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संसदीय वामपंथ का गहराता संकट और अस्तित्व बचाने की चुनौती

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Faisal Anurag

वामपंथी दलों का नेतृत्व चुनाव नतीजों के बाद आलोचनाओं के केंद्र में है. उसकी साख पर लगातार हमले हो रहे हैं. लोकसभा चुनाव में एक दुःस्वप्न ने वामदलों को घेर लिया है.

वाम कार्यकर्ताओं में भी हताशा है. उसकी हताशा कई ममरीकों के उभर कर सामने आ रही है. वाम दलों का न केवल आधार बिखरा है बल्कि उनके पार्टी के नेताओं में भटकाव भी चरम पर है.

फासीवाद को वर्तमान राजनीतिक परिघटना में एक प्रधान कारक बताने वाले वाम दलों के कई नेता जिस तरह भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम रहे हैं, उससे लगता है कि इन दलों की बीमारी बेहद असामान्य है. लेफ्ट पहले भी चुनावी पराजय का शिकार हुआ है.

लेकिन 2019 की हार बिल्कुल अलग है. वाम दलों ने पूरे चुनाव में जिस तरह का रूख दिखाया है, वह उसकी रणनीतिक चूक की दास्तां बयां कर रहा है.

चुनाव नतीजों के बाद सीपीआईएम और सीपीआई के विलय की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है और इस दिशा में अनौचारिक बातचीत के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं.

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वामपंथ के सभी घटकों के बीच मंथन तेज हो गया है. इन दलों के अनेक समर्थक खुल कर कह रहे हैं कि वामपंथी दलों को न केवल रणनीति और नेतृत्त्व बदलने की जरूरत है बल्कि भारत की उन वास्तविकताओं को और ज्यादा विश्लेषित करने की जरूरत है. जिस कारण लगातार मेहनतकश तबको के व्यवहार में बदलाव रेखांकित हो रहा है.

भारत के पहले आम चुनाव में पूरे देश में नेहरू को राजनीतिक तौर पर चुनौती देने वाले वामपंथी को जनता ने विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाया था. 1957 के चुनाव में भी वे इसी भूमिका में थे. पहले आम चुनाव में सीपीआई के नेता ए के गोपालन हुआ करते थे.

गोपालन एक बड़े नेता रहे हैं, जिन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में मेहनतकशों के आंदोलन का नेतृत्व किया है. 1942 के अनेक आरोपों के बाद भी सीपीआई को भारत के मेहनतकशों ने अपनी पहचान बनायी थी.

वह दौर था जब कम्यूनिस्ट तेलांगना की आग से तपक कर निकले थे और देश भर में भूमि सुधार और मजदूरों-किसानों के राज के प्रवक्ता समझे जाते थे. कम्यूनिस्ट आंदोलन का असर न केवल सोशलिस्ट पार्टी पर था, बल्कि कांग्रेस में भी अनेक ऐसे नेता थे जो कम्युनिस्टों के सवालों के साथ सहानुभूति रखते थे.

भारत ने नेहरू के नेतृत्व में जिस आर्थिक रास्ते को चुना था, उस पर दुनिया भर के वामपंथी आंदोलनों का भी असर था. आजादी के पहले कांग्रेस में नेहरू उस धारा के नेता माने जाते थे, जो सोवियत के साथ गहरी सहानुभूति रखता था. कम्युनिस्टों की यह ताकत उनके आंदोलन की तासीर के कारण था.

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देश में कांग्रेस ने अनेक राज्यों में जिस भूमि सुधार कार्यक्रम को अपनाया था, उस पर कम्यूनिस्ट प्रभाव का असर था. 1964 में सीपीआई के विभाजन के बाद हालात बदले. सीपीआईएम का भी जल्द ही विभाजन हुआ. जब उसके कई नेता 1967 में अलग होकर नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ गए.

