न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

जल रहा है सेवन सिस्टर स्टेट्स

283

Faisal Anurag

पूर्वोत्तर के राज्यों में छात्र,मजदूर, बुद्धिजीवी सहित बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. त्रिपुरा में अनिश्चितकालीन बंदी का आह्वान किया गया है. असम के तमाम विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं स्थगित कर दी गयीं हैं. कश्मीर के बाद अब पूर्वोत्तर के राज्यों राज्यों में सरकार ने इंटरनेट सेवा बंद कर दिया है. यह विरोध के हालात नागरिकता विधेयक को लेकर है. देश के अन्य हिस्सों में भी विरोध-प्रदर्शन किए गए हैं.

Sport House

सीएबी के साथ एनआरसी को लेकर इस तरह के विरोध प्रर्दशनों के साथ एक हजार वैज्ञानिकों,लेखकों और सिविल सेवा के रिटायर अधिकारियों ने भी पत्र लिखकर सीएबी का विरोध किया है. इसपर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी हुई है. अमरीकी संसद की मानवाधिकार संस्था ने इसे लेकर कड़ा कदम उठाने की मांग संसद से किया है, तो यूरोपियन यूनियन ने भारत की संवैधानिक प्रतिबद्धताओं और सेकुलर भारत की रक्षा की मांग की है.

इसे भी पढ़ें – विधानसभा भवन में लगी आग को बतायी थी साजिश, बावजूद इसके निर्माण कंपनी रामकृपाल कंस्ट्रक्शन ने नहीं दर्ज करायी FIR

इस संदर्भ में सबसे तीखी प्रतिक्रिया न्यायविदों की ओर से आयी है. जस्टिस मदल लोकुर, संतोष हेगड़े, सोली सोरबजी सहित अनेक लोगों ने नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध किया है. इस विधेयक को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में संविधान विशेषज्ञ प्रो फैजान मुस्तफा ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते  हुए इसे बिट्रेयल ऑफ रिपब्लिक कहा है. केशवानंद भारती बनाम भारत सरकार के मामले में  सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का बार-बार हवाला जानकार दे रहे हैं.

Mayfair 2-1-2020

कानूनविदों के बड़े समूह का दावा है कि संवैधानिकता की कसौटी पर इस विधेयक के पास होने की संभावना को लेकर संदेह व्यक्त किया है. इन जानकारों ने संविधान की प्रस्तावना के साथ-साथ आर्टिकल 14 से 18 तक का हवाला देते हुए अमित शाह के तमाम तर्कों को ध्वसत कर दिया है.

लोकसभा में तो कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने अंतर्राष्ट्रीय संधियों का हवाला देकर सरकार पर जिस तरह आक्रमण किया, उसका समुचित जबाव भी गृह मंत्री नहीं दे पाए.

दक्षिण भारत में भी इस सवाल को लेकर लोगों में गुस्सा है. डीएमके के सांसदों ने उसे स्वर दिया है. खासकर जिस तरह धार्मिक उत्पीड़न का सेलेक्टिव संदर्भ सरकार ने इस विधेयक में दिया है, उससे भारत के अन्य पड़ेसी देशों में हो रहे धार्मिक भेदभाव के सवाल भी चर्चा में आ गए हैं.

अमित शाह ने भारत बंटवारे के जिस नए इतिहास को गढ़ने का प्रयास संसद में किया है, उसे लेकर   भी भारी प्रतिक्रिया हो रही है. यहां तक लालकृष्ण आडवाणी के विश्वासपात्र रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने भी  कहा है कि अमित शाह इतिहास के मामले में झूठ बोल रहे हैं.

इसे भी पढ़ें – पूर्व MLC प्रेम कुमार ने अमित शाह को लिखा खुला पत्र, कहा- अपनी बहुमत का करते हैं बेजा इस्तेमाल  

अमित शाह के बयान के बाद दो नेशन थिउरी का विवाद फिर खड़ा हो गया है. जानकारों ने 1923 के उस किताब की चर्चा की है. जिसमें विनायक सावरकर ने पहली बार धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों की बात की थी. 1935 में अहमदाबाद में हुए हिंदू महासभा के सम्मेलन में भी धर्म के नाम पर दो राष्ट्र की मांग की गयी थी. मोहम्मद अली जिन्ना ने तो सावरकर की प्रस्थापना के 23 साल बाद और  हिंदू महासभा के प्रस्ताव के तीन साल बाद धर्म के आधार पर दो नेशन की बात की थी.

देश के विभाजन को कांग्रेस की पहल नहीं किया था. वह तो अंतिम पक्ष थी, जब उसे विभाजन को मानना पडा था. कांग्रेस महात्मा गांधी हों या नेहरू या पटेल सभी ने विभाजन का विरोध किया. अंग्रेजों ने ही विभाजन की रूपरेखा रखी थी. जिसे बाद में कृपलानी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस पार्टी ने स्वीकार किया था, गांधी जी को इस सवाल पर दुखी मन से चुप्पी साधनी पड़ी थी.

जितने भी दस्तावेज उपलब्ध हैं, वे गवाही देते हैं कि अमत शाह ने झूठ कहा है और वे जानबूझ कर इतिहास की उस भयानक त्रासदी की हकीकत को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं. एक तरफ जहां इस विधेयक को लेकर स्टेटलेसनेस की आशंका बढ़ गयी है. वहीं पडोसी देशों में भी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सवाल और ज्यादा गहरा गया है.

इसे भी पढ़ें – #JharkhandElection: CRPF का आरोप, कहा- जवानों के साथ किया ‘जानवरों जैसा बर्ताव’

इसे तो दूसरे देशों के मामले में आंतरिक हस्तक्षेप बताने की अंतराष्ट्रीय मुहिम भी शुरू हो गयी है. लेकिन पूर्वोतर का संकट कहीं ज्यादा गहरा हो गया है. जहां इंडिजिनस लोग अपनी जमीन और नागरिकता को लेकर सवाल उठा रहे हैं. असम में यह धारणा बलबती हो गयी है कि 1971 की जो सीमारेखा राजीव गांधी अकॉर्ड में तय की गयी थी, उसे केंद्र सरकार बदल रही है.

इन राज्यों में एकस्वर से यह सवाल बुलंद हो रही है कि नागरिकता के मामले में धर्मिकता का सवाल उन्हें स्वीकार नहीं है. असमी लोगों की चिंता यह है कि उनके राज्य में जो बांग्लाभाषी हैं, उन्हें अब इस विधेयक से उनको नागरिकता देने की कोशिश की जा रही है. असम के युवाओं की आवाज है कि वे इस के खिलाफ है.

त्रिपुरा के युवा कह रहे हैं कि वहां इंडिजिनस तो पहले ही माइनॉरिटी में आ गए हैं, अब उनकी जमीन और पहचान खत्म करने का यह विधेयक आधार देगा. मणिपुर के लिए भी अब इस परमिट की व्यवस्था कर केंद्र ने एक नया मोर्चा भी खेल दिया है.

वहीं सिक्किम भी कह रहा है कि वह भारत में 1070 के बाद शामिल हुआ है, उसकी नागरिकता के अपने नियम हैं, जिसे बदले जाने की आशंका पैदा हो गयी है. अमित शाह की सफाई के बाद भी पूर्वोतर की आशंका दूर होने की बजाए गहरा ही गयी है.

डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकतासंपूर्णताव्यावहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचनातथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं हैं. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

इसे भी पढ़ें – क्या रघुवर दास के लिए नरेंद्र मोदी का नजरिया बदल रहा है?

SP Jamshedpur 24/01/2020-30/01/2020

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like