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बढ़ सकती है सीएम रघुवर दास की मुश्किलें, हाईकोर्ट ने मैनहर्ट मामले में कहा – निगरानी आयुक्त वाजिब समय में आईजी विजिलेंस की चिट्ठी पर फैसला लें

दो जजों वाली इस बेंच ने फैसला सुनाया है कि मामले में तत्कालीन आईजी विजिलेंस एमवी राव की चिट्ठी पर निगरानी आयुक्त एक वाजिब समय में निर्णय लें.

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: 28 सितंबर 2018 को मैनहर्ट मामले को लेकर हुए एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अनिरुद्ध घोष और जस्टिस डीएन पटेल की बेंच ने अहम फैसला सुनाया है. दो जजों वाली इस बेंच ने फैसला सुनाया है कि मामले में तत्कालीन आईजी विजिलेंस एमवी राव की चिट्ठी पर निगरानी आयुक्त एक वाजिब समय में निर्णय लें. हाईकोर्ट के इस आदेश से मैनहर्ट मामले में तत्कालीन नगर विकास मंत्री और वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि मामले की जांच निगरानी विभाग (अब एंटी करप्शन ब्यूरो) ने की थी. पर वर्ष 2009 में तत्कालीन निगरानी आईजी एमवी राव ने निगरानी आयुक्त को कई पत्र लिखे. पत्र के जरिये निगरानी विभाग द्वारा मामले में एफआईआर करने की अनुमति मांगी जा रही थी. लेकिन निगरानी आयुक्त ने एक बार भी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया. बताते चलें कि मैनहर्ट मामला वर्ष 2006 का है. उस वक्त नगर विकास मंत्री वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास थे. उनपर आरोप है कि रांची शहर में सिवरेज और ड्रेनेज के लिए उन्होंने सारे नियम को ताक पर रखकर मैनहर्ट कंपनी को काम दे दिया था. जिसके बाद मामले की जांच के लिये एक-के-बाद-एक तीन पीआईएल दर्ज किये गये.

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क्या है मैनहर्ट मामला

2006 में रघुवर दास, अर्जुन मुंडा सरकार में उप मुख्यमंत्री औऱ नगर विकास मंत्री थे. रांची शहर में सिवरेज और ड्रेनेज को लेकर काम होना था. विभाग ने इस काम के लिए ORG/SPAM Private Limited का चयन किया. कंपनी ने काम शुरु कर दिया. करीब 75 फीसदी डीपीआर बनने के बाद कंपनी से काम वापस ले लिया गया और काम मैनहर्ट कंपनी को दे दिया गया. आरोप है कि मैनहर्ट को काम देने के लिए विभाग ने शर्तों का उल्लंघन किया. शर्त थी कि उसी कंपनी को काम मिलेगा, जिसका टर्नओवर 300 करोड़ है और जिसे सिवरेज-ड्रेनेज दोनों काम में तीन साल काम करने का अनुभव हो. मैनहर्ट शर्तों को पूरा नहीं करता था. बावजूद इसके विभाग ने इस कंपनी को काम दे दिया. मामला विधानसभा में उठा. विधानसभा ने जांच के लिये एक कमेटी बनायी. जिसमें सरयू राय, प्रदीप यादव और सुखदेव भगत सदस्य थे. समिति ने रिपोर्ट सौंपी की मैनहर्ट को काम देने में गड़बड़ी हुई है. साथ ही एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच करने की सिफारिश की. लेकिन जांच नहीं हुई.

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पहला पीआईएल वर्ष 2010 में

वर्ष 2010 में मो. ताहिर नाम के एक शख्स ने मामले को लेकर हाईकोर्ट में पीआईएल किया. जिसके वकील राजीव कुमार थे. पीआईएल की सुनवाई करते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस भगवती प्रसाद और नरेंद्र नाथ तिवारी ने 18 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया. दो जजों वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को डीजी विजिलेंस के पास जाकर शिकायत दर्ज कराने के लिए कहा. आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता की शिकायत में किसी तरह कोई सच्चाई है, तो आगे की कानूनी कार्रवाई हो. विजिलेंस ने पीई दर्ज करते हुए मामले की जांच की. जांच में गड़बड़ी पायी गयी. मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए विजिलेंस आईजी एमवी राव की तरफ से पांच बार मार्गदर्शन मांगे जाने के बावजूद निगरानी आयुक्त कार्यालय से कोई मार्गदर्शन नहीं आया. बताते चलें कि उस वक्त निगरानी आयुक्त राजबाला वर्मा थीं. राजबाला वर्मा को वर्तमान सरकार ने मुख्य सचिव बनाया था. औऱ वह राज्य की सबसे विवादास्पद मुख्य सचिव रहीं. विपक्ष ही नहीं सरकार के लोगों ने भी राजबाला वर्मा पर कई गंभीर आरोप लगाये हैं. जिसकी जांच अभी तक नहीं करायी गयी.

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दूसरा पीआईएल वर्ष 2012 में

तत्कालीन निगरानी आयुक्त की तरफ से आईजी विजिलेंस को कोई मार्गदर्शन नहीं मिलने के बाद मामले में दूसरा पीआईएल वर्ष 2012 में दायर हुआ. कोर्ट ने जब राज्य सरकार से जवाब मांगा तो सरकार ने जवाब दिया कि महाधिवक्ता की राय के बाद सीएम ने मामले को लेकर निगरानी से जांच कराने को मना किया है. उस वक्त झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा थे. कहा गया कि अब मामले की जांच खुद विभाग यानि नगर विकास विभाग करेगा.

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तीसरा पीआईएल वर्ष 2016 में 

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता आलोक कुमार दुबे ने मामले को लेकर तीसरा पीआईएल वर्ष 2016 में दायर किया. इस पीआईएल पर सुनवाई करते हुए 28 सिंतबर 2018 को हाईकोर्ट के जस्टिस अनिरुद्ध घोष और जस्टिस डीएन पटेल ने फैसला सुनाया कि निगरानी आयुक्त एक वाजिब समय में आईजी विजिलेंस के चिट्ठी पर निर्णय लें. फिलहाल निगरानी आयुक्त एसकेजी राहटे हैं. उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्त पर जाने के लिए काफी पहले आवेदन दे दिया है. अगर उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश पर कोई निर्णय लिया, तो इससे मुख्यमंत्री रघुवर दास की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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आईजी एमवी राव ने पांच बार मांगा था निर्देश, नहीं मिला जवाब

पहली बार 16 अगस्त 2009 को निगरानी विभाग के आईजी एमवी राव ने तत्कालीन निगरानी आयुक्त राजबाला से हाईकोर्ट के आदेश के बाद मार्गदर्शन मांगा था. लेकिन राजबाला की ओर से कोई जवाब नहीं आने के बाद दोबारा से आईजी ने 22 सितंबर 2010, 04 दिसंबर 2010, 20 जनवरी 2011 और फिर 28 मार्च 2011 को पत्र लिखकर निर्देश मांगा. लेकिन  एक बार भी निगरानी आयुक्त की तरफ से किसी तरह का कोई जवाब नहीं आया.

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