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सीएम धान खरीद पर 200 रुपये बोनस देने की फाइल पर 30 दिनों से नहीं ले रहे फैसला

सरयू राय ने सीएम को लिखा पत्र, कहा- धान बेचने के इच्छुक किसानों के बीच निराशा, सीएम अनिश्चितता की स्थिति का करें पटाक्षेप

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Ranchi: मुख्यमंत्री रघुवर दास ने किसानों को धान की खरीद पर 200 रुपये बोनस देने की घोषणा की थी. पर जब उन्हें बोनस देने की बारी आयी है तो वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहे हैं. धान खरीद पर 200 रुपये बोनस देने की फाइल सीएमओ में पिछले 30 दिनों से पड़ी है. इस पर कोई फैसला नहीं हो पा रहा है. इसी आलोक में खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को चिट्ठी लिखी है.

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पिछले साल मिला था 150 रुपये प्रति क्विंटल

सरयू राय ने पत्र में कहा है कि धान खरीद में बोनस देने से संबंधित फाइल पिछले कई दिनों से आपके पास पड़ी हुई है. साल 2018 का अंतिम दिन बीतने और सरकारी क्रय केद्रों पर धान खरीद आरंभ हुए एक माह बीत जाने के बाद भी फाइल का निष्पादन नहीं हुआ है. इससे धान बेचने के इच्छुक किसानों के बीच निराशा है. इसके पूर्व वर्ष 2016-17 और 2017-18 में क्रमश: 130 रुपया प्रति क्विंटल और 150 रुपया प्रति क्विंटल की दर से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी क्रय केंद्रों पर धान बेचनेवाले किसानों को बोनस का भुगतान हुआ है.

200 रुपये ज्यादा लग रहे हों तो एक सम्मानजनक राशि तय करें

मंत्री सरयू राय ने पत्र में यह भी कहा है कि यदि मुख्यमंत्री को राज्य के किसानों को धान बिक्री पर 200 रुपया प्रति क्विंटल प्रोत्साहन बोनस देना ज्यादा प्रतीत हो रहा है, तो वे विगत दो वर्षों में किसानों को धान खरीद पर दिये गये बोनस को इस वर्ष के लिए देय बोनस का आधार मान कर एक सम्माजनक राशि की स्वीकृति प्रदान कर इस बारे में अनिश्चितता की स्थिति का पटाक्षेप कर सकते हैं.

कैबिनेट की बैठक में बनी थी सहमति

राय ने मुख्यमंत्री से कहा कि आपको स्मरण होगा कि मंत्रिपरिषद की एक बैठक में भी यह विषय अधोहस्ताक्षरी द्वारा अनौपचारिक तौर पर रखा गया था और किसानों को प्रोत्साहन बोनस देने के बारे में किसी भी मंत्री की असहमति नहीं थी. तदुपरांत अधोहस्ताक्षरी की पहल पर विभाग द्वारा एक औपचारिक प्रस्ताव अग्रसारित किया गया. वित्त सचिव का मंतव्य आया कि वित्त विभाग के लिए किसानों को प्रोत्साहन बोनस देने के मद में निधि का उपबंध करना संभव नहीं है. यदि विभाग अपने निधि प्रत्यर्पण मद से बोनस भुगतान करना चाहे तो कर सकता है. यदि विभाग की दृष्टि में यह नई योजना नहीं है तो विभाग इस बारे में अपने स्तर से निर्णय करने के लिये स्वतंत्र है. यदि बोनस भुगतान वित्त विभाग की नजर में नई योजना की श्रेणी में है तो इस पर योजना प्राधिकृत समिति की स्वीकृति ली जा सकती है.

किसानों को प्रोत्साहन बोनस की योजना नयी नहीं

खाद्य आपूर्ति मंत्री ने पत्र में कहा है कि एक तरह से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों को प्रोत्साहन बोनस देने की योजना नई नहीं है, फिर भी अधोहस्ताक्षरी को उचित प्रतीत हुआ कि इस पर योजना एवं वित्त विभाग के वित्त प्रभाग और योजना प्राधिकृत समिति के माध्यम से इस पर विभाग के मंत्री के नाते आपकी सहमति प्राप्त कर ली जाये.

