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शहर के साहित्यकार जयनंदन की नयी किताब ‘मंत्री क्या बने, लाट हो गये’  सुर्खियों में

Jamshedpur : शहर के मशहूर कथाकार और साहित्यकार जयनंदन की नई किताब ‘मंत्री क्या बने, लाट हो गये’ नाम से आयी है. जयनंदन की यह तैंतीसवीं पुस्तक है. यह एक कहानी संग्रह है, जिसमें पंन्द्रह कहानियां शामिल हैं. इन्हीं में पुस्तक का शीर्षक कहानी ‘‘मंत्री क्या बने लाट हो गये’’ एक है. कहानी के इस संग्रह को नयी दिल्ली के ‘‘नयी किताब प्रकाशन’’ ने प्रकाशित किया है. इस कहानी में राजनेताओं के दंभ, उनके जीतते ही उनका मालामाल हो जाना और जनता के प्रति उनकी बेवफाई का लेखा-जोखा है.

बेनकाब करती हैं नेताओं के दोहरे चेहरे को

अपनी साफगोई और बिना लाग-लपेट के बोलने और लिखने वाले जयनंदन ने इस किताब में नेताओं के चेहरे को बेनकाब किया है. मंत्री क्या बने, लाट हो गये..कहानी में जयनंदन ने जनता के प्रति वफादारी की कसमें खाकर कुर्सी पर बैठने वाला आदमी माननीय होते ही दुनिया की सारी सहूलियतों का अधिकारी बन जाता है या बना दिया जाता है. मानो वह मंत्री क्या बना, अंग्रेजों के जमाने का लाट साहब बन गया. इसी कहानी संग्रह में कहानी मान-मर्दन जातीयता के परनाले में उस गलीज गंधाती, अराजक और भेदभाव भरे रवैये की तस्वीर पेश करती है, जिसमें जाति, वर्ग और हैसियत के आधार पर पद की अपेक्षा की जाती है. विधर्मी नामक कहानी मृत्यु के बाद किए जाने वाले पाखंड के नकारी की कहानी है. इन्द्रलोक की धरोहर में सूबे का आदिवासी मुख्यमंत्री ही एक आदिवासी भाई को शहर में स्थित एक महंगी जमीन से बेदखल कर देना चाहता है. इसी तरह अन्य कहानियां भी दोमुंहेपन की विडंबनाओं के बेरहम चेहरों से नकाब उठाती हैं.

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जयनंदन की अब तक 160 कहानियां प्रकाशित

जयनंदन की अब तक लगभग 160 कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्होंने बताया कि कोरोना काल में काफी सृजनशील रहे. इस दौरान जहां कारखाने के मजदूरों की दुश्वारियों और त्रासदियों को अपनी कहानी में दर्ज किया है वहीं बड़ी संख्या में उन्होंने गांव और किसानों की बेबसी और उनपर होनेवाले अत्याचारों पर आधारित कहानियां भी लिखी है. बकौल जयनंदन, इसी क्रम में मैंने राजनीति, बाजारवाद और मजदूरों का धक्कामार निष्कासन (ईएसएस) आदि विडंबनानाओं को भी अपनी खुली आंखों से देखा है और उन्हें कहानियों का विषय बनाया है. इसी क्षेत्र में जीने और बसर करने के कारण झारखंड के वंचित आदिवासियों की बदहाली के दृश्य निहारने के रोज-रोज अवसर मिलते रहे हैं. इनकी मासूम और सरल फितरत तथा इनकी उपेक्षाओं के प्रति कोई लेखक असंवेदनशील होकर नहीं रह सकता. मेरी एक किताब ‘‘गोड़पोछना’’ पूरी तरह झारखंड के पीड़ित व शोषित जनजीवन पर आधारित 11 कहानियों का संकलन है.

2021 में उपन्यास चिमनियों से लहू के रंग का प्रकाशन

जयनंदन ने बताया कि 2021 के कोरोना काल में प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से उनका एक और कथा-संकलन ‘‘मायावी क्षितिज’’ का प्रकाशन हुआ. इसी प्रकाशन से इसी वर्ष मेरा एक उपन्यास ‘‘चिमनियों से लहू की गंध’’ प्रकाशित होकर आया जो कारखाने में प्रबंधन और यूनियन के सम्मिलित दमन-चक्रों से लहूलुहान मजदूरों की व्यथा-कथा पर आधारित है. इस पुस्तक को लंदन आधारित वेबसाइट सिनेइंक ने भी कवर किया. जयनंदन कहते हैं-इसी माह प्रलेक प्रकाशन से मेरा एक उपन्यास ‘‘रंग-प्रहरी’’ छपकर आ रहा है जो रंगमंच और रंगकर्मियों की दुश्चिंताओं और उनके छीजते प्रभाव को रेखांकित करता है. प्रलेक ने वरीय लेखकों पर फोकस करने का ‘‘शिनाख्त’’ नामक एक ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया है. उसके तहत ‘‘जयनंदन : एक शिनाख्त’’ प्रकाशित हो चुका है. यह मेरे कृतित्व-व्यक्तित्व का एक आईना है जो 585 पृष्ठों में फैला हुआ है. ये सभी किताबें अमेजन तथा फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है.

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