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भारत-ईरान-अफगानिस्तान के चाबहार बंदरगाह में बहार,  चीन-पाक के ग्वादर ने बड़ा मार्केट खोया

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित संकट या शांति: पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान… शीर्षक वाले सेमिनार में पाकिस्तान के जाने माने रक्षा और विदेश नीति के विशेषज्ञ शामिल हुए.

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NewDelhi :  पाकिस्तान के जाने-माने विदेश नीति के विश्लेषक अहमद रशीद का कहना है कि भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के विस्तार क्षेत्र का परिचालन शुरू होते ही, पाकिस्तान में चीन के सहयोग से चल रहे ग्वादर बंदरगाह से होने वाले व्यापार में जबरदस्त गिरावट आयी है.  रशीद के अनुसार चाबहार बंदरगाह के संचालन शुरू होने से पाकिस्तान ने बहुत बड़ा कैप्टिव मार्केट खो दिया है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में गुरुवार को आयोजित संकट या शांति: पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान… शीर्षक वाले सेमिनार में पाकिस्तान के जाने माने रक्षा और विदेश नीति के विशेषज्ञ शामिल हुए. सेमिनार में लेखक, पत्रकार और विदेश नीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले अहमद रशीद ने कहा कि ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह का परिचालन शुरू हो गया, लेकिन चीन के सहयोग से चल रहा ग्वादर बंदरगाह अपेक्षाकृत व्यापार आकर्षित नहीं कर पाया.

पाकिस्तानी अखबार दि न्यूज इंटरनेशनल के अनुसार अहमद रशीद ने कहा कि अफगानिस्तान अपना कारोबार चाबहार बंदरगाह के जरिए कर रहा है जिससे पाक-अफगानिस्तान के बीच ग्वादर बंदरगाह से होने वाला व्यापार पांच  अरब डॉलर से घटकर पहले तो आधा हुआ और अब 1.5 अरब डॉलर के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. पाकिस्तान ने बड़ा मार्केट खो दिया है.

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चाबहार  मध्य एशिया और अफगानिस्तान को सिस्तान-बलूचिस्तान से जोड़ने वाला बंदरगाह

बता दें कि ओमान सागर में स्थित चाबहार बंदरगाह मध्य एशिया और अफगानिस्तान को सिस्तान-बलूचिस्तान से जोड़ने वाला एक मात्र बंदरगाह है. भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच हुए समझौते के तहत भारत ने इस बंदरगाह को विस्तार देने का काम किया है. इस विस्तार से चाबहार बंदरगाह की क्षमता तीन गुना बढ़ने की संभावना है. यही नहीं इस बंदरगाह को पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में चीन के सहयोग से CPEC के तहत विस्तार दिये जा रहे ग्वादर बंदरगाह का रणनीतिक जवाब माना जाता रहा है. भारत के लिए चाबहार बंदरगाह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत के लिए पश्चिमी एशिया से पाकिस्तान के दखल के बिना सीधे जुड़ने का रास्ता साफ हो गया जबकि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के तटीय कस्बे ग्वादर को बंदरगाह के तौर पर विकसित करने का कार्य साल 2002 में शुरू हुआ. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने ग्वादर बंदरगाह का उद्घाटन किया था. 24 करोड़ डॉलर लागत से बने इस बंदरगाह का काम 2007 में पूरा हुआ. लेकिन साल 2013 में पाकिस्तान सरकार ने ग्वादर बंदरगाह के संचालन का कार्य सिंगापुर की निजी कंपनी से लेकर चीनी कंपनी के हवाले कर दिया.

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चीन ग्वादर बंदरगाह के विस्तार में भी निवेश कर रहा है

इस बीच चीन की सरकार ने पाकिस्तान में नवाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार से चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर (CPEC) के तहत अरबों डॉलर निवेश का इरादा जताया. इस परियोजना में सड़कें, रेलवे और बिजली परियोजनाओं के अलावा कई विकास परियोजनाएं शामिल हैं. जिसके तहत चीन ग्वादर बंदरगाह के विस्तार में भी निवेश कर रहा है. चूंकि आर्थिक कॉरिडोर यह रास्ता ग्वादर से शुरू होता है इसलिए ग्वादर और इस बंदरगाह का इस पूरी परियोजना में अहम स्थान है.

पहले से ही नकदी संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को उबारने के लिए वहां के पूर्व वाणिज्य मंत्री हुमायूं अख्तर खान का मानना है कि इस्लामाबाद को क्षेत्र में शांति स्थापित करने और अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार लाने के लिए कुछ अलग तरीके से सोचने की जरूरत है. हाल ही में सऊदी अरब ने पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर के निवेश पैकेज का ऐलान किया है. जिसमें 10 अरब डॉलर से ग्वादर बंदरगाह में रिफाइनरी और तेल परिसर में निवेश शामिल है.

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