सीएम 200 की जगह 50 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने पर कर रहे विचार

एक सूचना अधोहस्ताक्षरी को गत सप्ताह प्राप्त हुई कि दो सप्ताह पूर्व हुई कैबिनेट बैठक (जिसमें मैं उपस्थित नहीं हो पाया था) के उपरांत मुख्यमंत्री कक्ष में मंत्रियों के बीच हुई अनौपचारिक चर्चा में मंत्री सीपी सिंह ने धान क्रय पर प्रोत्साहन बोनस देने के विषय पर अपनी असहमति व्यक्त की है. सूचना मिलते ही मैंने मंत्री सीपी सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया और बताया कि वस्तुत: 200 रुपया प्रति क्विंटल बोनस देने की जगह मुख्यमंत्री का विचार मात्र 50 रुपया प्रति क्विंटल बोनस देने का आया तो उन्होंने कहा था कि इससे बेहतर तो बोनस नहीं देना है. मैं भी सीपी सिंह की इस प्रतिक्रिया से पूर्णत: सहमत हूं. मेरा विश्वास है कि कोई भी संवेदनशील व्यक्ति भले ही वह मंत्री ही क्यों न हो, सीपी सिंह के मंतव्य से सहमत होगा.

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योजना मंत्री के नाते भी सीएम की सहमति है लंबित

यद्यपि विभाग के लिये यह नई योजना नहीं है. किसानों को प्रोत्साहन बोनस भुगतान की योजना 2016-17 और 2017-18 में लागू हो चुकी है. फिर भी प्रति क्विंटल बोनस की दर में अंतर होने के मद्देनजर अधोहस्ताक्षरी ने विभागीय सचिव को निर्देश दिया कि इस पर योजना प्राधिकृत समिति की स्वीकृति प्राप्त की जाये. योजना प्राधिकृत समिति ने इस पर त्वरित सहमति दे दी. परंतु योजना मंत्री के नाते इस पर आपकी सहमति अभी तक लंबित है.

धान खरीद केंद्रों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में है कम

इस वर्ष किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीदने के लिये अधोहस्ताक्षरी के विभाग को 300 करोड़ रुपये की चक्रीय निधि की जरूरत थी. कारण कि पलामू प्रमंडल में एफसीआइ को छोड़कर अन्य निजी क्रय एजेंसियां झारखंड में धान क्रय के लिये सामने नहीं आयीं. इस कारण राज्य खाद्य निगम को राज्य की सहकारिता संस्थाओं के सहारे धान खरीद के लिए आगे आना पड़ा. इसके लिए आवश्यक कम से कम 300 करोड़ रुपये की चक्रीय निधि की आवश्यकता थी. परंतु राज्य सरकार का वित्त प्रभाग यह निधि उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हुआ. मजबूर होकर विभाग को विभाग की अन्य योजनाओं की निधि के संभावित प्रत्यार्पण से 200 करोड़ रुपये का इंतजाम करना पड़ा. नतीजा हुआ है कि विगत वर्षों की तुलना में खरीद केन्द्रों की संख्या इस वर्ष पूर्व के वर्षों से काफी कम, आधे से भी कम है.

किसानों को खरीद केंद्र आने में तय करनी पड़ती है लंबी दूरी

किसानों को सरकारी खरीद केंद्र तक धान लेकर आने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है. पिछले वर्ष के 150 रुपया प्रति क्विंटल की तुलना में 200 रुपया प्रोत्साहन बोनस किसानों को देने का प्रस्ताव है. विगत दो वर्षों में किसानों को बोनस देने पर क्रमश: लगभग 2,85,00,00,00 रुपया और 2,38,40,00,00 रुपया व्यय हुआ है. पूर्व के दो वर्षों में मॉनसून बढ़िया था, जबकि इस वर्ष सूखा का प्रभाव धान उपज पर स्पष्ट है. कुल मिला कर कृषि उपज का जो दृश्य है उसे देखते हुये और सरकार की क्रय क्षमता को देखते हुये इस वर्ष किसानों को बोनस भुगतान करने पर अधिकतम 40 करोड़ रुपया व्यय होने की संभावना है, जिसके लिए उचित माध्यम से सरकार के पास अधियाचना भेजी गई है और जिस पर स्वीकृति की प्रत्याशा में राज्य के किसान हैं.

सरकार के खजाने पर व्यय का भार नहीं पड़ेगा

न्यूनतम समर्थन मूल्य और उस पर दिया गया प्रोत्साहन बोनस सरकारी क्रय केन्द्र पर आकर धान बेचनेवाले किसान के लिये जितना लाभकारी है उतना ही लाभकारी बाजार के साथ मोल-भाव की ताकत देकर अपने धान की अच्छी कीमत बाजार से भी वसूलने की ताकत उसे प्रदान करता है. इस वर्ष धान की खरीद पर दिये जानेवाले प्रोत्साहन बोनस का व्यय भार भी सरकार के खजाने पर नहीं पड़ेगा क्योंकि अधोहस्ताक्षरी का विभाग उसे स्वयं की राशि से वहन करने के लिये तैयार है. अत: धान खरीद पर बोनस देने के प्रस्ताव पर सहमत नहीं होने का कोई कारण या औचित्य नहीं है.

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