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झारखंड के सत्ताधारी दलों में शुरू हुआ शीत युद्ध, अपने-अपने वोट बैंक को ताड़ने में जुटे झामुमो-कांग्रेस

Gyan Ranjan

Ranchi : झारखंड की सत्ता में काबिज झामुमो, कांग्रेस और राजद एकजुट होने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन अन्दर ही अन्दर इन दलों में शीत युद्ध शुरू हो गया है. साफ़ तौर पर कहा जाये तो झारखंड के सत्ताधारी दलों में खटराग शुरू हो गया है. मामला नमाज कक्ष के लिए कमरा आवंटन का हो, नियुक्ति वर्ष का हो, नियोजन नीति का हो या भाषाई विवाद का. लगातार कांग्रेस और झामुमो के बीच कलह मीडिया के माध्यम से सामने आ रहा है.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का भाषा के मामले पर एक निजी चैनल को दिये गये हालिया बयान से कांग्रेस और राजद सकते में हैं. यही वजह है कि जिस बात का विरोध अबतक कांग्रेस के विधायक करते आ रहे थे उस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर का भी सरकार विरोधी ट्विट सामने आया है.

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भले ही सत्ता की चाशनी में कांग्रेस और झामुमो चिपकी हुई हो लेकिन दोनों ही दलों की निगाहें अपने-अपने वोट बैंक पर हैं. अब इसको लेकर दोनों ही दलों के द्वारा पासा फेंका जाने लगा है.

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जेएसएससी में भाषा विवाद से हुई शुरुआत

झामुमो और कांग्रेस के बीच सबसे पहले जेएसएससी में भाषा को लेकर विवाद की शुरुआत हुई. हेमंत सरकार ने हिंदी, भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषा को इसमें नहीं रखा है. कैबिनेट में जब यह निर्णय हुआ उस समय कांग्रेस कोटे के मंत्री बैठक में थे लेकिन बाद में सरकार के इस निर्णय की खिलाफत कांग्रेस विधायकों ने ही शुरू कर दी.

हालांकि झामुमो कोटे से मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने भी सरकार से भोजपुरी और मगही को जोड़ने का आग्रह किया था. मजेदार बात यह है कि झामुमो ने अपने वोट बैंक को ध्यान में रख कर झारखंड कर्मचारी चयन आयोग में भाषा तय कर दी. सरकार में शामिल कांग्रेस और राजद को यह नागवार गुजर रहा है.

यही वजह है कि पहले प्रदेश राजद ने इसका विरोध किया फिर कांग्रेस विधायकों ने और अब तो कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने खुल कर इसका विरोध कर दिया है.

हेमंत सरकार के इस निर्णय से कांग्रेस और राजद को अपने वोट बैंक की चिंता सता रही है. कांग्रेस के अधिकांश विधायक उस क्षेत्र से हैं जहां भोजपुरी, मगही, अंगिका बोली जाती है.

दूसरा मसला यह है कि झारखंड के मूल निवासी जो राज्य के बाहर रह कर मैट्रिक और इंटर की पढ़ाई किये हैं उन्हें यहां की स्थानीयता का लाभ नहीं मिलेगा. इसका भी विरोध सरकार में शामिल कांग्रेस और राजद कर रहे हैं.

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विधानसभा में नमाज कक्ष आवंटन ने आग में घी डालने का किया काम

विधानसभा के मानसून सत्र के समय विधानसभा अध्यक्ष ने नमाज अदा करने के लिए विधानसभा में एक कमरे का आवंटन किया. इसका विरोध भाजपा विधायकों ने इस कदर किया कि पूरा सत्र ही हंगामे की बलि चढ़ गया.

भाजपा के सड़क से लेकर सदन तक विरोध के बाद कांग्रेस पार्टी को लगा कि इस निर्णय से सबसे ज्यादा उन्हें ही नुक्सान होगा. लगे हाथ कांग्रेस विधायकों ने भी इस निर्णय पर सर्वसम्मति बनाने की मांग कर दी.

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झाविमो से कांग्रेस में शामिल हुए विधायक प्रदीप यादव के आलावा किसी अन्य विधायकों ने स्पीकर के इस निर्णय का समर्थन नहीं किया. मंत्री बन्ना गुप्ता ने भी इसका विरोध किया था. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने तो स्पीकर के इस निर्णय की खुलकर मुखालफत की थी.

झामुमो स्पीकर के माथे पर खेलकर मुस्लिम वोट को आकर्षित करने के लिए यह पासा फेंका था. झामुमो के इस पासे में कांग्रेस फंसती नजर आई और यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी ने स्पीकर से मिलकर बीच का रास्ता निकलवाया और अब सर्वदलीय समिति इसपर निर्णय लेगी.

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नियोजन और स्थानीय नीति को लेकर खटराग

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वर्ष 2021 को नियुक्ति वर्ष तो घोषित कर दिया है लेकिन अबतक नियोजन और स्थानीय नीति नहीं बनी है. इसको लेकर भी सत्ताधारी दलों में खटराग है.

कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और विधायक बंधु तिर्की ने सदन में मुख्यमंत्री से ही यह सवाल कर दिया था कि नियुक्ति वर्ष तो घोषित कर दिया गया है लेकिन स्थानीय कौन होगा इसका निर्णय तो अबतक नहीं हुआ है.

निजी क्षेत्रों में स्थानीय को 75 प्रतिशत आरक्षण से सम्बंधित बिल के समय बंधू तिर्की सहित कांग्रेस के कई अन्य विधायकों ने स्थानीय नीति और नियोजन नीति पर सवाल खड़े किये थे. अब तो प्रदेश कांग्रेस के नये अध्यक्ष ने भी ट्वीट कर कहा है कि नियुक्ति वर्ष के तो महज तीन महीने बचे हैं. नियुक्ति कब होगी.

कहा जा सकता है कि महागठबंधन की सरकार भले ही चल रही है और ऊपर से सबकुछ ठीक दिख रहा है लेकिन सरकार के अन्दर इन मुद्दों पर खटराग चरम पर है.

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