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रिश्वतखोरी का दूसरा नाम सहकारिता बैंक, जहां दो करोड़ रिश्वत लेकर जारी कर दी 10 करोड़ की राशि

निदेशक ने पूर्व के आदेश को निरस्त कर राशि जारी करने का दिया नर्देश

Ranchi: रिश्वतखोरी का दूसरा नाम सहकारिता बैंक कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. बैंक अधिकारियों की रिश्वत लेने की कहानी काफी पुरानी है, अब इसमें एक और कहानी जुड़ गई है. दो करोड़ रुपए रिश्वत लेकर सहकारिता बैंक में डाटा सेंटर खोलने के लिए एक निजी कंपनी को करीब 10 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया. बैंक महाप्रबंधक ने दबाव डालकर निदेशक से आदेश जारी करवा कर साफ्टवेयर कंपनी को पैसा जारी किया. जबकि इस डाटा सेंटर की जरूरत नहीं होने और इसकी जांच के आदेश निदेशक ने खुद दी थी. निदेशक ने कुछ पूर्व जारी इस आदेश को निरस्त कर भुगतान का आदेश दे दिया.

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डाटा सेंटर खोलने का कारण जब बैंक प्रबंधन से पूछा गया तो बताया गया कि यह खाताधारियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है लेकिन इसके लिए इतनी मोटी रकम देने पर कोई ठोस जवाब नहीं मिला. मालूम हो कि दर्जनों ऐेसे बैंक हैं जो अपना डाटा सेंटर दूसरे बड़े बैंको में भाड़े के रूप में रखते हैं और अपने खाताधारियों की संख्या के हिसाब से भाड़ा देते हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि सहकारिता बैंक में अन्य बड़े बैंकों की तुलना खाताधारियों की संख्या काफी कम है. न्यूजविंग के पास अपने ही आदेश को निरस्त कर भुगतान करने संबंधी सारे काग़जात उपलब्ध हैं.

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कई बार जांच होती रही है

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सिंहभूम सेंट्रल को-आपरेटिव बैंक के पूर्व निदेशक बिजय कुमार सिंह सह सहकारिता अध्ययन मंडल के प्रदेश अध्यक्ष ने जानकारी देते हुए बताया कि बिना जरूरत के डाटा सेंटर खोलने के नाम पर दो करोड़ रिश्वत लेकर अब तक दस करोड़ से अधिक का बोगस भुगतान कर दिया गया.

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डाटा सेंटर के नाम पर 2017-18 में एक पूर्व रजिस्ट्रार सह प्रशासक ने एक करोड़ कमीशन लेकर पांच करोड़ का भुगतान एक सॉफ्वेयर कंपनी को दे दिया था. उन्होंने आरोप लगाते हुए आगे बताया कि 2019 में तत्कालीन सीईओ ब्रजेश्वर नाथ ने 20 लाख रिश्वत लेकर एक करोड़ का भुगतान उसी कंपनी को कर दिया. इस तरह के भुगतान को लेकर कई बार जांच होती रही, अधिकारी बदलते रहें. लेकिन इसी बीच फिर से भुगतान किया जाता रहा.

जमशेदपुर में 300 बैंको में से सिर्फ दो के पास डाटा सेंटर

जमशेदपुर में करीब 300 बैंक हैं, इनमें एसबीआई और बैंक ऑफ बड़ौदा के पास ही डाटा सेंटर हैं. बाकी अधिकतर बैंक इन्हीं दो बैकों में अपना डाटा रखने के लिए इस्तमाल करते हैं. इसके एवज में उनसे सलाना पैसा भी लिया जाता है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर सहकारिता बैंक को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी जिसके लिए बैंक ने खुद का डाटा सेंटर बनाने के लिए इतनी मोटी रकम दे दी, जबकि इसी बैंक में लाखों कर्जधारियों का खाता एनपीए हो चुका है और बैंक वैसे लोगों से पैसा वसूलने में अधिक सफल नहीं रहा है.

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