संसदीय वामपंथ की रणनीति को लेकर सवाल उठते रहे हैं. डांगे लाइन कभी आलोचनाओं का शिकार रहा है तो कभी उसके समर्थक उसकी प्रासंगिकता की भी वकालत करते रहे हैं. 2014 के चुनाव नतीजों ने वामदलों को यह संकेत दे दिया था कि जमीन पर उनके वोट आधार तेजी से बिखर रहे हैं.

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सीपीआईएम प्रकाश करात बनाम येचुरी के जिस विवाद में उलझ रही है, उस कारण पार्टी की ठोस राजनीतिक लाइन प्रभावित होती रही है. खास कर मपोदी परिघटना की पहचान करने में इन दोनों नेताओं का नजरिया अलग-अलग स्थापनाओं का उल्लेख करता है.

माकपा के पिछले कांग्रेस में ही दो अलग-अलग दस्तावेज का पेश होना बताता है कि पार्टी में कुछ ऐसा चल रहा है, जिसका असर इसकी रणनीति पर है.

बंगाल में तो ममता बनर्जी ने उसके आधार को पहले ही प्रभावित किया था. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव तक उसके वोट प्रतिशत में कोई असामान्य कमी नहीं दिखी थी, लेकिन इस बार तो हालत चिंताजनक है.

माकपा पर तो यहां तक आरोप लगा कि उसके नेता ममता बनर्जी को हराने के लिए भाजपा की मदद कर रहे हैं. हालांकि माकपा नेतृत्व इस आरोप को खारिज करता है.

लेकिन यह तथ्य है कि उसके वोट आधार इलाकों में भाजपा का विस्तार हुआ है. इस चुनाव में माकपा भाजपा से लड़ते दिखी भी नहीं. हालांकि ब्रिगेड मैदान में उसने बड़ी सभा की, लेकिन वोट हासिल नहीं कर पायी.

इस बार तो उसका बंगाल में खाता भी नहीं खुला. इसी तरह केरल में भी उसे धक्का लगा है, जहां उसकी सरकार है. जिस तरह त्रिपुरा में वामपंथ ने अपनी सत्ता गंवा दी थी, वह कम्यूनिस्ट पार्टियों के लिए बेहद त्रासद था. लेकिन इस हार से भी सबक नहीं सीखा गया.

तमिलनाडु में डीएमके के साथ साझा चुनाव लड़कर दोनों वाम पार्टियों ने दो-दो सीट हासिल की है. वहीं केरल से वामफ्रंट एक घटक का एक सदस्य ही जीता है. लोकसभा में प्राप्त मतों के बाद माकपा के राष्ट्रीय दल की मान्यता भी खत्म हो जाएगी. भाकपा का भी यही हाल है.

तो क्या ये दानों दल अपनी इस हालत से उबरने के लिए नई रणनीति अपनाएंगे? इसी सवाल के उत्तर पर निर्भर है कि वामपंथ के इन दलों का संसदीय रास्ता किस तरफ जाएगा.

वामपंथ के कारण यूपीए पहले में अनेक जनोपयोगी कानून बने थे. हरकिशन सिंह सुरजीत ने जिस तरह वामपंथी दलों को संसदीय इतिहास में सूत्रधार बनाया था, वर्तमान नेतृत्व अपनी वह भूमिका खो चुका है.

वामपंथ के सामने न केवल नए जनाधार का विश्वास हासिल करने की चुनौती है, बल्कि अपने पुराने आधरों को भटकाव से रोकने का भी कार्यभार है.

वामपंथ को विधानसभा चुनावों में यदि अपनी साख बचानी है तो उसे आक्रामक रणनीति के साथ मैदान के खालीपन को भरना होगा.

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के घालमेल के साथ भाजपा ने जिस तरह जमीन पर मेहनतकश जातियों और समूहों के बीच पैठ बनायी है उससे भी उसे टकराना होगा. अगर जनसंघर्षों को नई धार देने में वामपंथ सुस्त रहा तो वो इतिहास बनने के लिए अभिशप्त है.

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