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कृषि बिल पर सीएम का हमला: कहा- इस विधेयक से आत्महत्या के लिए मजबूर होंगे किसान, नए महाजन देंगे दस्तक

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Ranchi. संसद में पिछले दिनों लाये नये कृषि नीति और शामिल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की नीति को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संघीय ढांचे पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा हमला बताया है. उन्होंने कहा कि कृषि पूरी तरह से राज्य सूची का विषय है, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने बिना राज्यों जिसमें शायद भाजपा शासित राज्य भी शामिल हैं की अनुमति के बिना इसे पास कर दिया.

पूंजीपतियों को फायदा

सीएम हेमंत का कहना है कि मोदी सरकार जिस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात करती है, उससे सिर्फ अडाणी-अंबानी जैसे पूंजीपतियों को ही फायदा मिलेगा. कॉन्ट्रैक्ट का मतलब होता है अनुबंध. यह सभी जानते हैं कि झारखंड राज्य में अनुबंधकर्मियों की स्थिति आज क्या है. हेमंत ने मगरा मुंडा नाम के एक कल्पानिक किसान का जिक्र करते हुए कहा कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत आडाणी–अंबानी द्वारा किये इससे एकरानामा को तोड़ दिया, तो यह सभी जानते हैं कि कोर्ट किसके पक्ष में फैसला सुनाएगी.

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क्या मगरा मुंडा इतना ताकतवर होगा कि वह इनसे कोर्ट में लड़ाई लड़ सके. कोर्ट में तारीख पर तारीख मिलती रहेगी और अंत में फैसला पूंजीपतियों के पक्ष में आएगा. जिसके बाद मगरा मुंडा को आत्महत्या करनी पड़ेगी. कृषि बिल को लेकर हेमंत ने कहा कि केंद्र की मनमानी ऐसे ही चलती रही तो राज्य में उलगुलान होगा. लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे.

शक्तियों का केंद्र ने किया दुरुप्रयोग

मुख्यमंत्री ने कहा कि शुक्रवार को देश के सभी किसान संघों ने भारत बंद का आह्वाहन किया था. यह इसलिए हुआ क्योंकि केंद्र सरकार ने कृषि नीति को बदला है. नये कृषि बिल 2020 को मोदी सरकार ने येन केन प्रकारेण पारित कर देश के किसानों के उपर थोपना चाहती है. इससे पहले भी केंद्र सरकार ने संविधान द्वारा मिली शक्तियों का का काफी दुरुप्रयोग किया है.

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उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के समय लागू जीएसटी अभी भी ठीक से लागू भी नहीं हो पाया है. कई जगहों को जीएसटी के माध्यम से हजारों करोड़ों के घोटाले हो रहे हैं. उसके बाद कोल ब्लॉक नीलामी प्रक्रिया, शिक्षा नीति के बाद अब नया कृषि नीति. समझ में नहीं आ रहा है कि प्रधानमंत्री को देश को किस दिशा में ले जानाना चाहते हैं.

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राज्य का विषय है कृषि

मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि पूरी तरह से संविधान द्वारा राज्य का विषय बताया गया है. संविधान में इसका वर्णन है कि संसद कौन सा बिल बना सकता है, किस में संशोधन कर सकता है. साथ ही राज्य और केंद्र दोनों मिलकर क्या बना सकते हैं. अगर केंद्र को कृषि में कुछ सुधार करना था, तो उसे पहले राज्यों से बात करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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हेमंत ने कहा कि अगर देश में इमरजेंसी होती या राज्य सरकारों ने इस पर सुझाव करने की मांग की होती तो केंद्र कुछ पहल करता. लेकिन यह सभी जानते हैं कि किसी भी राज्य ने कृषि नीति में संशोधन का सुझाव नहीं दिया है. यहां तक कि किसान विरोधी इस बिल को शायद भाजपा शासित राज्यों ने भी अपना समर्थन नहीं दिया होगा.

गैर सहकारी संघवाद का उदाहरण है नई कृषि नीति

कृषि नीति को संघीय ढांचे पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बताते हुए हेमंत ने कहा एक समय झारखंड में जिस महाजनों के खिलाफ किसानों ने लंबी लड़ाई लड़ी थी, अब उसके जगह एक नये महाजनों ने दस्तक दे दी है. ये किसानों का शोषण करेंगे. उन्होंने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री ने लोकसभा में लंबा भाषण दिया था. उसी समय हमें लगा था कि कुछ खेल खेला जाएगा. पीएम ने कहा था कि 2019 के बाद सरकार एक नये रिफॉर्म शुरू करेगी. इसमें श्रम, कृषि प्रमुखता से शामिल था. हेमंत ने कहा कि केंद्र इसे सहकारी संघवाद कहती है, लेकिन लेकिन उनकी नजर में यह गैर सहकारी संघवाद है.

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