्णधारों से कर रही है कि कहां डालें सूखा कचरा और कहां डालें गीला कचरा? लोगों को ब्लू-ग्रीन कचरा डब्बा ढूंढने पर कई-कई किमी की दूरी पर ही सुरक्षित मिल रहा है. कहीं सिर्फ स्टैंड लगा है, डस्टबिन गायब तो कहीं खुद ही कचरा की शक्ल ले चुका कचरे का डब्बा. यानी जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये का कचरम कूट.

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500 मीटर की दूरी पर लगना था डस्टबिन

शहर के मुख्य चौक-चौराहे पर हर 500 मीटर की दूरी पर दो डस्टबिन नीला और हरा लगाना था. ब्लू डस्टबिन में गीला और हरा डस्टबिन में सूखा कचरा डालना था. लेकिन डब्बा लगाने में भी भारी अनियमितता बरती गई. जहा- तहां डब्बे लगा दिए. कहीं-कहीं तो सिर्फ हरा डब्बा ही दिख रहा है.

7 हजार रुपए प्रति सेट की गयी खरीद

ब्लू और हरा डिब्बा लोहे के स्टैंड सहित एक सेट की खरीद की लागत 7000 रुपये दिखाया गया. निगम ने कचरा डिब्बों के 300 सेट की खरीदारी की. इस तरह कुल लागत 21 लाख रुपये आयी. चर्चा यह भी है कि अब और 200 से ज्यादा डिब्बे की खरीद करने की योजना बन रही है. छठ पूजा से पहले खरीद यानी कमीशन का बड़ा खेल होगा.

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क्या कहते हैं नगर आयुक्त महोदय

नगर आयुक्त के चंद्रमोहन कश्यप ने कहा कि डस्टबिन पर निगरानी रखी जा रही है, निगम की संपत्ति कोई भी जहां-तहां नहीं कर सकता है. अगर कोई कर रहा है तो, पकड़े जाने पर उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

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