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सीजेआई दीपक मिश्रा दो अक्‍टूबर को होंगे रिटायर,  ऐतिहासिक फैसलों के लिए याद किये जायेंगे

सीजेआई दीपक मिश्रा दो अक्‍टूबर को रिटायर हो रहे हैं. दीपक मिश्रा ने अपने कार्यकाल में कई महत़्वपूर्ण फैसले दिये हैं.

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 NewDelhi : सीजेआई दीपक मिश्रा दो अक्‍टूबर को रिटायर हो रहे हैं. दीपक मिश्रा ने अपने कार्यकाल में कई महत़्वपूर्ण फैसले दिये हैं. श्री मिश्रा अपने दूरदर्शी फैसलों के लिए हमेशा याद किये जायेंगे.  बता दें कि सीजेआई  दीपक मिश्रा सात साल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे. इस क्रम में 13 महीने वे मुख्य न्यायाधीश रहे.  अपने कायर्काल में दीपक मिश्रा ने बहुत सारे अहम फैसले दिये, उनमें से कुछ ऐतिहासिक रहे हैं.  साहित्य व धर्मग्रन्थों का अच्छा ज्ञान रखने वाले जस्टिस दीपक मिश्रा के फैसलों में इस ज्ञान को परिलक्षित करने वाले कोट नजर आते हैं. सेवानिवृत्त होने से एक माह पूर्व सरकार को अगले सीजेआई के लिए नाम का सुझाव देना हेाता है.  नियमानुसार मुताबिक सरकार सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से उनके उत्तराधिकारी का नाम पूछ कर सीजेआई द्वारा सुझाये गये नाम पर ही सरकार मुहर लगाती है.  जान लें कि दीपक मिश्रा ने खुद के खिलाफ आवाज उठाने वाले न्‍यायाधीश रंजन गोगोई का नाम सीजेआई के रूप में केंद्र सरकार के पास भेजा था.

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बाबरी मस्जिद केस में मस्जिद में नमाज पढ़ने को अभिन्‍न हिस्‍सा नहीं माना

सीजेआई दीपक मिश्रा द्वारा कई अहम फैसले दिये गये. उनमें असम में घुसपैठियों की पहचान के लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) बनाने का आदेश,सौम्या मर्डर मामले में ब्लॉग लिखने पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू को अदालत में तलब किया जाना, जाटों को केंद्रीय सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के दायरे से बाहर करने का निर्णय, जेएनयू छात्रनेता कन्हैया कुमार के मामले में एसआईटी गठन से इनकार करना,  कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस कर्णन को छह महीने की कैद की सजा दी.

निर्भया गैंग रेप में सभी दोषियों को सजा देना,अनुसूचित जाति के एक आदमी को दूसरे राज्य में आरक्षण कोटे का लाभ नहीं दिये जाने का निर्णय दिया गया. बाबरी मस्जिद विवाद केस में उन्‍होंने मस्जिद में नमाज पढ़ने को अभिन्‍न हिस्‍सा नहीं मानने का निर्णय दिया. लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा व विधान परिषद चुनावों के उम्मीदवारों को संपत्ति, शिक्षा व चल रहे मुकदमों का ब्योरा देने का आदेश देने वाली पीठ में वे शामिल थे.

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आधार की अनिवार्यता को निजता के अधिकारों का उल्‍लंघन नहीं माना

आधार की अनिवार्यता मामले में सरकारी कामकाज में आधार की अनिवार्यता को निजता के अधिकारों का उल्‍लंघन नहीं माना.  जबकि निजी संस्‍थानों के लिए आधार की मांग को खारिज कर दिया.  समलैंगिकता की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को उन्‍होंने खारिज कर दिया.  साथ ही आईपीसी 377 की वैधता को भी समाप्‍त कर दिया.  समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध को गैर कानूनी नहीं माना.  भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत व्‍याभिचार को उन्‍होंने अपराध नहीं माना.

साथ ही आईपीसी 497 को समाप्‍त कर दिया.  लेकिन तलाक के लिए व्‍याभिचार को आधार माना.  सबरीमाला मंदिर मामले में समानता के अधिकारों को तवज्‍जो देते हुए सभी उम्र की महिलाओं के मंदिर का द्वार खोला.  अभी तक 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के लिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश वर्जित था.

 

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