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मुख्यमंत्री जी संथाल परगना के पांच गांव गये, नहीं दिखा विकास

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Pravin Kumar

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा विकास देखना है तो संथाल परगना जाइये. मुख्यमंत्री जी, आपके सुझाव के बाद मैंने संथाल परगना के दुमका जिला के पांच गांवों में विकास देखने और उसकी तलाश करने गांव का रूख किया.

यह वैसे गांव हैं जहां पिछले दिनों बिजली, पेयजल और सड़क की समस्या को लेकर खबरें अखबारों में प्रकाशित भी हुई, लेकिन समस्याएं पिछले आठ माह से वैसी ही है.

मुख्यमंत्री जी जिन पांच गांवों की हमने यात्रा की, वहां तो विकास दिखा नहीं.

गांवों की बदहाली की कहानी पहले जैसी ही है और गांववासियों की परेशानी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती. राशन, पेंशन से वचिंत परिवारों की संख्या भी इलाके दिखी. फिर भी आप (मुख्यमंत्री) किस विकास को देखने की बात कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री भी कई बार कह चुके हैं कि देश में विकास देखना हो तो झारखंड जाइए. पांच गांव की यात्रा के बाद कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री जी आप ने जो कहा, वह संथाल परगना के दुमका में दिखा नहीं. सड़क, पेयजल संकट, पलायन, इलाके की पहचान बनती जा रही है. आप के पांच साल का कार्यकाल भी संथाल परगना में पानी, सड़क जैसे समस्याओं को दूर नहीं कर पाया.

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कई गांव के लोग सड़क नहीं बनाने पर विधानसभा चुनाव के बहिष्कार की बात भी कर रहे हैं.

अखबारों में मुख्यमंत्री का बयान और विज्ञापन के बाद यह विचार प्रबल था कि संथाल परगना के गांवों की तस्वीर बदल चुकी होगी. लेकिन पांच गांवों ने तो बेहद निराश किया और मुख्यमंत्री के दावे जमीन पर दिखे ही नहीं.

क्या है दुमका के इन गांवों की समस्या आप खुद ही देखें और पढ़ें-

पांच गांव जहां विकास की खोज की गयी

गांव-1

जितपुर गांव तक नहीं पहुंची है सड़क, विस चुनाव में वोट बहिष्कार करेंगे ग्रामीण

दुमका जिले के काठीकुंड प्रखंड स्थित पिपरा पंचायत के जितपुर गांव को सरकार सड़क से जोड़ नहीं पायी है. विकास की बयार बहाने के दावों की हकीकत गांव में पहुंचने पर नजर नहीं आयी.

जितपुर गांव की कुल जनसंख्या करीब 250 है. गांव के सड़क से नहीं जुड़े होने के कारण ग्रामीणों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. बच्चों को भी रोज स्कूल आने-जाने में बहुत कठिनाई होती है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में मौजूद सरकारी विद्यालय पारा शिक्षक के भरोसे है, ऐसे में कुछ लोगों ने अपने बच्चों को नामांकन प्राइवेट स्कूल में कराया है.

लेकिन सड़क नहीं होने के कारण स्कूल वैन गांव में नहीं पहुंचती. एंबुलेंस का लाभ नहीं ले पाते. सरकार गरीबों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस की सेवा भले दे रही हो, लेकिन इस गांव के लोग रोड नहीं होने के कारण इसका लाभ नहीं ले सकते.

ग्रामीणों का कहना है कि अगर गांव में कोई गर्भवती या मरीज है और उसे स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरुरी है तो उन्हें डेढ़ किलोमीटर तक खटिया में ले जाना पड़ता है. गांव की समस्या को देखते हुए जितपुर गांव के लोगों ने विधानसभा चुनाव में वोट बहिष्कार करने का निर्णय लिया है.

