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पोटका आइये और देखिये कैसे आज भी आदिम युग में रह रही है एक आदिम जनजाति

पीने को गड्ढे का पानी और घर के नाम पर पेड़ का मचान, ऐसे रहते हैं झरनाकोचा के 12 सबर परिवार

Jamshedpur :   केंद्र और राज्य सरकार जनजातियों के कल्याण की और उनके विकास की ढेरों योजनाएं चलाती है. आदिम जनजातियों के लिए तो राशन समेत कई विशेष सुविधाएं उनके घर तक पहुंचाने के वायदे किये जाते हैं, लेकिन ये योजनाएं पोटका प्रखंड के ओतेझड़ी गांव के झरनाकोचा टोला में आकर गुम हो जाती हैं. यहां विलुप्ति के कगार पर खड़ी आदिम जनजाति सबर के 12 परिवार आज भी सभ्यता के उसी आदिम युग में जी रहे हैं, जिसके चलते उनका नाम आदिम जनजाति पड़ा. यह जनजाति तेजी से विलुप्त होती जा रही है, लेकिन उससे भी ज्यादा तेजी से लुप्त हो रही है सरकारी महकमे की संवेदना. झरनाकोचा के ये 12 सबर परिवार प्रकृति के भरोसे पर जिंदा हैं. खाल का गंदा पानी इनकी पेयजल की जरूरत को पूरा करता है और घर के नाम पर पेड़ पर बने कुछ मचान हैं, जो इन्हें मौसम के कोप से बचाने के लिए नाकाफी हैं, मगर इन्हें कोई गम नहीं है. गम इसिलए नहीं है, क्योंकि यही इनकी जिंदगी है. दिन-दुनिया से बेखबर अपने इसी स्वाभाविक जीवन को उन्होंने अपनी नियति मान लिया है, लेकिन उनकी यह नियति इन सबरों के नाम पर बनी सरकारी योजनाओं की बंदरबांट कर लेनेवाले सरकारी अमले के चेहरे पर एक बदनुमा धब्बा है.

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तालाब में गड्डा खोद कर निकालते हैं पानी

ओतेझड़ी गांव का झरनाकोचा टोला पोटका प्रखंड से करीब 20 किमी दूर हरिना पंचायत अंतर्गत मेजोगोड़ा होते हुए दो किमी घने जंगलों व पहाड़ी रास्ते के बीच है. इस टोला में गर्मी के आहट पर ही गड्ढे भी जब सूख गये, तो सबरों ने तालाब में एक गड्ढा (खाल) खोदा. इसी गड्ढे के पानी से 12 परिवारों के कुल 40 सबर अपनी प्यास बुझाते हैं औऱ दूसरी जरूरतों को पूरा करते हैं. भारत चांद पर मानव भेजने की तैयारी कर रहा है, लेकिन इन सबरों के गांव में न बिजली पहुंची है न चापाकल गाड़ा गया है.

स्कूल तक पहुंच ही नहीं पाये सबर बच्चे

ये सबर परिवार गर्मी से बचने के लिए पेड़ पर मचान बना कर रहते हैं. सड़क है नहीं सो इनके बच्चे कभी स्कूल तक पहुंच ही नहीं पाये. जंगलों में निवास करनेवाले इन सबर परिवारों को वन पट्टा तक नहीं दिया गया है. इस कारण सरकारी सुविधाएं इनके दरवाजे तक पहुंचने के पहले ही रुक जाती हैं.

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