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बाल दस्ता रोक रहा बाल विवाह, पियर एजुकेटर के रूप में ग्रामीणों को जागरूक कर रहे बच्चे

बच्चों की सक्रियता से गिरिडीह में रुके 40 बाल विवाह

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Chhaya

Ranchi : पढ़ने-लिखने की उम्र में बेटियों को ससुराल विदा करने की परंपरा हमारे समाज से गयी नहीं है. भले ही विकास की कितनी भी किताबें क्यों न लिख ली जायें, लेकिन बाल विवाह जैसी रूढ़ परंपराओं की असलियत गांवों में जाकर ही पता चलती है. इन्हीं गांवों में अब बाल विवाह को रोकने का काम बच्चे कर रहे हैं. गिरिडीह और पूर्वी सिंहभूम के कुछ बच्चे इस क्षेत्र में सक्रिय हैं, जिन्हें पियर एजुकेटर के नाम से जाना जाता है. दोनों जिलों के गांव में 18 से 20 के समूह में बच्चे बाल विवाह के विरोध में खड़े हैं. इन बच्चों ने बताया कि पियर एजुकेटर के रूप में काम करने से काफी कुछ जानने का अवसर मिला. इन बाल समूहों में कक्षा छह से ऊपर के बच्चे शामिल हैं, जो 18 साल से कम के हैं. असल में यह पहल यूनिसेफ की है. यूनिसेफ ने पियर एजुकेटर नामक कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2013 में गिरिडीह से की थी, जिसके तहत ग्रामीण बच्चों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया.

बच्चों की पहल से रुके 40 बाल विवाह

यूनिसेफ राज्य प्रमुख मधुलिका जोनाथन ने बताया कि बाल विवाह को लोग अपराध नहीं, बल्कि परंपरा समझते हैं. कई बार जानकारी होते हुए भी ग्रामीण इसे छुपाते हैं, इसके लिए जरूरी था कि ग्राम स्तर पर बच्चों को इसकी जानकारी देकर उन्हें ही इसे रोकने की जानकारी दी जाये. ग्रामीणों के खिलाफ जाकर बाल विवाह रोकना काफी मुश्किल काम है. कई बार परिस्थिति बिगड़ जाती है. ऐसे में मात्र गिरिडीह में वर्ष 2013 से अब तक बच्चों की ओर से 40 बाल विवाह रोके गये हैं. उन्होंने बताया कि पूर्वी सिंहभूम में 2016 में पियर एजुकेटर की शुरुआत हुई थी.

राज्य के पांच जिलों में ज्यादा है बाल विवाह की समस्या

सरकारी आंकड़ों की मानें, तो राज्य के पांच जिले बाल विवाह से बुरी तरह ग्रसित हैं. इन पांच जिलों में देवघर, कोडरमा, गिरिडीह, गोड्डा, गढ़वा हैं. बाल विवाह के अधिकतर केस राज्य में इन्हीं जिलों से आते हैं. इसका मुख्य कारण गरीबी, अशिक्षा है. बाल विवाह मातृ मृत्यु दर में भी मुख्य भूमिका निभाता है.

ग्रामीणों को समझाना है मुश्किल

पूर्वी सिंहभूम के बहरागोढ़ा ब्लॉक के कोशताजुया गांव के निवासी गौरांग नायक पिछले ढाई साल से पियर एजुकेटर के रूप में काम कर रहे हैं. यह खुद कक्षा 10वीं के छात्र हैं. इन्होंने बताया कि जब पियर एजुकेटर से वह जुड़े, तब वह कक्षा सात में थे. इन ढाई सालों में कई अनुभव हुए. उन्होंने बताया कि कई बार देखा जाता है कि ग्रामीणों को पता होता है कि बाल विवाह अपराध है, लेकिन फिर भी लड़कियों की शादी कर देते हैं. ऐसे में ग्रामीणों को समझाना काफी मुश्किल होता है. कई बार मामला हाथापाई तक आ जाता है, ऐसे में पुलिस प्रशासन की मदद ली जाती है.

जानकारी नहीं थी कि बाल विवाह क्या है

इस क्षेत्र में काम कर रहीं श्वेता टुडू ने कहा कि बाल समूह से जुड़ने से पहले पता नहीं था कि बाल विवाह क्या है. स्कूली किताब और कहानियों में सुना था, लेकिन कम उम्र में शादी होना ही बाल विवाह है, यह नहीं पता था. उन्होंने बताया कि वह पूर्वी सिंहभूम के बोड़ाम ब्लॉक के सीमा गोड़ा गांव की निवासी हैं, जहां पिछले दो साल से काम करते हुए इनके समूह ने गांव में चार बाल विवाह को रोका है.

अंत में ली जाती है बीडीओ और पुलिस की मदद

इन बच्चों ने बातचीत के दौरान बताया कि एक पंचायत के सभी गांवों में अलग-अलग पियर एजुकेटरों का समूह काम करता है. ये प्रत्येक गांव में 18 से 20 के समूह में होते हैं. कुछ ऐसे बालक भी इस ग्रुप से जुड़े हैं, जो अब 18 की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन फिर भी ये बाल विवाह के विरुद्ध सक्रिय हैं. इन बच्चों से जानकारी मिली कि गांव में जब बच्चों के समझाने पर भी ग्रामीण नहीं मानते हैं, तो पंचायत स्तर पर इसकी शिकायत की जाती है. यहां भी बात नहीं बनी, तो बीडीओ और पुलिस की सहायता ली जाती है.

बाल विवाह के हैं कई दुष्प्रभाव

बाल विवाह का सीधा असर बच्चियों के शरीर पर देखा जाता है. अविकसित शरीर में बालिका की शादी होने से गर्भधारण के साथ ही कुपोषण, मातृ और शिशु मृत्यु, कमजोर बच्चे का जन्म लेना, सर्वाइकल कैंसर समेत कई अन्य बीमारियों का खतरा रहता है.

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