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विपक्षी दलों के बीच गठबंधन का संकट

छत्तीसगढ़ में मायावती ने कांग्रेस के बजाय जोगी के साथ गठबंधन का एलान किया है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी वह गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं.

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Faisal Anurag

क्या भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के खिलाफ विपक्ष का मुकम्मल गठबंधन ठोस आकार ले पाएगा ?  बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के ताजा बयान के बाद यह सवाल पूरे विपक्ष और उनके समर्थकों के बीच चर्चा में है. छत्तीसगढ़ में मायावती ने कांग्रेस के बजाय जोगी के साथ गठबंधन का एलान किया है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी वह गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने कांग्रेस के कुछ नेताओं पर बसपा को खत्म करने की साजिश का आरोप लगाते हुए कहा है  कि ये नेता नहीं चाहते हैं कि बसपा का कांग्रेस से गठबंधन हो. हालांकि उन्होंने अपने इसी बयान में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तारीफ करते हुए कहा है कि वे दोनों ही गठबंधन के प्रति गंभीर और ईमानदार हैं. बावजूद जिस तल्खी का इजहार मायावती ने किया है उसे लेकर मायावती समर्थकों और गठबंधन चाहनेवालों के बीच बहस तेज हो गयी है. राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस बसपा के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन करेगी.

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एक तबका जहां मायावती का पक्ष ले रहा है, वहीं दूसरी ओर मायावती पर जांच एजेंसियों के प्रभाव में आकर इस तरह का फैसला लेने का आरोप लग रहा है. कहा जा रहा है कि बसपा अपनी राजनीतिक ताकत को इन राज्यों में बढ़ाकर देख रही है. दूसरी ओर बसपा समर्थक कह रहे हैं कि यदि बसपा ने इन राज्यों में तालमेल नहीं किया है और उसकी राजनीतिक ताकत नहीं है तो फिर उसपर आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं. एक तबका कहता है कि बसपा के इस फैसले के बाद भी राज्यों के चुनाव में परिवर्तन होगा, जबकि एक खेमा मान रहा है कि बसपा ने बिना चुनाव हुए ही भारतीय जनता पार्टी को बढ़त दे दी है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कि राज्यों के चुनाव परिणाम बसपा के निर्णय से कितने प्रभावित होंगें या नहीं बल्कि लोकसभा चुनावों पर इसका क्या मनोवैज्ञानिक असर पडेगा.

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मूल सवाल एक परसेप्शन का है क्योंकि भाजपा एक ओर जहां अपने गठबंधन को मजबूत बनाने और उसे और बढ़ने की रणनीति पर गंभीर दिख रही है, वहीं भाजपा विरोधी ताकतें एकजुट चुनाव अभियान की प्रक्रिया में कमजोर दिख रही है. क्षेत्रीय दलों की महत्वकांक्षाओं ने विपक्षी एकजुटता को प्रभावित करना शुरू कर दिया है क्योंकि अनेक क्षेत्रीय दलों के नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे हैं. उन्हें लगता है कि जिन राज्यें में इनकी ताकत और आधार है, वहां कांग्रेस उनके सहयोग  के बिना कामयाब नहीं होगी. कुछ विपक्षी दलों के नेताओं के व्यवहार से यह भी दिख रहा है. इनके गठबंधन को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर नहीं है. ऐसे दलों को जांच एजेसियों को घेर में लेने या उनसे प्रभावित करने की कोशिश भी खूब हो रही है. भाजपा की कोशिश यही है कि कोई भी  मुकम्मल गठबंधन तैयार नहीं हो और उसकी चुनावी जीत की संभावना बनी रहे. विपक्ष के सभी दल इस तथ्य को महसूस करते हैं कि अकेले-अकेले भाजपा गठबंधन का मुकाबला कारगर तरीके से नहीं कर सकते हैं. लकिन उनका दबाव यह है कि इस मौके का लाभ उठा वे अधिक से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकें. क्षेत्रीय दलों के अनेक नेता भी अपने प्रमुखों को इसके लिए सहमत करने की कोशिश कर रहे हैं. विपक्षी दल मान रहे हैं कि 2014 की तुलना में हालात विपक्ष के अनुकूल है और वे अपने-अपने जनाधारों की एकजुअता से साझे तौर पर भाजपा गठबंधन से बढ़त ले सकते हैं. चाहत के बावजूद व्यवहार में दिख रहा है कि इन दलों के बीच अविश्वास ज्यादा गहरा है. इन आविष्कारों को खत्म  करने के लिए जिस राजनीतिक संकल्प और वैचारिक आधार की जरूरत होती है, उसका अभाव भी दिख रहा है.

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गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए कांग्रेस पर अकेले चलने का आरोप लगाने वाले नेता भी मुखर हैं. उनका तर्क है कि दलों का दूसरे राज्यों में मामूली आधार है, वे भी सीटों की मांग बढ़ा-चढ़ा कर रहे हैं. गठबंधन की राजनीति केवल सत्ता पाने के लिए सफल नहीं होती है. उसे एक वैचाकि जामा भी पहनना पड़ता है. भारत जिस आर्थिक संकट से गुजर रहा है, उसमें वैकल्कि अर्थनीति की मांग भी जोर पकड़ रही है. क्रोनी कैपटलिज्म ने राजनीतिक दलों के अंदर भी एक तरह का क्रोनी धारा को मजबूत बना दिया है.

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वर्तमान संकट के मुकाबले के लिए किसी नई आर्थिक नीति की बात नहीं हो रही है. 2014 में भाजपा जिन तर्कों के साथ सत्ता में आयी थी, वह उससे पूरी तरह मुकर गयी है और भारती की राजनीति में क्रोनी पूंजीपतियों के प्रभाव को बहुत ज्यादा मजबूत कर दिया है. राफेल मामल में अब तक जो भी तथ्या दिख रहे हैं, उसमें इसका प्रभाव  देखा जा सकता है. 1991 में जिन आर्थिक नीतियों की शुरूआत की गयी थी, वह दुनियाभर में कराह रही है. भारत के आर्थिक संकट को इन्हीं व्यापक संदर्भों में देखने की जरूरत है. इसी तरह भारत में जिस तरह के सामाजिक हालात भी उभरे हैं वह चिंताजनक है. विकल्प देने वालों से अपेक्षा की जा रही है, इनके संकीर्ण विवादों में उलझे ही नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक विमर्श को व्यापक बनाए और मौजूदा शाषकों की नीतियों के बरक्श अपनी प्रतिबद्धता का इजहार करें. विपक्षी गठबंधन की कामयाबी इन्हीं सवालों का जबाव देकर एक आकार ग्रहण कर सकता है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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