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अर्थव्यवस्था को भंवर से निकालने के लिए आरबीआइ से मदद लेगा केंद्र!

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Girish Malviya

मोदी सरकार एक बार फिर चालू वित्तवर्ष में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से 45 हजार करोड़ की मदद मांग सकती है. जबकि कुछ महीने पहले ही आरबीआइ के इतिहास में पहली बार रिजर्व बैंक पर केंद्र को लाभांश (डिविडेंड) के तौर पर 1.76 लाख करोड़ रुपये देने का दबाव बनाया गया. और इस रकम में से चालू वित्त वर्ष (2019-20) के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये दिए भी जा चुके हैं.

रिजर्व बैंक से ऐसी बेजा डिमांड किये जाने का अर्थ बिल्कुल साफ है कि अंदरूनी तौर पर मोदी सरकार को अंदाजा हो गया है कि अर्थव्यवस्था ऐसे भंवर में फंस गयी है कि रिजर्व बैंक का फंड हड़पने के सिवा कोई रास्ता नही है.

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सूत्र बता रहे हैं कि सरकार को 35,000 करोड़ से 45,000 करोड़ रुपये तक के मदद की जरूरत है. दअरसल मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण करीब 19.6 लाख करोड़ रुपये राजस्व की कमी नजर आ रही है. संकट की मुख्‍य वजह आर्थिक सुस्‍ती के अलावा कॉरपोरेट टैक्‍स में दी गयी राहत है.

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आरबीआई का वित्त वर्ष जुलाई से जून तक होता है. सालाना हिसाब-किताब को अंतिम रूप देने के बाद आमतौर पर जुलाई या अगस्त में लाभांश बांटता है. लेकिन मोदी जी ने रिजर्व बैंक को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझ लिया है, वह जब चाहे तब उससे हजारों करोड़ रुपये के अंडे निकाल लेना चाहते हैं. यह मदद भी सरकार आरबीआइ से अंतरिम लाभांश के तौर पर लेने की बात कर रही है.

किसी एक फाइनेंशियल ईयर में केंद्र सरकार को RBI से मिलने वाला यह सबसे ज्यादा डिविडेंड है. फिस्कल ईयर 2017-18 में RBI ने 40,659 करोड़ रुपये और 2015-16 में 65,896 करोड़ रुपये का डिविडेंड दिया था. लेकिन इस साल तो सरकार ने रिजर्व बैंक से मिलने वाले डिविडेंड के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

यह एक तरह से रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट को ही हड़पने का प्रयास है. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सुब्बाराव ने एक बार कहा था ‘यदि दुनिया में कहीं भी एक सरकार उसके केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट को हड़पना चाहती है, तो यह ठीक बात नहीं है’.

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