गांव-2

तीन किमी तक सड़क जर्जर, लोगों ने कहा- मंत्री को गांव में घुसने नहीं देंगे

दुमका जिला स्थित मसलिया प्रखंड के सुगापहाड़ी पंचायत के अंतर्गत झगड़िया मोड़ से हरिपुर मोड़ तक करीब तीन किलीमीटर सड़क कई वर्षो से जर्जर है. इसके साथ-साथ कई पुलिया भी क्षतिग्रस्त हो गया है.

लुईस मरांडी को जब कैबिनेट मंत्री बनाया गया तो ग्रामीणों को लगा अब उनके इलाके का विकास होगा. लेकिन मसलिया प्रखंड के ग्रामीण इलाको की जर्जर सड़कें अब इलाके की पहचान ही बनती जा रही हैं.

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विभाग की सचिव वंदना डाडेल ने समिति को जांच कर रिपोर्ट दो महीने में सौंपने को कहा था. लेकिन अभी तक समिति ने जांच रिपोर्ट विभाग को नहीं सौंपी है.

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जर्जर सड़क से परेशान ग्रामीणों ने अब चुनाव के समय वोट मांगने आने वाले नेताओं को गांव से खदेड़ने का मन बना लिया है. जर्जर सड़कों से तंग आकर प्रखंड के रांगा, दलाही पंचायत के ग्रामीण भी वोट बहिष्कार का निर्णय कर चुके हैं.

ग्रामीणों छमी हेम्ब्रोम कहते है यह सड़क करीब 13 वर्ष पूर्व बनी थी. जर्जर सड़क होने के कारण आये दिन दुर्घटना भी होती रहती है.

जर्जर सड़क की शिकायत सीएम जनसंवाद में भी की गयी थी, साथ ही साथ ही समाज कल्याण मंत्री लुईस मरांडी के नाम लिखित आवेदन दिया गया. लेकिन हालात नहीं सुधरे. अब जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से ग्रामीण बहुत नाराज हैं. समस्या जस की तस बनी हुई है.

गांव-3

वर्षों से गोवासोल गांव का पुल है क्षतिग्रस्त, डबल इंजन की सरकार भी नहीं करवा सकी दुरुस्त

मसलिया प्रखंड की पंचायत रांगा अतर्गत गोवासोल गांव में पुल के अत्यंत पुराने और क्षतिग्रस्त होने के कारण ग्रामीणों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. यह पुल इस गांव को तोसोरिया, मोहलबना, तुड़का, प्यालगड़ाह, मनोहरचक आदि दर्जनों गांवों को प्रखंड मुख्यालय व दुमका से जोड़ने का काम करता है.

इस पुल से कई छोटी गाड़ियां गुजरती है. इस गांव में राजकीय मध्य विधालय सह उत्क्रमिक उच्च विद्यालय होने के कारण कलिपाथर, लतावर, शिकारपुर के बच्चे पढ़ने आते हैं.

क्षतिग्रस्त पुल बनवाने के लिए ग्रामीणों ने विधायक सह झारखंड सरकार की मंत्री लुईस मंराडी से फरियाद की, लेकिन अब उनका कार्यकाल खत्म होने को है बावजूद इसके पुल नहीं बना.

स्थानीय निवासी कृष्ण चन्द्र मांझी का कहना है कि पुल बीच से दब गया है, जिसके कारण सड़क से नीचे हो गया है. वर्षा के दिनों में ये डूब जाता है. पुल के दोनों साइड पीसीसी भी उखड़ चुका है. रेलिंग टूट चुकी है, ऐसे में कोई भी वाहन पुल से नीचे गिर सकता है.

मसलिया प्रखंड या दुमका जाने का यह एक मात्र रास्ता है. अगर यह पुल टूट जायेगा तो हमलोगों की समस्या और अधिक बढ़ जायेगी. इलाके के ग्रामीणों का एकमात्र नारा व निर्णय है- पुल नहीं तो वोट नही, विकास नहीं तो वोट नहीं.

