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आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री की सीओ मैडम ने कर दी सिफारिश और खुद जमाबंदी करने से मना किया

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Ranchi/Bokaro: झारखंड में जमीन का खेल कैसे-कैसे खेला जाता है, उसकी एक बानगी है बोकारो का कसमार प्रखंड. इससे पहले की खबर में न्यूज विंग ने आपको बताया था कि कैसे जिस जमीन को कभी सीओ कार्यालय ने सरकारी बताया, उसी जमीन की रजिस्ट्री करने के लिए कसमार की तत्कालीन सीओ मोनिया लता ने अनुमंडल के निबंधक से उसकी रजिस्ट्री करने की लिखित रूप से सिफारिश कर दी. बात यही नहीं रुकती है. पूरी तहकीकात करके सीओ मोनिया लता ने निबंधक को ऐसा करने को कहा था. न्यूज विंग ने इस मामले पर उनसे बात की. उन्होंने कहा कि यह मामला काफी पुराना है. उन्हें कुछ अच्छे से याद नहीं है. पूरा मामला याद दिलाने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें एक इस्तीफानामा मिला था. उसी के आधार पर उन्होंने निबंधक को रजिस्ट्री करने की सिफारिश की. न्यूग विंग ने उनसे वो कागजात उपलब्ध कराने को कहा तो उन्होंने दोबारा कभी फोन नहीं उठाया. व्हाट्सएप पर मैसेज कर पूछे जाने पर उन्होंने संवाददाता का नंबर ही ब्लॉक कर दिया. ऐसा वो क्यों कर रही हैं, सहज ही समझा जा सकता है.

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पहले कहा जमीन पर है निवारण चंद्र अड्डी का कब्जा, फिर मुकर गयीं

सीओ स्तर का अधिकारी अगर निबंधक को पूरी जानकारी देकर किसी जमीन की रजिस्ट्री करने की सलाह दे रहा है, तो जाहिर तौर पर उसके पास जमीन संबंधी सारे साक्ष्य मौजूद होंगे और उस साक्ष्य का उन्होंने अध्यन भी किया होगा. लेकिन कसमार की तत्कालीन सीओ मोनिया लता ने ठीक इसके उलट किया. जिस जमीन की सिफारिश उन्होंने रजिस्ट्री के लिए की थी, उसी जमीन को बाद में उन्होंने आदिवासी लैंड का दर्जा दे दिया. सीओ मोनिया लता के पास इस जमीन के म्यूटेशन करने के लिए ऑनलाइन आवेदन आया. आवेदन पर कार्यवाही करते हुए उन्होंने 12 अप्रैल 2019 को लिखा कि आवेदित भूमि खाता संख्या 13 अधिकार अभिलेख के अनुसार आदिवासी रैयत से संबंधित है. आदिवासी रैयती भूमि गैर आदिवासी को कैसे मिली यह आवेदक की तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है. लिखा मौखिक रूप से और मोबाइल पर कई बार संपर्क करने के बाद भी आवेदक संबंधित कागजात उपलब्ध नहीं करा सका. इससे स्पष्ट होता है कि आदिवासी जमीन गलत तरीके से गैर आदिवासी को ट्रांस्फर हुआ है. इसलिए आवेदन को अस्वीकार किया जाता है. इतना ही नहीं ऐसा उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार किया किया.

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जनवरी में कहा रैयती जमीन है, अप्रैल में कहा आदिवासी जमीन है

सीओ मोनिया लता ने अवर निबंधक को 2019 के जनवरी महीने में कहा कि यह जमीन सर्वे के मुताबिक आदिवासी खाते की थी. 24 अप्रैल 1918 के केवाला संख्या 265सी के मुताबिक बाबू जगरनाथ सिंह के नाम पाया गया. जगरनाथ सिंह ने बाद में जमीन निवारण चंद्र अड्डी और दूसरों को 05 सितंबर 1955 को दे दी. 1955 से लेकर 2016 तक लगान रसीद भी कट रही है और इस जमीन पर निवारण चंद्र अड्डी का कब्जा है. इसलिए जमीन की रजिस्ट्री की जा सकती है. वहीं अप्रैल में फिर से कहा कि अभिलेख के अनुसार आदिवासी रैयत से संबंधित है. आदिवासी रैयती भूमि गैर आदिवासी किस तरह मिला यह आवेदक की तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है. लिखा मौखिक रूप से और मोबाइल पर कई बार संपर्क करने के बाद भी आवेदक संबंधित कागजात उपलब्ध नहीं करा सका. इससे स्पष्ट होता है कि आदिवासी जमीन गलत तरीके से गैर आदिवासी को ट्रांस्फर हुआ है. जबकि 2012 की आरटीआइ में सीओ कार्यालय की तरफ से साफ लिखा था कि जमीन सरकारी है. इसपर किसी का मालिकाना हक नहीं है. फिर अचानक से सीओ मोनिया लता ने पहले जमीन को रैयती बताया फिर आदिवासी जमीन का दर्जा दे दिया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हर तीन महीने में सीओ मैडम जमीन का नेचर कैसे बदल देती हैं. क्या हर बार उन्हें नया साक्ष्य मिलता है या फिर इसके पीछे कोई और ही वजह है.

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