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भाजपा के निशाने पर झारखंड के चर्च

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Faisal  Anurag

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी ने चर्च को निशाना बनाकर अपनी भावी चुनावी रणनीति का संकेत दे दिया है. पहले झारखंड सरकार ने ईसाई आदिवासियों को आरक्षण से वंचित करने का निर्णय लिया. सरकार ने पत्थलगड़ी को चर्च प्रायोजिम बताकर उसे देशविरोधी गतिविधि बताया और अब भाजपा ने चर्च को सबसे बडा जमींदार बताकर चर्च संचालित स्‍कूलों और अस्‍पतालों के नाम से ली गयी, जमीन को आदिवासियों के काश्‍तकारी अधिनियमों का खुला उल्‍लंघन बताया है. भाजपा जनसंघ के जमाने से चर्च पर हमला करती रही है.  मुस्लिम और ईसाइयों पर जनसंघ के जमाने से राजनीतिक आक्षेप लगाते हुए भाजपा ने अपना विस्‍तार किया है. उसकी रणनीति व्‍यापक हिंदुत्‍व को गोलबंद करने की रही है और झारखंड में इसमें सरना आदिवासियों को जोड़कर ठोस वोट आधार बना सके.

एक ओर नॉर्थइस्ट व गोवा के राज्‍यों में भारतीय जनता पार्टी ने बड़े पैमाने पर ईसाइयों को जोड़ने की रणनीति बनायी है और विधानसभा चुनावों में इसका लाभ भी उठाया है. वहीं झारखंड में उसे पता है कि ईसाई वोट उसके लिए महत्‍वपूर्ण नहीं है और इसके विरोध के नाम पर वह व्‍यापक वोट का ध्रुवीकरण कर सकती है. भाजपा को पता है कि आरक्षण के मामले में देश में उसे कामयाबी नहीं मिलेगी क्योंकि आदिवासी समूहों के बारे में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्‍पष्‍ट फैसले हैं कि उनके धर्म बदल लेने मात्र से उनके आरक्षण का सवाल प्रभावित नहीं होता है क्‍योंकि आदिवासी एक अलग एथनिक समूह है और उनकी भाषा संस्‍कति और रहन-सहन मात्र धर्म बदल लेने से प्रभावित नहीं होता, इसलिए उन्‍हें आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता. यदि धर्म बदल लेने से आरक्षण प्रभावित होगा तो दलितों ने बडे पैमाने पर हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया है. इसके बाद भी उन्‍हें आरक्षण की सुविधा दलित होने के कारण प्राप्‍त है. तो क्‍या इन नव बैद्धों का भी आरक्षण प्रभावित होगा. अगर ऐसा होगा तो देशभर में सामाजिक अशांति पैदा होगी.

काश्‍तकारी अधिनियमों में संशोधन के खिलाफ हुए आंदोलन के बाद जिस तरह की आदिवासी एकता बनी थी, उससे भाजपा को आदिवासी बहुल इलाकों में अपना राजनीतिक भविष्‍य संकट में लगने लगा था और इस एकता को तोड़ने के लिए सरकार ने धर्म स्‍वतंत्रय कानून बनाया. इसका असर भी दिखा, लेकिन आदिवासी एकता टूटी नहीं क्‍योंकि स्‍थानीयता की नीति और काश्‍तकारी अधिनियम को लेकर आदिवासी विरोध का स्‍वर दबा नहीं . इस बीच हुए उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को  हार का सामना करना पडा; विपक्ष के फ्रंट पर भाजपा के दावे का खरखंड की जनता पर कोई खास असर नहीं है. इसका कारण साफ है कि जितने दावे किए गए हैं, उनकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है. प्रेक्षक मानते हैं कि विकास जितना हुआ नहीं है, उसका ज्‍यादा प्रचार हुआ है और मीडिया और अन्‍य माध्‍यम  के प्रचार से तेज विकास का भ्रम पैदा किया गया है.

भाजपा ने जिस तरह के कदम उठाए हैं उनकी टाइमिंग को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं. भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन और चर्च पर विभिन्‍न तरह के प्रहार एक साथ होने से संदेह पैदा हुआ है; यह सच है कि पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं का बडा समूह इसाई है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पत्थलगड़ी का आंदोलन एक सामजिक विक्षोभ को प्रकट कर रहा है. जिसे सरकारी तंत्र समझना नहीं चाह रहा है. सवाल है कि यह पूरा पत्थलगड़ी प्रकरण छोटानागपुर और संतालपरगना के काश्‍तकारी अधिनियमों में संशोधन और लैंड बैंक बनाने के बाद ही क्‍यों तेज हुआ, इसके ठोस सामाजिक आर्थिक संदर्भ की समीक्षा कर आदिवासी जनता को विश्‍वास में लेने का सरकारी प्रयास क्‍यों नहीं किया गया.  इस संदर्भ को समझे बिना ही इसे देश विरोध तत्‍वों की करतूत बता दिया गया और मुख्‍यमंत्री ने घोषणा कर दिया कि इसे कुचल दिया जाएगा. इसके बाद भी उस प्रक्रिया को रोकने की दिशा में सकरारी कदम न केवल अर्पाप्‍त साबित हुए बल्कि पत्थलगड़ी की घटनाओं को रोकने में कामयाबी भी नहीं मिली. चर्च के प्रतिनिधि कहते हैं कि पत्थलगड़ी के संदर्भ में कोई नीतिगत फैसला चर्च ने नहीं लिया है. चर्च प्रतिनिधि यह भी बताते हैं कि यह पूरा संदर्भ गुजरात के किसी कुंवर केसरी से जुड़ा है, जिसके नारे भारत सरकार कुटुंब परिवार का प्रभाव इसपर है. चर्च स्‍वयं पत्थलगड़ी के अनेक संदर्भो और मांगो का समर्थन नहीं करता, क्‍योंकि उसे आदिवासी हित में वह खतरनाक मानता है. उनका कहना है कि ऐसे हालात में चर्च को इस आंदेालन से जोड़कर देखना अनुचित है.

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सवाल उठता है कि क्‍या झारखंड के संदर्भ में सबका साथ सबका विकास के नारे में ईसाई समाज शामिल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी को चर्च पर केवल आरोप लगाने के बजाय यदि आरोप हैं तो उसकी जांच करानी चाहिए और उस जांच पर ठोस कार्रवायी करना चाहिए. सामाज में धार्मिक तानाव और विद्वेश से बचने की जरूरत है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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