गांव- 4

तीन ओर से नदी से घिरा है कालीपाथर गांव

कालीपाथर गांव की जनसंख्या करीब 450 है. गांव को पक्की सड़क से जोड़ा नहीं गया है. कच्ची सड़क पर गाड़ी, मोटरसाइकिल, साइकिल तक चलाना मुश्किल है. वर्षा के समय ग्रामीण इस कच्चे रास्ते की अपेक्षा खेतों की पगडडिंयों पर चलना ठीक समझते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह गांव नुनबिल नदी से तीन तरफ से घिरा हुआ है. एकमात्र कच्चा रास्ता ही एक गांव को जोड़ता है.

 

इस गांव से सबसे नजदीक सड़क लताबर गांव में है. लताबर गांव से इस गांव के नदी घाट तक करीब 2.5 किलोमीटर कच्चा रास्ता है. पक्की सड़क नहीं होने के कारण विकास योजनाओं को लागू करने वाले सरकारी अधिकारी, कर्मचारी भी गांव नहीं आना चाहते. पंचायत कार्यालय ने तो इसे टापू की संज्ञा दे दी है.

अब ग्रामीणों का कहना है कि नदी घाट तक करीब 2.5 किलोमीटर पक्की सड़क नहीं बनायी जाती है तो आने वाले विधानसभा में सभी वोट का बहिष्कार करेंगे.

गांव-5

आजादी से पहले से ही डोभा का दूषित पानी पीने के लिये विवश नमोडीह गांव के ग्रामीण

गोपीकांदर प्रखंड के खरौनी पंचायत स्थित नमोडीह गांव का प्रधान टोला जिसका जनसंख्या लगभग 280 है. यहां के ग्रामीणों को बारिश के दिनों में भी पीने के पानी के संकट से जूझना पड़ता है. इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

पानी की मांग को लेकर ग्रामीणों ने गोपीकांदर बीडीओ के नाम लिखित आवेदन दिया. जिसके बाद प्रशासन रेस हुआ और इस टोला में एक मात्र चापाकल में सोलर टंकी लगायी गयी.

लेकिन ये सफल नहीं हुई. ग्राम प्रधान और मुखिया को बिना सूचना दिए विभाग ने सोलर टंकी को हटा दिया.
ग्रामीणों का कहना है कि चापाकल की पाइप लीक थी जिसे निकाल दिया गया था, जिस कारण चापाकल अब वर्षा के मौसम में भी इस चापाकल से पर्याप्त पानी नहीं आता है.

जलसंकट की समस्या झेल रहे ग्रामीण जंगल से झरना का पानी लाने को विवश है. जिसके लिए उन्हें उबड़-खाबड़ रास्ते से होकर जाना पड़ता है. पीने का साफ पानी नहीं होने के कारण इस टोला के ग्रामीण और बच्चे अक्सर बीमार पड़ते रहते हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि प्रधान टोला के लोग अंग्रेजों के ज़माने से ही डोभा और झरना का पानी पीने के लिय विवश है. कई सरकारें आयी और गयी, लेकिन साफ पानी नसीब नहीं हुआ. सरकार की अनदेखी से नाराज ग्रामीण अब वोट बहिष्कार की बात कर रहे हैं.

गौरतलब है कि नमोडीह गांव के ग्रामीणों ने पानी की मांग को लेकर शनिवार 21 सितंबर को डीसी ऑफिस के सामने प्रदर्शन  किया. और अपनी मांगों को लेकर एक आवेदन भी डीसी को सौंपा गया. लेकिन विकास योजनाओं को धरातल पर लानेवाले अधिकारियों ने ग्रामीणों को इश आवेदन का रिसीव लेटर तक देना उचित नहीं समझा, जिसे लेकर काफी देर तक प्रदर्शनकारियों और प्रशासन में बहस भी हुई.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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