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चार करोड़ की लागत से सहकारिता विभाग ने बनाया आधा-अधूरा गोदाम, इस्तेमाल एक दिन भी नहीं

प्रबंध निदेशक सुरेंद्र सिंह पर आरोप गठित कर विभाग को भेजा गया पत्र छह माह बाद भी सचिव के पास नहीं पहुंचा, न्यूजविंग के पास है पत्र

Anuj Tiwary

Ranchi : सहकारिता विभाग का गबन, घोटाला व भ्रष्टाचार से गहरा नाता हमेशा रहा है. अभी हाल में ही फिर करोड़ों रुपए के हेराफेरी का मामला सामने आया है. जिसमें तीन करोड़ के गोदाम का निार्मण कागजों पर कर दिया गया. लेकिन तीन वर्षों से कोई इस्तमाल नहीं किया गया.

जिसमें छह माह पहले ही तत्कालीन निबंधक राजेश पाठक ने विभागीय सचिव को वेजफेड के प्रबंध निदेशक सुरेंद्र सिंह पर आरोप गठित कर कार्रवाई करने के लिए भेजा था. लेकिन अभी तक यह फाईल सचिव तक नहीं पहुंच पायी है. जिस कारण आरोप तो गठित हो चुका है लेकिन उनके किए गये कारनामों पर कोई सजा नहीं मिल सकी है.

कार्रवाई के लिए लिखे गये पत्र की कापी.

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ये है पूरा मामला

वेजफेड रांची के प्रबंधन निदेशक सुरेंद्र सिंह पर विभाग ने कई तरह की अनियमता, संसाधनों का गलत ढंग से उपयोग करना और कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं. इसकी जांच भी की गयी. जिसमें इसे सत्य पाया गया. इसके बाद निबंधक द्वारा आरोप प्रपत्र क भी गठित किया गया. और विभागीय कार्रवाई के लिए सहकारिता विभाग को भेजा जा चुका है.
इसमें बताया गया है कि वेजफेड रांची में विभाग के माध्यम से तिलकसूती, ईटकी में उर्वरक व्यवसाय व दलहन-तिलहन की अधिप्राप्ति के लिए 5000 मीट्रिक टन क्षमता वाले गोदाम का निर्माण 2016-17 में कराया गया. लेकिन इसका कोई प्रयोग अभी तक नहीं किया जा सका. इससे वेजफेड की आय में कमी आयी. निबंधक ने यह भी बताया था कि अगर गोदाम बनी थी तो उसे किराए के रूप में देकर भी उपयोग लाया जा सकता था.

लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं किया गया. मालूम हो कि गोदाम का निर्माण पूरा तक नहीं हो पाया और इसकी लगभग पूरी राशि का भी इस्तमाल हो गया. सूत्रों के अनुसार इसके निर्माण से पहले ही बंदरबांट हुई. जिसमें ठेकेदार से लेकर अधिकारी तक की संलिप्तता है.

अनुदान के चार करोड़ डकार गये, कालाबाजारी को बढ़ावा दिया गया

सुरेंद्र सिंह पर एक और आरोप भी जांच में सही पाया गया है. इसमें बताया गया है कि उन्होंने खाद की बिक्री में कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार से चार करोड़ रुपए अनुदान के रूप में लिये. लेकिन इसका उपयोग कहीं नहीं दिखा. जबकि कालाबाजारी नहीं रुकी और किसानों को समय व सस्ती दर पर उर्वरक नहीं मिल पाया.

आरोप लगाया गया था कि उन्होंने उर्वरक संबंधी कोई भी व्यवसाय वेजफेड के माध्यम से नहीं किया. जिसमें उनका तर्क था कि इफको द्वारा वेजफेड व सहकारी समितियों को एक समान दर पर उर्वरक उपलब्ध कराया जाता है. जिससे वेजफेड द्वारा उर्वरक का भंडारण कर बिक्री करने में खर्च अधिक बढ़ता है.

इस कारण वेजफेड के माध्यम से व्यवसाय नहीं किया गया. जबकि विभाग का स्पष्ट कहना है अधिक लागत बढ़ने पर अनुदान के रूप में चार करोड़ की राशि कृषि विभाग द्वारा दी गयी. अनुदान की राशि मिलने के बाद भी कोई सफलता नहीं मिली. जिसके लिए वे पूरी तरह जिम्मेदार हैं.

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