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मोबाइल और इंटरनेट से बच्चे हो रहे अल्कोहलिक, इसका एक घंटे से अधिक इस्तेमाल खतरनाक

2018 में डब्लयूएचओ ने इंटरनेट एडिक्शन को मेंटल इलनेस का नाम दिया

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Ranchi : बच्चे जब मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं तो अमूमन माता पिता खुश होते हैं कि उनके बच्चे तकनीक को समझते हैं और तेज हैं. लेकिन जब यही मोबाइल बच्चों को गर्त की ओर ले जाता है तो माता पिता भी नहीं समझ पाते बच्चे कैसे मोबाइल और इंटरनेट के जाल में फंसते जा रहे हैं. तकनीक का सही इस्तेमाल हो तो इससे गुरेज नहीं, लेकिन ये तकनीक लत बनकर बच्चों में डिप्रेशन, पर्सनालिटी डिसऑर्डर जैसे मानसिक रोगों को निमंत्रण देता है.

अल्कोहल की लत की ओर बढ़ रहे बच्चे

इतना ही नहीं इस लत ने बच्चों को अल्कोहल की ओर भी अग्रसर कर दिया है. जहां एक साल से ऊपर के बच्चे मोबाइल में लिप्त देखे जाते हैं. बढ़ती उम्र के साथ बच्चें अल्कोहलिक हो रहे हैं. मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहार विशेषज्ञ डॉ. पवन कुमार वर्णवाल के अनुसार बढ़ती उम्र के साथ अगर बच्चों को मोबाइल से दूर नहीं किया गया तो बच्चे कई मानसिक रोगों के शिकार तो होते ही हैं साथ ही सिगरेट, तंबाकू समेत अल्कोहल की ओर बढ़ने लगते हैं. क्योंकि इंटरनेट में दिखाने वाले लुभावने विज्ञापन या अन्य विडियो को देखकर बच्चे इसकी ओर आकर्षित होते हैं. इन सभी विडियो को देखकर बच्चे खुद भी ऐसा ही बनना चाहते हैं और विज्ञापन के अनुसार ही व्यवहार करते हैं. विशेषकर 10 – 12 साल से लेकर 17 साल तक के बच्चों में ऐसा काफी देखा जाता है. सिर्फ लड़के ही नहीं इस ओर लड़कियों को भी काफी तेजी से आगे बढ़ते देखा जा रहा है.

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हर सप्ताह आते हैं ऐसे केस

डॉ वर्णवाल के अनुसार हर सप्ताह इलाज के लिये ऐसे बच्चे आते हैं. जो किसी तरह इंटरनेट के जाल में फंसकर नशीले पदार्थों का सेवन करने लगते हैं. डॉक्टर ने बताया कि इनमें 12 साल से ऊपर के बच्चे होते हैं. कई मुश्किल केसों में आठ साल तक के बच्चे नशा के शिकार पाये गये हैं. इनमें अधिकांश डेंड्राइट, गांजा, सिगरेट का इस्तेमाल करते हैं. माता पिता भी बच्चों में इन लतों का कारण बाहरी दोस्ती समझते हैं. जबकि केस स्टडी से पता चलता है कि बच्चे इंटरनेट के लोभ में आकर ऐसा करते हैं. डॉ वर्णवाल के अनुसार सप्ताह में लगभग चार ऐसे केस आते हैं.

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डब्लयूएचओ ने दिया मेंटल इलनेस का नाम

इसी वर्ष वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने इंटरनेट एडिक्शन को मेंटल इलनेस का नाम दिया है. इसकी जानकारी देते हुए डॉ वर्णवाल ने बताया कि डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि बच्चों को समय रहते मोबाइल और इंटरनेट से दूर नहीं किया जाये तो आने वाला भविष्य गर्त की ओर होगा. क्योंकि इंटरनेट के सिर्फ मेंटल या अल्कोहलिक ही नहीं बल्कि शारिरिक प्रभाव भी है. मोटापा, सोचने समझने की शक्ति का कम होना, निर्णय लेने की क्षमता में कमी आदि कई इसके प्रभाव है. पढ़ाई में मन ना लगना इसके सामान्य लक्षण है.

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महिलाएं करती हैं शिकायत

विगत दिनों चुटिया थाना स्थित परिवार परामर्श केंद्र कार्यालय में महिलाओं ने शराबबंदी की गुहार लगायी. महिलाओं ने अपने पत्र में लिखा कि पावर हाउस बस्ती क्षेत्र में दिन भर असामाजिक तत्व शराब पीते हैं. जिसके कारण क्षेत्र के बच्चे भी पढ़ाई लिखाई छोड़कर दिन भर शराब और जुआ में लगे रहते हैं. अपने पत्र में महिलाओं ने लिखा है कि सुबह चार बजे से रात्रि 12 बजे तक क्षेत्र में असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है.

क्या होना चाहिये समाधान

बच्चों के प्रति माता पिता को अधिक सजग होना चाहिये. बच्चें फोन में क्या कर रहे हैं, किस साइट पर कितना वक्त बिता रहे हैं इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए. कोशिश की जानी चाहिये की बच्चे मोबाइल से दूर ही रहें. बच्चों को आउटडोर गेम के लिये प्रोत्साहित करें. माता पिता अधिक से अधिक समय बच्चों के साथ बीतायें. कार्टून, कंप्यूटर गेम आदि से दूर बच्चों को पेंटिंग, आर्ट क्राफ्ट आदि की ओर प्रोत्साहित करें.

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सिस्टम भी है दोषी

हमारे देश में भले ही इंटरनेट रिस्ट्रिक्शन को प्रोत्साहन दिया जा रहा हो, लेकिन फिर भी यहां इंटरनेट पर सरकार किसी तरह का लगाम नहीं लगा पा रही. जबकि दुबई, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों की बात की जाए तो इन देशों में सरकार का इंटरनेट पर नियंत्रण है. इन देशों में कोई भी साइट या विज्ञापन इंटरनेट में यूं ही नहीं खुल जाते हैं.

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