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झारखंड के कोयले से बिजली उत्पादित करने वाले राज्य झारखंड को ही बेचते हैं सालाना 3000 करोड़ की बिजली

राज्य में स्थापित पावर प्लांट को हर दिन चाहिए 43 हजार टन कोयला

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Ranchi: राज्य गठन से लेकर अब तक एक मेगावाट बिजली का भी उत्पादन बढ़ नहीं सका. प्रदेश की बिजली व्यवस्था निजी और सेंट्रल सेक्टर पर टिकी हुई है. दूसरे राज्यों से बिजली खरीदी जा रही है. खास यह है कि दूसरे राज्य झारखंड का कोयला खरीद कर झारखंड को ही सालाना 3000 करोड़ की बिजली बेचते हैं. वहीं एनटीपीसी और डीवीसी को झारखंड में ही कोल ब्लॉक आवंटित किया गया है. जबकि डीवीसी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल और एनटीपीसी का मुख्यालय दिल्ली में है. वहीं हरियाणा के यमुनानगर में बन रहे पावर प्लांट के लिए झारखंड के बादलपारा और कल्याणपुर कोल ब्लॉक आवंटित किया गया है. जबकि पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन को पैनम कोल माइंस आवंटित की गयी है.

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झारखंड में सालाना 125 मिलियन टन होता है कोयला का उत्पादन

झारखंड में सालाना 125 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है. इसमें 100 मिलियन टन(95 फीसदी) कोयला गुजरात, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, बिहार, तमिलनाडू, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली चला जाता है. राज्य के खाते में सिर्फ 25 मिलियन टन ही आता है. जबकि राज्य में स्थापित निजी और सरकारी उपक्रम के पावर प्लांट को चलाने के लिए हर दिन 43 हजार टन कोयले की जरूरत होती है.

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किस प्लांट को प्रतिदिन कितने कोयला की जरूरत

• टीवीएनल     :     7000 टन प्रतिदिन
• डीवीसी        :     24 हजार टन प्रतिदिन
• आधुनिक      :    10 हजार टन प्रतिदिन
• इंलैंड पावर   :     02 हजार टन प्रतिदिन

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क्या है कोयले का गणित

एक घंटे में एक मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एक टन कोयले की जरूरत होती है. अगर 1000 मेगावाट का पावर प्लांट 24 घंटे तक चले तो 24 हजार टन कोयले की जरूरत होगी. डीवीसी और टीवीएनएल का बकाया बढ़कर 6400 करोड़ हो गया है.

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कौन सी कंपनी सालाना कितने की बिजली झारखंड को बेचती है

• डीवीसी      :     1560 करोड़
• एनएचपीसी :     156 करोड़
• एनटीपीसी   :     648 करोड़
• पीजीसीआइएल(ट्रांसमिशन लाइन का उपयोग भी) : 96 करोड़
• पावर ट्रेडिंग कॉरपोरेशन : 156 करोड़

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