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अपने ही गांव में शरणार्थी बना चेरो आदिवासी परिवार

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Dhiraj Kumar

29 जुलाई 2018 लातेहार के बरवाडीह के कुटमू मोड़ पर बरगद का पेड़ गिर जाने के कारण घर टूट जाने की वजह से  बेघर चेरो आदिवासी परिवार अब भी बदहाली में जी रहा है. तीन महीने हो गए हैं लेकिन परिवार अब भी अपने ही गांव के पंचायत भवन में शरणार्थी की तरह जी रहा है. परिवार की स्थिति और बदतर होती जा रही है एवं परिवार पर पंचायत भवन छोड़ने का लगातार दबाव बन रहा है. हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय स्तर पर धरना प्रदर्शन द्वारा परिवार की दशा को सरकार एवं प्रशासन से अवगत करा दिया गया है, लेकिन पिछले तीन महीने से सिर्फ इतना बदला है कि घर पर गिरा हुआ बरगद का पेड़ हटा दिया गया है, इसके अलावा पीड़ित चेरो आदिवासी परिवार को आश्वासन के सिवा कुछ भी हासिल नहीं हुआ है.

 

पेड़ गिर जाने की कारण मानमति कुंवर की कमर की हड्डी टूट गयी थी. हालांकि मनमति अब चलने फिरने लगी हैं, लेकिन कमर में लगातार दर्द होता है. मनमती बतलाती हैं कि पैसे के अभाव में वे दवा नहीं खरीद पा रही हैं. सबसे छोटा बेटा अर्जुन सिंह चेरो जिसका पेड़ गिर जाने के कारण दोनों पैर टूट गए थे, एक महीने पहले रांची से इलाज के बाद लौट आया है. लेकिन चल नहीं पा रहा है. उसके एक पैर में ऑपरेशन एवं दूसरे पैर में प्लास्टर हुआ है. अर्जुन 7वीं क्लास में पढ़ता है. लेकिन अभी पढाई नहीं हो पा रही है.डॉक्टर ने एक महीने बाद फिर अर्जुन को इलाज के लिए बुलाया है. लेकिन मनमति बतलाती हैं कि अर्जुन के दवा के लिए भी कुछ दिन में पैसे ख़त्म हो जायेंगे.

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परिवार पर कुल 20 हजार रुपये का कर्ज हो चुका है. बड़ा बेटा श्रीराम सिंह चेरो जिसकी शादी हो गयी है एवं चार बेटी हैं, बरवाडीह में पानी पहुंचाने का काम करता है जिसके लिए उसे 6000 रुपये मिल जाते हैं. मझला बेटा कार्तिक सिंह चेरो डाल्टनगंज में पिच रोड में मजदूरी कर रहा है. महीने में कुछ दिन ही काम मिलता है. पीड़ित परिवार को सरकार और प्रशासन से आर्थिक सहायता के नाम पर अब तक सिर्फ 8000 रुपये की राशि मिली है.

इस बदहाली और आर्थिक तंगी की स्थिति में बेघर चेरो परिवार पर पंचायत भवन खाली करने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है. मनमती कुंवर बतलाती हैं कि पंचायत भवन में ही स्वयं सहायता समूह की बैठक होती है. समूह की महिलायें जिसकी सदस्य स्वयं पीड़ित परिवार की एक महिला हैं उन पर लगातार दबाव बना रही हैं कि वे अपने लिए घर मांगे क्योंकि उनके पंचायत भवन में रहने की वजह से समूह की महिलाओं को मीटिंग करने में परेशानी होती है.

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हालांकि घर बनवाने की स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन मानमति कुंवर की बड़ी बहू रीमा देवी बतलाती हैं कि बेतला पंचायत के मुखिया से घर बनाने के लिए कहा तो उनका कहना था कि ईंटा अभी महंगा है, इसलिए घर नहीं बन पा रहा है. एक दो दिन में पैसा आ जाएगा तो घर बन जाएगा. पंचायत भवन में ही प्रज्ञा केंद्र भी है, जिसमें भीड़ होने की वजह से भी परिवार को रहने में परेशानी होती है. पंचायत भवन में भी इतनी जगह नहीं है कि 15 सदस्यों का संयुक्त परिवार वहां रह पाए. बड़ी बहू रीमा देवी पंचायत भवन में नहीं रहती क्योंकि वहां उनके बाकी दो देवर भी रहते हैं, वे पास के ही जल छाजन भवन में रहती हैं. एक बेटा और बहू पास के ही कुटमू बस्ती में चाचा ससूर के यहां रहते हैं.

इस मुश्किल और आपतकालीन स्थिति में पीड़ित परिवार की खाद्य सुरक्षा भी संकट में है. 16 सदस्यों का संयुक्त परिवार पेट भरने के लिए पूरी तरह से जन वितरण प्रणाली के अनाज और पास पड़ोस के लोगों द्वारा दिए गए अनाज पर निर्भर हैं, लेकिन राशन कार्ड में सिर्फ 7 सदस्य का नाम है, उसमें भी डीलर 3 किलो अनाज काटकर 32 किलो ही देता है. बड़ी बहू रीमा बतलाती हैं कि पहले की तरह वे लोग पेट भर भोजन नहीं कर पा रहे हैं. तेल, मसाला, दाल का भी संकट रहता है, कमाया हुआ पैसा इलाज में ही खर्च हो जा रहा है इसलिए साग-सब्जी खरीद नहीं पाते. आस-पास के लोग ही साग-सब्जी लाकर देते हैं.

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मानमति कुंवर का एक महीना का नवजात पोता अभिषेक निमोनिया से पीड़ित है. इस वजह से परिवार की चिंता और बढ़ गयी है. जब घर पर बरगद का पेड़ गिरा था, तो बहू( मझला बेटा कार्तिक की पत्नी) गर्भवती थी. पंचायत भवन में परेशानी के कारण बहू को उसके ससुराल लेस्लीगंज भेज दिया गया था. मानमति कुंवर का कहना है कि उन्हें बहू को एक महीने के बच्चे के साथ वापस उसके मायके लेस्लीगंज से बेतला बुलाना पड़ा, क्योंकि अधिकारी या कर्मचारी जब मिलने आते हैं तो परिवार से बहू को साक्ष्य के रूप में प्रस्तूत करने के लिए कहते हैं.

अपने ही गांव में शरणार्थी बना बेघर चेरो आदिवासी परिवार का पुनर्वास कब होता है यह तो वक़्त ही बताएगा. तब तक संविधान के तहत सम्मानजनक तरीके से जीवन जीने का आधिकार इस परिवार के लिए कागजी शब्द मात्र हैं.

ये लेखक के निजी विचार हैं.

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